सलवार उतारने की कोशिश को रेप नहीं मानने पर SC सख्त, पटना हाईकोर्ट के फैसले पर सुनवाई

नई दिल्ली। पटना हाईकोर्ट के उस फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लिया है, जिसमें महिला की सलवार उतारने की कोशिश और उसके सीने को दबाने की घटना को बलात्कार के प्रयास का अपराध नहीं माना गया था। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले में की गई कुछ टिप्पणियों को आपत्तिजनक बताया है। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि आरोपी का पक्ष सुनने के बाद हाईकोर्ट के इस आदेश को खारिज भी किया जा सकता है। मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ कर रही है। सुप्रीम कोर्ट ने बिहार के एडवोकेट जनरल एसडी संजय से कहा है कि स्थानीय पुलिस के माध्यम से आरोपी को नोटिस की तामील कराई जाए ताकि अगली सुनवाई में उसका पक्ष भी सुना जा सके।
पटना हाईकोर्ट ने 9 जुलाई को क्या कहा था
यह मामला बिहार के बांका जिले से जुड़े वर्ष 2008 के एक मामले का है। पटना हाईकोर्ट के जस्टिस पूर्णेंदु सिंह ने 9 जुलाई 2026 को आरोपी हिमांशु कुमार पाठक की अपील पर फैसला सुनाया था। हाईकोर्ट ने निचली अदालत की ओर से दी गई बलात्कार के प्रयास की सजा को रद्द करते हुए आरोपी को इस आरोप से बरी कर दिया था। हाईकोर्ट के सामने अभियोजन का मामला था कि पीड़िता अपने पिता के साथ फोटो खिंचवाने के लिए एक स्टूडियो गई थी। आरोप के मुताबिक स्टूडियो संचालक ने उसके पिता को बाहर भेज दिया और दरवाजा अंदर से बंद कर लिया। इसके बाद उसने महिला की सलवार उतारने की कोशिश की और उसके सीने को दबाकर कथित रूप से बलात्कार का प्रयास किया। पीड़िता के शोर मचाने पर उसके पिता ने दरवाजा खुलवाया, जिसके बाद आरोपी वहां से भाग गया।
हाईकोर्ट ने रेप के प्रयास के बजाय धारा 354 का अपराध माना
पटना हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है, जिससे बलात्कार के प्रयास के लिए जरूरी स्पष्ट कृत्य या इरादा साबित हो। अदालत ने यह भी कहा कि मामले में प्रवेश या शारीरिक संबंध बनाने की कोशिश का मेडिकल प्रमाण नहीं मिला। हालांकि हाईकोर्ट ने यह माना कि आरोपी ने महिला को कमरे में बंद किया, उसकी सलवार उतारने की कोशिश की और उसके सीने को दबाकर शारीरिक बल का इस्तेमाल किया। अदालत के अनुसार ये कृत्य महिला की गरिमा और लज्जा भंग करने के अपराध के दायरे में आते हैं और भारतीय दंड संहिता की धारा 354 के तहत अपराध बनता है। हाईकोर्ट ने इसी आधार पर भारतीय दंड संहिता की धारा 376 के साथ धारा 511 के तहत बलात्कार के प्रयास की दोषसिद्धि को टिकाऊ नहीं माना और आरोपी को बरी कर दिया।
2013 में निचली अदालत ने सुनाई थी तीन साल की सजा
इस मामले में निचली अदालत ने वर्ष 2013 में आरोपी को बलात्कार के प्रयास और गलत तरीके से बंधक बनाने के आरोपों में दोषी माना था। उसे बलात्कार के प्रयास के मामले में तीन साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई थी। इसके बाद आरोपी ने पटना हाईकोर्ट में निचली अदालत के फैसले को चुनौती दी। करीब 13 साल बाद हाईकोर्ट ने उसकी अपील पर फैसला सुनाते हुए बलात्कार के प्रयास की दोषसिद्धि को रद्द कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट तक कैसे पहुंचा मामला
पटना हाईकोर्ट के इस फैसले का उल्लेख जुलाई में सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही के दौरान किया गया था। वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा गुप्ता ने सुप्रीम कोर्ट का ध्यान इस फैसले की ओर दिलाते हुए कहा था कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक समान मामले में दिए गए आदेश को सुप्रीम कोर्ट पहले ही रद्द कर चुका है। इसके बाद 23 सितंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाईकोर्ट के 9 जुलाई के आदेश पर स्वत: संज्ञान लेते हुए मामले को अपने सामने लिया। सुनवाई के दौरान सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि हाईकोर्ट के फैसले में कुछ टिप्पणियां आपत्तिजनक हैं। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि आदेश को खारिज करने से पहले आरोपी को सुनना जरूरी होगा।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट पहले कर चुका है रद्द
यह पूरा घटनाक्रम उस मामले से भी जुड़ा है जिसमें इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप किया था। उस मामले में नाबालिग लड़की के साथ यौन दुर्व्यवहार से जुड़े कृत्यों को बलात्कार के प्रयास की श्रेणी में नहीं रखने पर सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का आदेश रद्द कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने उस मामले में कहा था कि जब आरोपी अपने इरादे को स्पष्ट कृत्यों के जरिए आगे बढ़ाता है और बाहरी हस्तक्षेप के कारण आगे नहीं बढ़ पाता, तो मामला केवल तैयारी तक सीमित नहीं रहता बल्कि प्रयास के स्तर तक पहुंच सकता है।
यौन अपराधों की सुनवाई में संवेदनशीलता पर भी जोर
इलाहाबाद हाईकोर्ट के मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यौन अपराधों से जुड़े मामलों में न्यायिक संवेदनशीलता को लेकर भी दिशा-निर्देश तैयार कराने की प्रक्रिया शुरू की थी। इसके लिए नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी के स्तर पर विशेषज्ञ समिति गठित की गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने यौन अपराधों, खासकर महिलाओं और बच्चों से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान न्यायिक भाषा और दृष्टिकोण में संवेदनशीलता बनाए रखने पर जोर दिया है।
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अब आरोपी का पक्ष सुनने के बाद आगे बढ़ेगी सुनवाई
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाईकोर्ट के फैसले को रद्द नहीं किया है। पीठ ने आरोपी को नोटिस जारी कराने की प्रक्रिया शुरू की है। आरोपी का पक्ष सुनने के बाद ही सुप्रीम कोर्ट इस मामले में आगे कोई आदेश देगा। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की अगली कार्यवाही इसलिए महत्वपूर्ण होगी क्योंकि अदालत को यह देखना है कि पटना हाईकोर्ट के फैसले में की गई टिप्पणियां और बलात्कार के प्रयास तथा महिला की गरिमा भंग करने के अपराध के बीच किया गया कानूनी अंतर मौजूदा कानून और सुप्रीम कोर्ट के पहले के फैसलों के अनुरूप है या नहीं।




















