Naresh Bhagoria
29 Jan 2026
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने देशभर के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को एक अहम निर्देश जारी करते हुए कहा है कि स्कूलों में पढ़ने वाली छात्राओं को मुफ्त बायोडिग्रेडेबल सैनिटरी पैड उपलब्ध कराए जाएं। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने यह भी सुनिश्चित करने को कहा है कि सभी स्कूलों में लड़के और लड़कियों के लिए अलग-अलग शौचालय हों। कोर्ट ने साफ कहा कि स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं की कमी छात्राओं की सेहत और गरिमा दोनों को प्रभावित करती है, जिसे किसी भी सूरत में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी जोड़ा कि सभी स्कूलों में दिव्यांगों के अनुकूल टॉयलेट उपलब्ध कराना अनिवार्य होगा। चाहे स्कूल सरकारी हों या सरकार के नियंत्रण में चल रहे हों, सभी को इस निर्देश का पालन करना होगा। अदालत ने माना कि समावेशी शिक्षा तभी संभव है, जब स्कूलों की बुनियादी संरचना हर छात्र की जरूरतों के अनुसार हो। दिव्यांग छात्रों के लिए सुविधाओं की अनदेखी को कोर्ट ने गंभीर लापरवाही करार दिया।
कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि मासिक धर्म स्वास्थ्य का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के मौलिक अधिकार का हिस्सा है। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने चेतावनी दी कि अगर निजी स्कूल छात्राओं को सैनिटरी पैड देने और लड़कों-लड़कियों के लिए अलग शौचालय सुनिश्चित करने में विफल रहते हैं, तो उनकी मान्यता रद्द की जा सकती है। अदालत ने यह भी कहा कि सरकारें भी अगर इन सुविधाओं को उपलब्ध कराने में नाकाम रहती हैं, तो उन्हें जिम्मेदार ठहराया जाएगा।
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने 10 दिसंबर 2024 को जया ठाकुर द्वारा दायर एक जनहित याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रखा था। इस याचिका में कक्षा 6 से 12 तक की किशोरियों के लिए सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में केंद्र सरकार की ‘स्कूल जाने वाली लड़कियों के लिए मासिक धर्म स्वच्छता नीति’को पूरे देश में लागू करने की मांग की गई थी। अब कोर्ट का यह निर्देश छात्राओं के स्वास्थ्य, सम्मान और शिक्षा को मजबूती देने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।