PU Special :इमली के पेड़ की नीचे शुरू हुई पाठशाला बनी आदर्श स्कूल, सेमरी खुर्द के शिक्षक राकेश पटेल ने बच्चों के लिए चलवाया फ्री ई-रिक्शा

रामचन्द्र पाण्डेय, भोपाल। सरकारी स्कूल में सुविधाएं नहीं होतीं, यह धारणा शासकीय प्राथमिक शाला सेमरी खुर्द, भोपाल ने तोड़ दी है। 1997 में जहां इमली के पेड़ के नीचे 15 बच्चों से स्कूल शुरू हुआ था, आज वही स्कूल समाज की भागीदारी से प्रेरणा का केंद्र बन गया है। यह बदलाव शिक्षक राकेश पटेल ने अपनी कड़ी मेहनत से कर दिखाया है।
जब 5 किलोमीटर की दूरी को शिक्षक ने बनाया शिक्षा का सेतु
गांव में कई बच्चे 5 किलोमीटर दूर खेत-खलिहानों में रहते थे। गरीबी के कारण स्कूल नहीं आ पाते थे। राकेश ने गांव-गांव जाकर पालकों को समझाया। जब दूरी बाधा बनी तो उन्होंने अपने प्रयास से नि:शुल्क ई-रिक्शा सेवा शुरू कर दी। आज वही रिक्शा रोज सुबह बच्चों को लाता है और शाम को घर छोड़ता है। इससे उपस्थिति 95 प्रतिशत से ऊपर पहुंच गई है और ड्रॉपआउट लगभग खत्म हो गया है। राकेश पटेल का मानना है कि अकेला शिक्षक स्कूल नहीं बदल सकता। उन्होंने समाज को स्कूल से जोड़ा। इसी जुड़ाव से धीरे-धीरे स्कूल में भवन सुधरा, पेयजल और शौचालय जैसी सुविधाएं जुड़ीं।
ऐसे मिली शिक्षक पटेल को सफलता
शिक्षक राकेश पटेल ने सर्वे किया तो पाया कि 20 से ज्यादा बच्चे इसी कारण से छूट रहे हैं। उन्होंने पहले पैदल जाकर बच्चों को लाने की कोशिश की, फिर स्थानीय सहयोग से एक ई-रिक्शा की व्यवस्था की। यह रिक्शा सुबह 7 बजे निकलता है और गांव की पगडंडियों से बच्चों को बटोरकर स्कूल लाता है। राकेश खुद कई बार रिक्शा के साथ जाते हैं, बच्चों से बात करते हैं, उनके पालकों से मिलते हैं।
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एक शिक्षक की 27 साल की तपस्या
राकेश पटेल की दिनचर्या सुबह 6 बजे शुरू होती है। स्कूल की सफाई, पौधों को पानी, फिर ई-रिक्शा की व्यवस्था और फिर पढ़ाना। उन्होंने स्कूल परिसर में खुद पौधे लगाए, दीवारों पर टीएलएम पेंटिंग करवाई। स्थानीय भाषा में कहानियों से पढ़ाते हैं।
भौतिक विकास में दो बड़े सहारे मिले
आईएसईआर फैक्ट्री के सीएसआर सहयोग से भवन निर्माण और पुराने भवन का सुधार हुआ। र्इंट-सीमेंट का यह बदलाव इस विश्वास का निर्माण था कि सरकारी स्कूल भी उत्कृष्ट बन सकते हैं। सेज यूनिवर्सिटी ने स्कूल को वॉटर कूलर दिया, जिससे बच्चों को स्वच्छ ठंडा पेयजल मिला। साथ ही शौचालय जैसी बुनियादी सुविधा से स्वच्छ और सम्मानजनक वातावरण बना। आज बदलाव सिर्फ भवन में नहीं, सोच में, बच्चों के आत्मविश्वास में हुआ है।
शिक्षक ने कहा यात्रा अभी जारी है
राकेश पटेल बताते हैं कि वर्ष 1997 में 15 बच्चे इमली के नीचे बैठते थे। मैंने कभी संसाधनों को नहीं रोया। सोचा अगर बच्चे स्कूल नहीं आ पा रहे तो हम स्कूल को बच्चों तक ले चलें। ई-रिक्शा उसी सोच का परिणाम है। सरकारी स्कूल का बच्चा भी बड़े सपने देख सकता है, बस उसे उड़ान देने वाला चाहिए। यह यात्रा अभी जारी है। उनका मानना है कि सच्ची सोच, समर्पण और समाज के सहयोग से छोटी शुरुआत बड़े बदलाव की नींव बनती है।




















