सीहोर : भूख से बेहाल परिजनों के चेहरों पर मुस्कान बनी ‘सुकून की रसोई’, दो साल में प्रेम से परोसी एक लाख थाली

सीहोर। अस्पताल की चौखट पर जब कोई परिवार अपने प्रियजन के इलाज की चिंता में दिन-रात गुजार रहा होता है, तब कई बार भोजन जैसी बुनियादी जरूरत भी पीछे छूट जाती है। ऐसे मुश्किल वक्त में किसी के हाथों से मिली भोजन की थाली सिर्फ पेट नहीं भरती, बल्कि इंसानियत, अपनत्व और उम्मीद का एहसास भी कराती है। सीहोर जिला चिकित्सालय में मरीजों के परिजनों के लिए शुरू हुई ‘सुकून की रसोई’ आज इसी संवेदना का प्रतीक बन चुकी है। टीम संडे का सुकून की इस पहल ने अब तक एक लाख भोजन थालियां परोसकर सेवा और समर्पण का ऐसा मुकाम हासिल किया है, जो समाज के लिए प्रेरणादायी है।
666 दिनों का सफर, एक लाख थालियों में समाया अपनापन
नवंबर 2024 में शुरू हुई ‘सुकून की रसोई’ ने 666 दिनों का सफर पूरा करते हुए एक लाख भोजन थालियां परोसने का ऐतिहासिक आंकड़ा छुआ है। यह आंकड़ा केवल भोजन वितरण की संख्या नहीं, बल्कि उन हजारों जरूरतमंद परिवारों के प्रति संवेदना का प्रतीक है, जिन्हें अस्पताल में अपने परिजनों के उपचार के दौरान भोजन की चिंता से राहत मिली। सेवा की इस यात्रा में हर थाली के साथ प्रेम, सम्मान और मानवीय संवेदना परोसी गई।
अस्पताल में जरूरतमंदों के लिए राहत का सहारा
जिला चिकित्सालय में भर्ती मरीजों के परिजन अक्सर उपचार के दौरान अस्पताल परिसर में ही समय बिताते हैं। ऐसे में भोजन की व्यवस्था करना उनके लिए चुनौती बन जाता है। ‘सुकून की रसोई’ ने इसी जरूरत को समझते हुए निःशुल्क भोजन उपलब्ध कराने की पहल की। यहां भोजन पाने वाले लोगों के लिए यह व्यवस्था किसी राहत से कम नहीं है। कठिन समय में किसी अनजान व्यक्ति का प्रेम से भोजन परोसना मानवता के रिश्ते को और मजबूत करता है।
जन्मदिन और पुण्यतिथि पर सेवा, खुशियां बांटने का नया तरीका
संडे का सुकून के संचालक अंकुर राठौर ने बताया कि इस अभियान से देश के विभिन्न हिस्सों के साथ विदेशों में रहने वाले लोग भी जुड़कर सहयोग कर रहे हैं। कई परिवारों ने बच्चों के जन्मदिन, वैवाहिक वर्षगांठ और बुजुर्गों की पुण्यतिथि जैसे अवसरों पर पारंपरिक पार्टियों के बजाय जरूरतमंदों को भोजन कराने का विकल्प चुना है। इस पहल ने उत्सव मनाने की परंपरा को सेवा और संवेदना से जोड़ दिया है। भोजन कराने वालों को आत्मिक संतोष मिलता है, वहीं जरूरतमंदों के चेहरे पर मुस्कान खिल उठती है।
जीरो वेस्ट भंडारा, पर्यावरण के प्रति भी जिम्मेदारी
‘सुकून की रसोई’ की खासियत केवल निःशुल्क भोजन नहीं, बल्कि इसकी पर्यावरण अनुकूल व्यवस्था भी है। यह पहल जीरो वेस्ट भंडारे की अवधारणा पर आधारित है। भोजन वितरण में सिंगल यूज डिस्पोजल का उपयोग नहीं किया जाता। इस तरह जरूरतमंदों की सेवा के साथ पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी दिया जा रहा है। शुद्ध और पौष्टिक भोजन को प्रेम एवं अपनत्व के साथ परोसना इस रसोई की पहचान बन चुका है।
सुबह से शाम तक सेवा, वरिष्ठ नागरिक भी निभा रहे जिम्मेदारी
लोगों के लगातार सहयोग और स्नेह के चलते अब रसोई में सुबह के साथ शाम को भी भोजन वितरण शुरू कर दिया गया है। टीम के सदस्यों के साथ कई सेवानिवृत्त वरिष्ठ नागरिक भी प्रतिदिन सेवा कार्य में जुटकर अपना योगदान दे रहे हैं। उम्र और व्यस्तताओं से परे यह सामूहिक प्रयास बताता है कि समाज के लिए कुछ करने का जज्बा ही सबसे बड़ी ताकत है।
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एक लाख थालियां, हजारों चेहरों पर सुकून
‘सुकून की रसोई’ की एक लाख थालियां इस बात का प्रमाण हैं कि समाज में संवेदनशीलता और सहयोग की भावना आज भी जीवित है। यह पहल संदेश देती है कि किसी जरूरतमंद की मदद के लिए बड़े संसाधनों से ज्यादा जरूरी बड़ा दिल है। अस्पताल में परोसी जा रही हर थाली इंसानियत की ऐसी कहानी है, जो बिना किसी शोर के लोगों के दिलों तक पहुंच रही है।




















