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देशभर में मिलेंगे बुरहानपुर में बने केले के रेशों से तैयार सैनेटरी पैड्स

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देशभर में मिलेंगे बुरहानपुर में बने केले के रेशों से तैयार सैनेटरी पैड्स

प्रीति जैन। विश्व में हम अकेले संगठन है जो कि केले के फाइबर से बायोडिग्रेडेबल सैनेटरी पैड्स बना रहे हैं और यह आइडिया माता अमृतानंदमयी का था। दरअसल, हमने अमृता यूनिवर्सिटी में भारत सरकार के विज्ञान व प्रौद्योगिकी विभाग का एक रिसर्च प्रोजेक्ट किया जिसमें हमने दो से तीन साल रिसर्च करके जाना कि केले के फाइबर में तरल अवशोषित करने की क्षमता होती है। साल 2017 से लेकर अब तक हम 10 लाख सैनेटरी पैड्स सप्लाई कर चुके हैं। यह कहना था, पैड वुमन आफ इंडिया अंजू बिष्ट का।

फल दे चुके केले के पेड़ को ही काटते हैं

अंजू बिष्ट ने कहा कि हम पर्यावरण संरक्षण के उद्देश्य से काम कर रहे थे तो किसी पेड़ को काट नहीं सकते थे, लेकिन केले का पेड़ ऐसा होता है कि फल देने के बाद दोबारा ग्रो नहीं करता इसलिए इसका फाइबर लेते हैं। बुरहानपुर में केले की फसल बहुत अधिक होती है तो यूनिट लगाने के लिए यह जगह हमारे लिए उपयुक्त थी। हमारे ब्रांड सौख्यं सैनेटरी पैड्स की मैन्युफेक्चरिंग अब मप्र के बुहारनपुर में होगी क्योंकि यहां केले बहुतायत में होते हैं। हम प्रदेश के ग्रामीण आजीविका मिशन और बुरहानपुर जिला प्रशासन के साथ मिलकर काम करेंगे।

रीयूजेबल और बायोडिग्रेडेबल पैड्स हैं

वन डिस्ट्रिक्ट, वन प्रोडक्ट योजना के तहत न केवल बुरहानपुर में बल्कि अन्य जिलों में एवं अन्य राज्यों में किफायती एवं सुरक्षित सैेनेटरी पैड्स पहुंचा रहे हैं। खास बात यह है कि यह रीयूजेबल पैड्स हैं जिन्हें धोकर दोबारा इस्तेमाल कर सकते हैं। एक सेट में 6 पैड होते हैं और एक पाउच होता है, जिसमें पैड को धोने के लिए रखा जा सकता है। ग्रामीण इलाकों में इसे 385 रुपए और आनलाइन यह 720 रुपए का पैक होता है, जबकि एक साल में महिलाओं पैड का खर्चा 1500 से 1800 रुपए तक होता है, जबकि यह पैड तीन साल तक मात्र 720 रुपए के खर्चे में चलता है। आनलाइन भी यह पैड्स बिक्री के लिए उपलब्ध हैं।

मानसिकता बदलने की जरूरत है

कई बार महिलाओं को लगता है कि पैड को धोकर इस्तेमाल करना कठिन है लेकिन एक बार मानसिकता बदल जाएगी तो यह मुश्किल नहीं लगेगा। मैन्सुरेशन ब्लड बदबूदार नहीं होता यह हम महिलाओं को समझाते हैं। दूसरा, यह बायोडिग्रेडेबल होने की वजह से पर्यावरण की दृष्टि से सुरक्षित है। कई महिलाओं को इसके इस्तेमाल से रशेस और क्रैम्प्स से छुटकारा भी मिला है। इसके ऊपर इस्तेमाल किया जाने वाला कपड़ा भी अच्छी क्वालिटी का होता है, जिसकी वजह से यह पैड तीन साल तक चलते हैं। अंजू कहती हैं, 10 साल यूएसए में मैनजमेंट कंसल्टेंसी फर्म में काम करने के बाद हम दोनों पति-पत्नी भारत आए और माता अमृतानंदमयी मठ के सेवा कार्यों से जुड़े। मेरा मैकेनिकल इंजीनियर से इनोवेटर बनने का यह सफर रोमांचक रहा, क्योंकि इस प्रोजेक्ट की वजह से पूरे भारत में जाकर महिलाओं और लड़कियों के बीच मैन्सुरेशन हाइजीन को बढ़ावा और पर्यावरण संरक्षण में योगदान दे पा रहे हैं।

People's Reporter
By People's Reporter

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