नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राष्ट्र के नाम दिए गए हालिया संबोधन के बाद विपक्ष ने सवाल उठाए, जिससे देश की राजनीति में एक नया विवाद खड़ा हो गया है। इस भाषण को लेकर विपक्षी दलों ने तीखी प्रतिक्रिया दी है और इसे चुनावी भाषण करार दिया है। विपक्ष का कहना है कि कई राज्यों में चल रहे विधानसभा चुनाव के दौरान इस तरह का संबोधन देना न केवल सवाल खड़े करता है बल्कि आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन की ओर भी इशारा करता है। अब इस पूरे मामले को लेकर चुनाव आयोग से शिकायत करने और कार्रवाई की मांग तेज हो गई है।
लोकसभा में महिलाओं के आरक्षण से संबंधित संविधान संशोधन विधेयक पास नहीं हो पाया। इसके अगले ही दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र को संबोधित किया और अपने संबोधन में पीएम मोदी ने कांग्रेस और उसके सहयोगियों पर सीधा हमला बोला। उन्होंनें संबोधन में कहा कि विपक्ष ने महिलाओं को उनका हक मिलने से रोक दिया और इस कोशिश की भूणहत्या कर दी। उन्होंने देश की महिलाओं से माफी भी मांगी। उन्होंने आगे कहा कि उनकी सरकार महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए लगातार काम करती रहेगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधन में यह भी कहा कि महिलाएं इस गलती का जवाब जरूर देंगी। उनके इस बयान को विपक्ष ने राजनीतिक रंग देने की कोशिश बताया है।
पीएम के इस संबोधन के तुरंत बाद विपक्षी दलों ने एकजुट होकर हमला बोला। सीपीआई(एम), टीएमसी, आरजेडी और सीपीआई जैसे दलों ने कहा कि यह राष्ट्र के नाम संबोधन कम और चुनावी भाषण ज्यादा था। सीपीआई(एम) के राज्यसभा सांसद जॉन ब्रिटास ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा कि किसी भी प्रधानमंत्री ने राष्ट्र के नाम संबोधन का इस्तेमाल इस तरह से विपक्ष पर हमला करने के लिए नहीं किया। ब्रिटास ने आगे कहा कि ये स्पष्ट है कि कल लोकसभा में मिली करारी हार के बाद सरकार अपना संतुलन खो चुकी है।
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विपक्षी दलों का कहना है कि पीएम घड़ियाली आंसू बहा रहे हैं। सीपीआई के सांसद पी. संदोष कुमार ने प्रधानमंत्री के संबोधन को लेकर और भी सख्त टिप्पणी की। उन्होंने इसे खोखला करार देते हुए कहा कि इसमें सरकार की किसी भी तरह की जवाबदेही तय नहीं की गई। पी. संदोष कुमार ने कहा कि यह राष्ट्र के नाम संबोधन नहीं था, बल्कि बयानबाजी के जरिए जिम्मेदारी से बचने की कोशिश थी। सरकार अपनी विफलता छिपाने के लिए भावनात्मक माहौल बना रही है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि सरकार ने दूरदर्शन और संसद टीवी जैसे सार्वजनिक प्रसारकों का इस्तेमाल एकतरफा संदेश देने के लिए किया, जो चुनाव के दौरान लागू आचार संहिता का उल्लंघन हो सकता है।
विपक्ष ने एक और सवाल उठाया है। उनका कहना है कि सरकार पहले ही 16 अप्रैल 2026 की गजट अधिसूचना के जरिए महिला आरक्षण लागू कर चुकी है। ऐसे में अगर आरक्षण पहले से लागू है, तो फिर संसद में विधेयक और उसके बाद राष्ट्र के नाम संबोधन का क्या मतलब था? विपक्ष इसे ‘राजनीतिक ड्रामा’ बता रहा है। सीपीआई(एम) नेताओं का कहना है कि यह पूरा घटनाक्रम पहले से तय रणनीति का हिस्सा लगता है, जिसमें भावनात्मक मुद्दा बनाकर राजनीतिक फायदा लेने की कोशिश की जा रही है।
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आरजेडी के राज्यसभा सांसद मनोज झा ने इस मुद्दे को सीधे चुनाव आयोग तक पहुंचाने की बात कही है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री का यह संबोधन एक चुनावी भाषण जैसा था, इसलिए इसका खर्च भारतीय जनता पार्टी के चुनावी खर्च में जोड़ा जाना चाहिए। मनोज झा ने कहा कि सरकारी संसाधनों का इस्तेमाल पार्टी के प्रचार के लिए करना गलत है। चुनाव आयोग को इस पर संज्ञान लेना चाहिए। टीएमसी नेता साकेत गोखले ने भी मुख्य चुनाव आयुक्त को चुनौती देते हुए कहा कि अगर निष्पक्षता दिखानी है तो इस टीवी भाषण की लागत बीजेपी के खाते में जोड़नी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि चुनाव के बीच इस तरह का संबोधन यह दिखाता है कि सरकार दबाव में है।
सीपीआई(एम) के महासचिव एमए बेबी ने भी सरकार पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि महिला आरक्षण के मुद्दे को सिर्फ राजनीतिक फायदे के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। एमए बेबी ने कहा कि यह संबोधन सिर्फ चेहरा बचाने की कोशिश है। अगर सरकार सच में गंभीर होती तो आरक्षण को जनगणना और परिसीमन से जोड़े बिना लागू करती। उन्होंने आरोप लगाया कि महिलाओं को इस पूरे मुद्दे में एक राजनीतिक मोहरे की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है।