भोपाल :MP के प्रख्यात साहित्यकार कैलाश चंद्र पंत का निधन, राष्ट्रपति मुर्मू ने इसी साल पद्मश्री से सम्मानित किया था

मध्य प्रदेश के वरिष्ठ साहित्यकार और हिंदी सेवक कैलाश चंद्र पंत का 90 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उनके निधन से साहित्य जगत और प्रदेश में शोक की लहर है। हाल ही में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उन्हें हिंदी साहित्य और भाषा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए पद्मश्री से सम्मानित किया था। कैलाश चंद्र पंत का जन्म इंदौर के पास महू में हुआ था। शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने भोपाल को अपनी कर्मभूमि बनाया और जीवनभर हिंदी भाषा व साहित्य के प्रचार-प्रसार में सक्रिय भूमिका निभाई।
हिंदी भवन से लेकर किसान भवन की स्थापना में निभाई अहम भूमिका
कैलाश चंद्र पंत ने राजधानी भोपाल में हिंदी भवन और किसान भवन की स्थापना में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने वर्षों तक हिंदी भाषा के विकास और साहित्यिक गतिविधियों को नई दिशा देने का काम किया। साहित्य, संस्कृति और समाज से जुड़े कई विषयों पर उन्होंने बेबाकी से अपने विचार रखे और हिंदी के लिए सांस्कृतिक माहौल तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वर्षों तक हिंदी की सेवा करने वाले साहित्यकार ने विभिन्न विषयों पर अपने विचार रखे। उन्होंने अलग-अलग विषयों पर खुलकर अपनी बात कही, जानिए उन्हीं के शब्दों में....
इस साल गणतंत्र दिवस की संध्या पर जनवरी में पीपुल्स अपडेट ने कैलाश चंद्र पंत ने इस मौके पर खास बातचीत की। देश में हिंदी और हिंदी भाषियों के विरोध की स्थिति पर उन्होंने कहा किा अभी भी विदेशी शक्तियां बार-बार मानसिक गुलामी के विचारों से उत्प्रेरित करती है।
हिंदी के लिए सांस्कृतिक वातावरण बनाया
हिंदी की सेवा मैंने मिशन के रूप में ली। कॉलेज में था तभी हिंदी समिति का अध्यक्ष चुना गया था। वहां भी मैंने हिंदी के बारे में कुछ नए प्रयोग करे थे। नए लेखकों, कवियों को मौका दिया। उसके बाद हमने स्वध्याय पीठ की स्थापना की उसमें भी नए कवियों, लेखकों को अवसर दिया। एक उत्सव हम मनाते थे, उससे एक सांस्कृतिक वातावरण बना। समाज के कार्यों के प्रति मेरी अभिरुचि बचपन से ही रही। जो एमए तक आते आते प्रौढ़ता की ओर पहुंच गई। बाद में भोपाल आने पर संघर्ष के दौर से गुजरा। बाद में पत्रकारिता से जुड़ा रहा। यहां पर नवप्रभात, नवभारत इंदौर समाचार से जुड़ा रहा और स्वतंत्र पत्रकार के रूप में लेख लिखता रहा और वह अभी भी जारी है।
साहित्य में हो ज्ञान-विज्ञान के विषय
साहित्य की दिशा क्या हो? सिर्फ कविताओं और कथाओं तक साहित्य सीमित नहीं रहता। जब तक आप ज्ञान-विज्ञान के विषयों को लेकर साहित्य में कुछ लिखेंगे नहीं तब तक आपकी भाषा की मजबूती नजर नहीं आएगी और अगर वो दृढ़तापूर्वक काम किया जाए तो हिंदी को विश्व भाषा बनने में देर नहीं लगेगी। विश्व उस नई दृष्टि से सोचता है हम लोग उस नई दृष्टि को बढ़ाने में पूरी तरह सफल नहीं हो रहे हैं। इसमें दो बातें सामने आएंगी, या तो आप इस भौतिक संस्कृति को स्वीकार कर लीजिए या भौतिक संस्कृति के सामने आध्यात्मिक संस्कृति को रखें। दुनिया किसे स्वीकार करेगी जब आप तर्क से यह सिद्ध कर देंगे कि भौतिक प्रगति के बावजूद भी दुनिया में शांति नहीं है। मनुष्य के मन में शांति नहीं है। जबकि आध्यात्मिकता में रत भारत अपने घोर संकटकाल में भी टिका रहा। ज्ञान परंपरा को जारी रखा, यह हमारी उपलब्धि है।
कमियां
युवा पीढ़ी भौतिकवादी संस्कृति से प्रभावित हो रही है, क्या आपने आध्यात्मिक संस्कृति की ओर आकर्षित करने के लिए कुछ ऐसे मोहक बातें रखीं हैं, यह प्रश्न है। दुनिया आध्यात्मिकता को कब स्वीकार करेगी, जब उसको लगेगा कि भौतिक संस्कृति की अपेक्षा आध्यत्मिकता में कुछ ज्यादा है। हमारी संस्कृति को एक पंक्ति में समझाता हूं- व्यक्ति, व्यक्ति से समष्टि, समष्टि से सृष्टि और सृष्टि से परमिष्टि विकास का क्रम है। व्यक्ति समाज के लिए कुछ करे, समाज देश के लिए करे और समाज विश्व के लिए करे। दिमाग की शांति की प्रार्थना करते हैं। मन की शांति रहेगी तो दिमाग की शांति रहेगी। भक्ति मार्ग के बारे में लोगों ने यह संदेश दिया है कि भक्ति से प्रतीक रूप से ब्रह्म को सामने रख सकते हैं।
राम को व्यक्ति को मत देखिए, आदर्श ब्रह्म के स्वरूप हैं। और उस ब्रह्म की हम साधना करते हैं। राम ने संस्कृति की हर बारिकी को समझा है। वे वचन के अनुसार राजपाठ छोड़कर उपेक्षित वनवासी समाज के बीच गए। उस समाज को गले लगाया। आगे गए तो मुनियों-ऋषियों की बात पर असुर विहीन धरती की शपथ ली। आसुरी वृत्ति का नष्ट करना और मानवीयता को स्थापित करना लक्ष्य होना चाहिए, यह राम ने सिखाया है। जब परिवार, समाज में प्रेम से रहेंगे तो ये संस्कार आएंगे।
पत्रकारितो को कार्य नहीं सेवा मानें। जिस दिन समझ लेंगे कि सेवा कर रहे हैं तो निष्पक्ष ढंग से समाज और सरकार की भी आलोचना करने लगेंगे। अभी निजी स्वार्थों से प्रभावित होकर आलोचना या प्रशंसा करते हैं। बड़े पत्रकार लुटियंस के उनकी सोच का दायरा उसी ढंग से सोच रहे, जैसे राजनीति 50 साल पहले थी। भारत लोकतंत्र में पौढ़ हो गया है।भारत के बच्चे भी कॉलेज से लेकर सभी चुनाव और नेताओं के चाल चलन को भी देखते हैं।
दक्षिण में विरोध
महाराष्ट्र में जब हिंदी बोलने वालों के खिलाफ अभियान चला था, तो मैंने एक लेख लिखा था। तमिलनाडु में द्रमुक का जन्म हिंदी विरोधी आंदोलन उसका उद्देश्य था। हम अभी तक नहीं समझ पाए हैं कि इस देश में अभी भी विदेशी शक्तियां बार-बार मानसिक गुलामी के विचारों से उत्प्रेरित करती है। पत्रकारों पर दायित्व है कि इस पर नजर रखें, कालनेमियों का चरित्र उजागर करने का दायित्व पत्रकारों का है।
एक पत्रकार
मैंने साप्ताहिक जनधर्म निकाला था। उसके पीछे भाव यह था कि अखबारों में धार्मिक लोगों के प्रवचन नहीं देते थे। सामाजिक, सांस्कृतिक कार्यक्रमों को महत्व नहीं देते। मैंने साप्ताहिक समाचार पत्र में वह सब शुरू किया। यह 1976 में शुरु किया था। 1989 तक चलाया। अक्षरा पत्रिका निकाली, त्रैमासिक से मासिक किया। नियमित निकाली, आज मनोज श्रीवास्तव उसके संपादक हैं। गर्व की बात है कि मनोज श्रीवास्तव ने हमारा निमंत्रण शुरू किया।
हिंदी के साहित्यकारों को नोबेल पुरस्कार नहीं
हम हिंदी वालों ने अपने ही साहित्यकारों के साथ अन्याय किया। हिंदी में कामायनी पढ़ें तो उसमें पूरा भारतीय दर्शन है। कोमल भाषा में वर्णन है। प्रसाद ने सब कुछ संग्रह करके व्यक्ति नाश करेगा बताया है। ऐसी पुस्तकों के बारे में हमारे आलोचकों ने विश्व साहित्य के समक्ष रखने की कोशिश नहीं की, बल्कि आलोचना की। उस रचना की जो गहराई है उसे और ऊपर लाना चाहिए। साहित्य में एक दर्शन दे दे।











