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मप्र विद्युत नियामक आयोग में आपत्ति-अडाणी पॉवर को सस्ते में मिला लेंको प्लांट, फिर क्यों महंगी बिजली?

अडाणी ग्रुप के पॉवर प्लांट से महंगी बिजली को लेकर उपभोक्ताओं ने मप्र विद्युत नियामक आयोग में आपत्तियां लगाई हैं। आपत्ति करने वाले उपभोक्तओं का कहना है कि जब अडाणी समूह ने प्लांट कम कीमत में खरीदा गया है, तो बिजली उत्पादन की वास्तविक लागत भी कम मानी जानी चाहिए।
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अडाणी पॉवर को सस्ते में मिला लेंको प्लांट, फिर क्यों महंगी बिजली?

संतोष चौधरी, भोपाल। मध्यप्रदेश में बिजली की दरों को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। विवाद की जड़ में है लेंको अमरकंटक पॉवर प्लांट का अधिग्रहण, जिसे अडाणी पॉवर ने बेहद कम कीमत पर खरीदा था। अब सवाल उठ रहे हैं कि जब कंपनी को यह बिजली परियोजना भारी छूट पर मिली है, तो उसका फायदा आम बिजली उपभोक्ताओं को भी मिलना चाहिए। दरअसल, नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) के आदेश के बाद 6 सितंबर 2024 को अडाणी पॉवर ने कर्ज में डूबी लेंको अमरकंटक पॉवर परियोजना का अधिग्रहण किया था। इस परियोजना पर बैंकों और वित्तीय संस्थानों का लगभग 14,631 करोड़ रुपए बकाया था, लेकिन पूरी परियोजना केवल 4,101 करोड़ रुपए में बेच दी गई। इसका मतलब यह हुआ कि बैंकों को करीब 72 प्रतिशत रकम छोड़नी पड़ी, जिसे वित्तीय भाषा में ‘हेयर कट’ कहा जाता है। साथ ही इस कंपनी का नाम बदलकर कोरबा पॉवर लिमिटेड कर दिया गया।

कोरबा पॉवर की पिटीशन

अडाणी पॉवर ने लेंको अमरकंटक पॉवर प्लांट को अधिग्रहण करने के बाद इसका नाम कोरबा पॉवर लिमिटेड कर दिया। अडाणी की इस सहायक कंपनी ने 5 साल के लिए टैरिफ बढ़ाने की अनुमति मप्र विद्युत नियामक आयोग से मांगी है। उसने एनर्जी चार्ज 2.34  रुपए और फिक्स चार्ज 224 करोड़ की अनुमति मांगी है। इससे पहले यह फिक्स चार्ज 203 करोड़ रुपए था। आयोग ने इस पर निर्णय लेने से पहले 26 मई को जनसुनवाई कर आपत्तियां बुलाई है।

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उपभोक्ताओं और संगठनों ने किया विरोध शुरू

अब इसी मुद्दे को लेकर  बिजली मामलों के विशेषज्ञ राजेंद्र अग्रवाल के अलावा अन्य संगठनों ने नियामक आयोग में आपत्ति दर्ज कराई है। उनका कहना है कि जब प्लांट इतनी कम कीमत में खरीदा गया है, तो बिजली उत्पादन की वास्तविक लागत भी कम मानी जानी चाहिए। ऐसे में प्रदेश के उपभोक्ताओं को सस्ती बिजली मिलनी चाहिए, लेकिन कंपनियां अब भी पुराने समय की महंगी लागत दिखाकर ऊंचा टैरिफ तय कराने की कोशिश कर रही हैं।

अनावश्यक आर्थिक बोझ 

आपत्ति में कहा गया है कि कंपनी उस समय की पूंजीगत लागत को आधार बना रही हैं, जब परियोजना पर करोड़ों रुपए का निवेश दिखाया गया था।  यदि किसी परियोजना की खरीद कीमत घट गई है, तो उसका लाभ उपभोक्ताओं तक पहुंचना चाहिए। विशेषज्ञों का कहनका है कि मौजूदा प्रस्ताव से उपभोक्ताओं पर आर्थिक बोझ बढ़ सकता है। 

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स्वतंत्र विशेषज्ञों से कराए जांच

उपभोक्ता पक्ष ने आयोग से मांग की है कि पूरे मामले की स्वतंत्र विशेषज्ञों से जांच कराई जाए और यह तय किया जाए कि बिजली की वास्तविक लागत क्या है। साथ ही पुराने बिजली खरीद समझौतों और नए अधिग्रहण के बाद की वास्तविक वित्तीय स्थिति का नए सिरे से मूल्यांकन किया जाए, ताकि आम लोगों को महंगी बिजली का बोझ न उठाना पड़े।

हर साल 600 करोड़ की बिजली खरीदता है मप्र

अडाणी का यह पॉवर प्लांट छत्तीसगढ़ के चापा में स्थापित है। इसकी क्षमता 600 मेगावॉट की है। इसमें से करीब 300 मेगावॉट बिजली मप्र खरीदता है। इस बिजली की अनुमानित कीमत करीब 600 करोड़ रुपए हैं। इस प्लांट में अब 1600 मेगावॉट क्षमता की यूनिट लगाने का प्रस्ताव है।

बिचौलिया कंपनी को फायदा

इस मामले में एक और मुद्दा पीटीसी इंडिया को दिए जाने वाले ट्रेडिंग मार्जिन का भी उठाया गया है। आपत्ति के अनुसार, सैकड़ों विद्युत उत्पादन कंपनियों से खरीदी जा रही बिजली में  एकमात्र उपक्रम बिचैलिया पीटीसी शामिल है जिसे दस पैसे प्रति यूनिट के  हिसाब करोड़ों रुपए का भुगतान हर माह किया जा रहा है। जबकि यह सुविधा  अन्य कंपनियों को नहीं है।

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कोरबा पॉवर लिमिटेड की दलील

कोरबा पॉवर लिमिटेड ने अपनी पिटीशन में तर्क  दिया है कि 4,101 करोड़ में अधिग्रहित की गई लेंको अमरकंटक पॉवर लिमिटेड में अनेक संपत्तियां शामिल है। अत: मप्र से अनुबंधित एक इकाई की खरीदी कीमत निकालना मुश्किल है। इसलिए पिछले सालों की भांति पूर्ण पूंजीगत लागत स्वीकार की जाए। 

Naresh Bhagoria
By Naresh Bhagoria

नरेश भगोरिया। 27 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हूं। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्ववि...Read More

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