72% सीवेज बिना ट्रीटमेंट! NGT ने MP समेत तीन राज्यों से मांगा वार्ड-गांव का हिसाब

भोपाल। शहरों से निकलने वाला सीवेज जलस्रोतों के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। इसी समस्या को देखते हुए नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने मध्य प्रदेश समेत तीन राज्यों में सीवेज प्रबंधन की वास्तविक स्थिति दर्ज करने के निर्देश दिए हैं। अब हर जिले में सीवरेज और सेप्टेज रजिस्टर तैयार किया जाएगा। इसमें सीवर कनेक्शन से लेकर नालों के बहाव और STP की क्षमता तक की जानकारी होगी। यह मामला भोपाल के खजूरी कला इलाके में खुले में सीवेज बहने की शिकायत से जुड़ा था। NGT ने स्थानीय मामले की सुनवाई के दौरान व्यापक स्तर पर सीवेज का रिकॉर्ड तैयार करने को कहा।
72 फीसदी सीवेज के उपचार पर सवाल
NGT ने नीति आयोग के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि देश में रोज करीब 72,368 एमएलडी शहरी अपशिष्ट जल निकलता है। इसमें से सिर्फ 20,236 एमएलडी यानी करीब 28 फीसदी का ही औपचारिक उपचार हो रहा है। इस हिसाब से करीब 72 फीसदी सीवेज के लिए उपचार की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। एक अन्य राष्ट्रीय आंकड़े में 52,664 एमएलडी सीवेज उत्पादन के मुकाबले 31,885 एमएलडी उपचार क्षमता बताई गई है।
भोपाल में STP क्षमता का पूरा इस्तेमाल नहीं
भोपाल अर्बन एग्लोमरेशन में रोज लगभग 259 एमएलडी सीवेज निकलने का अनुमान है। यहां 16 STP की कुल क्षमता 177.6 एमएलडी बताई गई है, लेकिन इनमें वास्तविक उपचार करीब 103.22 एमएलडी ही दर्ज हुआ। यानी उपलब्ध क्षमता का एक बड़ा हिस्सा इस्तेमाल नहीं हो रहा है। आकलन के अनुसार करीब 155 एमएलडी सीवेज अनुपचारित रह सकता है। NGT ने साफ किया कि ये आंकड़े पूरे भोपाल जिले के बजाय भोपाल अर्बन एग्लोमरेशन से संबंधित हैं।
हर नाले की होगी GPS मैपिंग
NGT के निर्देश के बाद जलस्रोतों में मिलने वाले सीवेज नालों की जीपीएस मैपिंग की जाएगी। नालों में पानी का बहाव भी मापा जाएगा। भोपाल में बड़े तालाब, छोटे तालाब और कोलार समेत प्रमुख जलस्रोतों तक पहुंचने वाले नालों की जानकारी जुटाई जाएगी। गर्मी और बारिश के मौसम में सीवेज की मात्रा अलग-अलग दर्ज करने को कहा गया है।
सेप्टिक टैंक और टैंकरों पर भी नजर
जहां सीवर लाइन नहीं है, वहां सेप्टिक टैंक का रिकॉर्ड बनाया जाएगा। टैंक की सफाई कितनी बार होती है, कौन ऑपरेटर सफाई करता है और सेप्टेज कहां ले जाया जाता है, इसकी जानकारी भी दर्ज होगी। डी-स्लजिंग वाहनों का पंजीयन और जीपीएस ट्रैकिंग कराने के निर्देश दिए गए हैं, ताकि गंदगी खुले में डालने पर नजर रखी जा सके।
नालों का पानी जांचने के निर्देश
NGT ने नालों के पानी की गुणवत्ता जांचने को भी कहा है। इसके लिए बीओडी, सीओडी, टीएसएस, फीकल कोलीफार्म, ई-कोलाई, नाइट्रोजन और फास्फोरस जैसे मानकों की जांच होगी। नालों को जलस्रोतों तक पहुंचने से पहले रोककर STP तक ले जाने और उपचारित पानी के दोबारा इस्तेमाल की व्यवस्था पर भी जोर दिया गया है।



















