
व्यापारिक रिश्तों, मनी लॉन्ड्रिंग जांच और निवेश पर उठे सवालों के बीच सुदन गुरुंग ने निष्पक्ष जांच का हवाला देते हुए पद छोड़ा। सोशल मीडिया के जरिए इस्तीफे का ऐलान कर उन्होंने जांच में सहयोग का भरोसा दिया।
सुदन गुरुंग ने अपने इस्तीफे की घोषणा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म फेसबुक के जरिए की, जहां उन्होंने साफ तौर पर कहा कि उनके खिलाफ उठ रहे सवालों की निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने के लिए यह कदम जरूरी था। उन्होंने लिखा कि पद पर बने रहने से जांच प्रक्रिया प्रभावित हो सकती थी ऐसे में उन्होंने जिम्मेदारी लेते हुए गृह मंत्री पद छोड़ने का फैसला किया। गुरुंग ने यह भी स्पष्ट किया कि वह जांच एजेंसियों के साथ पूरा सहयोग करेंगे और किसी भी तरह की प्रक्रिया में बाधा नहीं बनने देंगे। उनके इस फैसले को सियासी गालियारों में दबाव और जवाबदेही दोनों के रूप में देखा जा रहा है।
ये भी पढ़ें: अच्छी खबर : स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पार कर भारत पहुंचा ऑयल टैंकर 'देश गरिमा'
गृह मंत्री पर आरोप था कि उनके संबंध ऐसे व्यापारियों से जुड़े रहे हैं जिन पर मनी लॉन्ड्रिंग जैसे गंभीर मामलों की जांच चल रही है। विशेष रूप से दीपक भट्ट और सुलभ अग्रवाल के साथ उनके कथित व्यावसायिक रिश्तों ने इस विवाद को और गहरा कर दिया। विपक्ष ने आरोप लगाया कि एक ओर सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्ती की बात करती है, वहीं दूसरी ओर उसके ही मंत्री संदिग्ध गतिविधियों से जुड़े पाए जा रहे हैं। इन आरोपों ने न केवल उनकी साख को प्रभावित किया बल्कि सरकार की छवि पर भी सवाल खड़े कर दिए। यही वजह रही कि मामला सार्वजनिक बहस का विषय बन गया और इस्तीफे का दबाव बढ़ता गया।
गुरुंग के निवेश को लेकर भी कई तरह की कमियां सामने आईं। आरोप है कि उन्होंने अपनी आधिकारिक संपत्ति की घोषणा में कुछ कंपनियों में किए गए निवेश का खुलासा नहीं किया था। इनमें माइक्रो इंश्योरेंस और लाइफ कंपनियों में हिस्सेदारी की बात सामने आई। इसके अलावा उनके बैंक खाते में लगभग 60 लाख रुपये जमा होने की जानकारी भी चर्चा में रही, बताया जा रहा है कि जिसका उपयोग शेयर खरीदने में किया गया। इससे उनके इनकम के स्रोत को लेकर शक और गहरा गया।
ये भी पढ़ें: कैश, ज्वेलरी, डॉलर सब गायब! टीवी एक्टर विपुल रॉय के घर चोरी, नौकरानी ही निकली चोर!
बालेन शाह के नेतृत्व वाली सरकार के लिए यह दूसरा बड़ा झटका माना जा रहा है, क्योंकि इससे पहले भी एक मंत्री को पद छोड़ना पड़ा था। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि लगातार हो रहे इस्तीफे सरकार की स्थिरता और निर्णय क्षमता पर असर डाल सकते हैं। विपक्ष पहले ही सरकार को घेरने में जुटा हुआ है और इस मामले को भ्रष्टाचार के बड़े मुद्दे के रूप में पेश कर रहा है। वहीं, सरकार के लिए यह चुनौती बन गई है कि वह पारदर्शिता और भरोसे को कैसे बनाए रखे।