PlayBreaking News

भारत-बांग्लादेश सीमा का 600 किमी 'डार्क जोन' बना चुनौती,नदियों और दलदलों के बीच घुसपैठ-तस्करी पर कड़ी नजर

भारत-बांग्लादेश सीमा का 600 किलोमीटर लंबा ऐसा इलाका है, जहां आज भी पूरी तरह बाड़ नहीं लग पाई है। नदियों, दलदल और घने इलाकों के कारण यह हिस्सा घुसपैठ और तस्करी के लिए सबसे आसान रास्ता माना जाता है। आखिर यह डार्क जोन कहां है और इसे सुरक्षित करना इतना मुश्किल क्यों है? पूरी रिपोर्ट में जानिए।
Follow on Google News
नदियों और दलदलों के बीच घुसपैठ-तस्करी पर कड़ी नजर

भारत और बांग्लादेश के बीच फैली 4,096 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा देश की सबसे जटिल और चुनौतीपूर्ण सीमाओं में गिनी जाती है। इस पूरी सीमा में लगभग 600 किलोमीटर का ऐसा हिस्सा है, जिसे सुरक्षा एजेंसियां 'डार्क जोन' के रूप में देखती हैं। यह इलाका लंबे समय से घुसपैठ, तस्करी और अवैध गतिविधियों के लिए चिंता का विषय बना हुआ है। नदियों, दलदली जमीन, घने जंगलों और बाड़बंदी की कमी के कारण इस क्षेत्र की निगरानी करना बेहद मुश्किल माना जाता है। सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इस हिस्से में पारंपरिक तरीके से सुरक्षा व्यवस्था लागू करना आसान नहीं है। यही वजह है कि अब आधुनिक तकनीक और स्मार्ट निगरानी सिस्टम के जरिए इस कमजोर कड़ी को मजबूत बनाने की कोशिश की जा रही है।

पश्चिम बंगाल में सबसे ज्यादा संवेदनशील है यह इलाका

भारत-बांग्लादेश सीमा पांच राज्यों पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा, मेघालय, असम और मिजोरम से होकर गुजरती है। इनमें सबसे लंबी सीमा पश्चिम बंगाल में है, जिसकी लंबाई 2,217 किलोमीटर है। इसी राज्य में लगभग 550 से 600 किलोमीटर का ऐसा हिस्सा मौजूद है, जहां अब तक पूरी तरह बाड़बंदी नहीं हो सकी है। मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर 24 परगना, दक्षिण 24 परगना, कूचबिहार और जलपाईगुड़ी जैसे जिले इस चुनौती के केंद्र में हैं। कई जगहों पर गंगा, पद्मा और अन्य नदियां सीमा के साथ बहती हैं। नदी का रास्ता लगातार बदलता रहता है, जिससे स्थायी बाड़ लगाना मुश्किल हो जाता है। सुंदरबन के दलदली इलाके भी सुरक्षा एजेंसियों के लिए बड़ी चुनौती बने हुए हैं।

आखिर क्यों कहा जाता है इसे डार्क जोन?

डार्क जोन का मतलब केवल अंधेरा इलाका नहीं है। सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार यह ऐसा क्षेत्र है जहां निगरानी और संचार दोनों ही सीमित हैं। कई हिस्सों में मोबाइल नेटवर्क बेहद कमजोर है, जबकि कुछ स्थानों पर फ्लडलाइट्स लगाना तकनीकी रूप से संभव नहीं हो पाया है। नदी और दलदली क्षेत्रों में सुरक्षा चौकियां बनाना भी आसान नहीं है। मानसून के दौरान हालात और ज्यादा मुश्किल हो जाते हैं, क्योंकि तेज बहाव कई बार पहले से बने ढांचों को नुकसान पहुंचा देता है। ऐसे हालात में घुसपैठियों और तस्करों को गतिविधियां संचालित करने का मौका मिल जाता है।

Breaking News

घुसपैठ और तस्करी का बना प्रमुख रास्ता

सीमा का यह खुला और संवेदनशील इलाका लंबे समय से घुसपैठ और तस्करी की गतिविधियों के लिए इस्तेमाल होता रहा है। सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार, कई लोग रात के अंधेरे या दुर्गम रास्तों का फायदा उठाकर अवैध रूप से सीमा पार करने की कोशिश करते हैं। तस्करी भी यहां की बड़ी समस्या है। मवेशियों से लेकर नशीले पदार्थ, नकली भारतीय नोट, सोना और अन्य प्रतिबंधित सामानों की तस्करी के प्रयास लगातार सामने आते रहते हैं। खासकर नदी वाले इलाकों में नावों के जरिए होने वाली तस्करी को रोकना सुरक्षा बलों के लिए बड़ी चुनौती माना जाता है। इसके अलावा मानव तस्करी का खतरा भी बना रहता है। कई मामलों में महिलाओं और बच्चों को झांसा देकर या अवैध नेटवर्क के जरिए सीमा पार ले जाने की कोशिशें सामने आती रही हैं।

बीएसएफ ने बढ़ाई तकनीकी निगरानी

इस चुनौती से निपटने के लिए बीएसएफ अब पारंपरिक तरीकों के साथ आधुनिक तकनीक का भी सहारा ले रही है। जिन इलाकों में नदियों, दलदल या अन्य भौगोलिक कारणों से कंटीले तारों की बाड़ लगाना संभव नहीं है, वहां स्मार्ट फेंसिंग और इलेक्ट्रॉनिक निगरानी पर जोर दिया जा रहा है। सीमा पर कई जगह लेजर तकनीक, थर्मल कैमरे, इंफ्रारेड कैमरे और अत्याधुनिक सेंसर लगाए गए हैं। इन उपकरणों की मदद से रात के अंधेरे, घने कोहरे या खराब मौसम में भी किसी संदिग्ध गतिविधि का पता लगाया जा सकता है। इससे सुरक्षा बलों को समय रहते कार्रवाई करने में मदद मिलती है। इसके अलावा ड्रोन के जरिए भी लगातार निगरानी रखी जा रही है। वहीं, सीमा पार से आने वाले संदिग्ध ड्रोन पर नजर रखने और उन्हें रोकने के लिए एंटी-ड्रोन सिस्टम का इस्तेमाल किया जा रहा है। नदी और जलमार्ग वाले क्षेत्रों में बीएसएफ की विशेष टीमें स्पीड बोट के जरिए निगरानी करती हैं, ताकि तस्करी और घुसपैठ की किसी भी कोशिश को नाकाम किया जा सके।

Featured News

बीएसएफ और बीजीबी के बीच समन्वय

भारत की ओर से सीमा की सुरक्षा की जिम्मेदारी बीएसएफ संभालती है, जबकि बांग्लादेश की तरफ बॉर्डर गार्ड बांग्लादेश (बीजीबी) तैनात है। दोनों देशों के बीच समन्वित सीमा प्रबंधन योजना के तहत कई स्तरों पर सहयोग किया जाता है। सीमा पर किसी भी तरह की घटना, अवैध घुसपैठ या तनाव की स्थिति में दोनों पक्षों के अधिकारी फ्लैग मीटिंग कर समाधान निकालने की कोशिश करते हैं। संयुक्त गश्त और सूचनाओं के आदान-प्रदान के जरिए भी सुरक्षा व्यवस्था मजबूत की जाती है।

ये भी पढ़ें: ईरान पर ट्रंप की सख्त शर्तें! व्हाइट हाउस में मंथन के बाद भी फैसला नहीं, ट्रंप-ईरान डील पर बना सस्पेंस

दशकों बाद भी क्यों नहीं सुलझी समस्या?

यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आजादी के इतने दशकों बाद भी 600 किलोमीटर का यह हिस्सा असुरक्षित क्यों छूटा हुआ है? इसके पीछे कुछ प्रमुख कारण हैं-

  • जटिल भूमि अधिग्रहण: पश्चिम बंगाल में आबादी का घनत्व बहुत अधिक है। बाड़ लगाने के लिए किसानों की उपजाऊ जमीन का अधिग्रहण करना पड़ता है, जिसके मुआवजे और पुनर्वास को लेकर लंबे समय तक राज्य सरकार और केंद्र सरकार के बीच राजनीतिक और प्रशासनिक मतभेद रहे हैं।
  • भौगोलिक बाधाएं: सुंदरबन के मैंग्रोव जंगल और मालदा-मुर्शिदाबाद की उफनती नदियां ऐसी हैं जहां कंक्रीट का कोई भी ढांचा टिक नहीं पाता। मानसून के दिनों में नदियां किनारों को काट देती हैं, जिससे करोड़ों की लागत से बनी बाड़ मलबे में तब्दील हो जाती है।
  • स्थानीय अर्थव्यवस्था की निर्भरता: सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले कई गांवों की अर्थव्यवस्था अनौपचारिक रूप से सीमा पार के व्यापार और छोटी-मोटी तस्करी पर टिकी हुई है। इसलिए स्थानीय स्तर पर भी कई बार बाड़ लगाने का विरोध देखने को मिलता है।

आगे क्या है समाधान?

  • शारीरिक बाधाओं के स्थान पर डिजिटल दीवार: जहां भौगोलिक कारणों से भौतिक बाड़ लगाना असंभव है, वहां 100% तकनीकी कवरेज सुनिश्चित किया जाना चाहिए। एआई-संचालित (AI-driven) कैमरे, ग्राउंड-पेनिट्रेटिंग सेंसर और लगातार सैटेलाइट निगरानी के जरिए 'डिजिटल फेंसिंग' को मजबूत करना होगा.
  • प्रशासनिक इच्छाशक्ति और त्वरित भूमि हस्तांतरण: केंद्र और राज्य सरकार को राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर बचे हुए पैचों पर भूमि अधिग्रहण का काम युद्ध स्तर पर पूरा करना चाहिए ताकि BSF अपनी इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं को पूरा कर सके।
  • सीमावर्ती क्षेत्रों का विकास: सीमा पर रहने वाले भारतीय नागरिकों को मुख्यधारा से जोड़ने और उन्हें रोजगार के अवसर देने की जरूरत है, ताकि वे तस्करों के बहकावे में न आएं और देश की सुरक्षा के लिए सुरक्षा बलों के 'आंख और कान' बन सकें।
  • राजनयिक दबाव और सहयोग: बांग्लादेश की सरकार के साथ उच्च स्तरीय बातचीत के जरिए यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि BGB अपनी तरफ से घुसपैठियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करे। अपनी धरती का इस्तेमाल भारत-विरोधी गतिविधियों के लिए न होने दे। 

भारत-बांग्लादेश सीमा का यह 600 किलोमीटर लंबा इलाका सुरक्षा के लिहाज से सबसे संवेदनशील माना जाता है। जब तक यहां बेहतर निगरानी, आधुनिक तकनीक और मजबूत सुरक्षा इंतजाम नहीं किए जाते, तब तक घुसपैठ और तस्करी जैसी चुनौतियों पर पूरी तरह काबू पाना मुश्किल रहेगा।

Sona Rajput
By Sona Rajput

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय से मास कम्युनिकेशन किया है। साल 2022 ...Read More

नई दिल्ली
--°
बारिश: -- mmह्यूमिडिटी: --%हवा: --
Source:AccuWeather
icon

Latest Posts