PU Special :MP में स्मार्ट होगा जल प्रबंधन, 35% पानी की बर्बादी रोकने की तैयारी; GIS से होगी नेटवर्क की निगरानी

भोपाल समेत प्रदेश के शहरों में पानी की बढ़ती जरूरत और गर्मियों में जलसंकट के बीच जल और सीवरेज प्रबंधन को डिजिटल और स्मार्ट सिस्टम से जोड़ने की तैयारी है। नगरीय विकास विभाग की नई कार्ययोजना में पानी की निगरानी, लीकेज पकड़ने, स्मार्ट मीटर लगाने और ट्रीटेड वेस्ट वाटर के पुन: उपयोग पर फोकस किया गया है।
MP में स्मार्ट होगा जल प्रबंधन, 35% पानी की बर्बादी रोकने की तैयारी; GIS से होगी  नेटवर्क की निगरानी
MP में स्मार्ट होगा जल प्रबंधन

अशोक गौतम, भोपाल। वर्तमान जलापूर्ति व्यवस्था में करीब 35 प्रतिशत तक पानी नॉन-रेवेन्यू वाटर के रूप में नुकसान हो रहा है, जिसे घटाकर 15 से 20 प्रतिशत तक लाने का लक्ष्य रखा गया है। इसके लिए स्मार्ट मीटर, डिस्ट्रिक्ट मीटरिंग एरिया, लीकेज डिटेक्शन एंड कंट्रोल, जीआईएस मैपिंग और एआई के उपयोग जैसी व्यवस्थाएं विकसित की जाएंगी।

35 प्रतिशत तक पानी हो रहा बर्बाद

विभाग के अनुसार वर्तमान में जलापूर्ति व्यवस्था में करीब 35 प्रतिशत तक पानी नॉन-रेवेन्यू वाटर (एनआरडब्लयू) के रूप में नुकसान हो रहा है। इसे घटाकर 15 से 20 प्रतिशत तक लाने का लक्ष्य रखा गया है। इसके लिए स्मार्ट मीटर, डिस्ट्रिक्ट मीटरिंग एरिया (डीएमए), लीकेज डिटेक्शन एंड कंट्रोल और अनधिकृत पानी के उपयोग की निगरानी की जाएगी। इसका सीधा फायदा आम उपभोक्ताओं को मिलने की उम्मीद है। पाइपलाइन में लीकेज कम होंगे तो पानी की उपलब्धता बढ़ेगी और बिलिंग व्यवस्था भी अधिक सटीक हो सकेगी।

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जीआईएस से पता चलेगा कहां है पाइपलाइन और कहां लीकेज

जलापूर्ति नेटवर्क की जीआईएस आधारित मैपिंग और मॉनिटरिंग सिस्टम विकसित किया जा रहा है। इससे नगरीय निकायों को यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि किस क्षेत्र में कौन-सी पाइपलाइन है, कहां बार-बार लीकेज हो रहा है और किस इलाके में पानी की आपूर्ति प्रभावित है। रियल टाइम मॉनिटरिंग के जरिए समस्या सामने आते ही उसके समाधान की प्रक्रिया शुरू की जा सकेगी। निकायों में पाइपलाइन और सीवेज लाइन का रोड मैप भी तैयार किया जाएगा।

शिकायत के बाद नहीं, सिस्टम खुद बताएगा समस्या

अमृत के रेखा और परख प्लेटफॉर्म के जरिए परियोजनाओं की प्रगति और गुणवत्ता की ऑनलाइन निगरानी का प्रावधान किया गया है। आईटी आधारित डैशबोर्ड से परियोजनाओं की स्थिति देखी जा सकेगी। यानी किसी सड़क या पाइपलाइन को खोदकर काम शुरू करने के बाद महीनों तक उसकी जानकारी कागजों में खोजने की जरूरत कम होगी। पाइपलाइन की निगरानी के लिए जीआईएस के साथ एआई का भी उपयोग किया जाएगा।

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सीवेज के पानी का भी होगा इस्तेमाल

जल संकट के बीच उपचारित सीवेज के पानी को फेंकने के बजाय सरकारी संस्थानों, उद्योगों और ग्रीन बेल्ट क्षेत्रों में रियायती दरों पर उपलब्ध कराने की योजना है। इससे ताजे पानी की मांग कम करने में मदद मिलेगी। सीवेज के पानी का उपयोग करना निकायों के लिए अनिवार्य किया गया है। नई व्यवस्था का फोकस सिर्फ ज्यादा पानी जुटाने पर नहीं, बल्कि उपलब्ध पानी को बचाने और उसका बेहतर इस्तेमाल करने पर है।

महिलाओं को जोड़ा, एक लाख घरों तक पहुंचेगी निगरानी

अमृत मित्र के माध्यम से 1,123 स्वयं सहायता समूह सदस्यों को जल गुणवत्ता निगरानी से जोड़ा गया है। इनके माध्यम से एक लाख से अधिक घरों में पानी की गुणवत्ता की जांच की जा चुकी है। इससे जल गुणवत्ता की निगरानी सरकारी तंत्र तक सीमित न रहकर समुदाय की भागीदारी से होगी। इस व्यवस्था से पानी की गुणवत्ता की निगरानी को और मजबूत करने में मदद मिलेगी।

लीकेज की निगरानी से बढ़ सकता है पानी का प्रेशर

भोपाल के कोलार निवासी प्रशांत कौर का कहना है, मेरे घर के सामने खाली प्लाट हैं। इनके सामने से पाइप लाइन निकाली गई है। पाइप लाइन में लिकेज होने के कारण लो प्रेशर से पानी आता है। यह पानी की बर्बादी है, इसकी अगर ठीक से मॉनिटरिंग हो जाए तो पानी का फोर्स बढ़ सकता है। 

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'पाइप लाइन की निगरानी की जाएगी'

नगरीय विकास एवं आवास विभाग के आयुक्त संकेत भोंडवे ने बताया कि पाइप लाइन की निगरानी की जाएगी। निकायों में पाइप लाइन और सीवेज लाइन का रोड मैप तैयार होगा। जीआईएस से पाइप लाइन की निगरानी की जाएगी और इसके लिए एआई का भी उपयोग होगा। सीवेज के पानी का उपयोग करना निकायों के लिए अनिवार्य किया गया है।

Rohit Sharma
By Rohit Sharma

पीपुल्स इंस्टीट्यूट ऑफ मीडिया स्टडीज, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय...Read More

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