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दवा में HIV होने के दावे पर हाईकोर्ट सख्त:कहा- बिना वैज्ञानिक जांच के दायर हुई याचिका, पब्लिसिटी का जरिया नहीं बन सकती अदालत

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने दवा में HIV रिएक्टिव होने के दावे पर दायर जनहित याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि बिना वैज्ञानिक और वैधानिक जांच के अपुष्ट रिपोर्टों के आधार पर याचिका स्वीकार नहीं की जा सकती।
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कहा- बिना वैज्ञानिक जांच के दायर हुई याचिका, पब्लिसिटी का जरिया नहीं बन सकती अदालत
मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने कहा पब्लिसिटी का जरिया नहीं बन सकती अदालत

जबलपुर। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने एक दवा में HIV रिएक्टिव होने का दावा कर उस पर प्रतिबंध लगाने की मांग वाली जनहित याचिका (PIL) खारिज कर दी है। कोर्ट ने कहा कि बिना किसी तकनीकी, चिकित्सकीय या वैज्ञानिक जांच के केवल अपुष्ट रिपोर्टों के आधार पर याचिका दायर की गई है। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस तरह की याचिकाएं केवल प्रचार (पब्लिसिटी) पाने का माध्यम नहीं बन सकतीं और इनके जरिए न्यायालय का बहुमूल्य समय बर्बाद नहीं किया जा सकता। एक्टिंग चीफ जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की खंडपीठ ने यह फैसला सुनाया।

क्या था पूरा मामला?

नरसिंहपुर निवासी शुभम कौरव ने जनहित याचिका दायर कर दावा किया था कि उन्होंने 8 अप्रैल 2024 को डॉक्टर के पर्चे पर जबलपुर के नेपियर टाउन स्थित एक मेडिकल स्टोर से Human Albumin 20% Solution नामक मानव प्लाज्मा आधारित दवा के तीन एम्पुल खरीदे थे। याचिका के अनुसार मरीज को इंजेक्शन लगाने से पहले सुरक्षा के तौर पर एक एम्पुल की जांच कराई गई जिसमें HIV रिएक्टिव होने की बात सामने आई। इसके बाद संबंधित मेडिकल स्टोर को सूचना दी गई और दूसरी लैब में जांच कराने पर भी यही परिणाम मिलने का दावा किया गया। शिकायतों के बावजूद कार्रवाई नहीं होने पर हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया।

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कोर्ट ने खारिज की याचिका

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता ने Drugs and Cosmetics Act, 1940 के तहत निर्धारित वैधानिक प्रक्रिया का पालन नहीं किया। अदालत ने कहा कि यदि किसी दवा की गुणवत्ता या सुरक्षा पर संदेह था, तो इसकी सूचना तत्काल सरकारी ड्रग इंस्पेक्टर को दी जानी चाहिए थी। ड्रग इंस्पेक्टर ही कानून के तहत दवा का सैंपल लेकर उसे सरकारी विश्लेषक के पास जांच के लिए भेज सकता है। लेकिन याचिकाकर्ता ने ऐसा नहीं किया और सीधे अदालत का रुख किया।

बिना वैज्ञानिक जांच के नहीं हो सकता हस्तक्षेप

खंडपीठ ने अपने आदेश में कहा कि किसी भी दवा को असुरक्षित घोषित करने के लिए वैज्ञानिक और वैधानिक जांच आवश्यक है। केवल निजी स्तर पर कराई गई अपुष्ट जांच रिपोर्टों के आधार पर अदालत किसी दवा पर प्रतिबंध लगाने या हस्तक्षेप करने का आदेश नहीं दे सकती। कोर्ट ने टिप्पणी की कि इस तरह की याचिकाएं यदि बिना ठोस आधार के दायर की जाती हैं तो वे केवल प्रचार पाने का माध्यम बन जाती हैं।

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भविष्य के लिए रखा रास्ता खुला

हालांकि हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि भविष्य में किसी सरकारी प्रयोगशाला या सक्षम वैधानिक प्राधिकरण की जांच में संबंधित दवा के बैच में कोई खामी या सुरक्षा संबंधी दोष पाया जाता है तो संबंधित अधिकारी कानून के तहत आवश्यक कार्रवाई करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र होंगे। ऐसे मामलों में नियमानुसार जांच और कार्रवाई की प्रक्रिया अपनाई जा सकती है।

Sumit Shrivastava
By Sumit Shrivastava

सुमित श्रीवास्तव एक अनुभवी मीडिया प्रोफेशनल, बिजनेस पत्रकार और शोधकर्ता हैं। मास कम्युनिकेशन में M.P...Read More

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