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17 वर्ष से जेल में बंद भाइयों को बड़ी राहत-‘न चाकू पर खून था, न रिपोर्ट लिखने वाले का नाम, पुलिस ने एफआईआर में लाश से अंगूठा लगवाया’

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने दमोह के 2009 के चर्चित हत्याकांड में पुलिस जांच और अभियोजन की गंभीर खामियां पाते हुए दो सगे भाइयों की उम्रकैद की सजा रद्द कर दी। अदालत ने कहा कि एफआईआर, साक्ष्यों और पुलिस कार्रवाई में कई विरोधाभास हैं, जिससे अभियोजन का मामला संदेहास्पद हो जाता है। इसके बाद 17 वर्षों से जेल में बंद दोनों भाइयों की रिहाई के आदेश दिए गए।
17 वर्ष से जेल में बंद भाइयों को बड़ी राहत-‘न चाकू पर खून था, न रिपोर्ट लिखने वाले का नाम, पुलिस ने एफआईआर में लाश से अंगूठा लगवाया’
फाइल फोटो

जबलपुर। मप्र हाईकोर्ट ने दमोह जिले में वर्ष 2009 के एक चर्चित हत्याकांड में बड़ा फैसला सुनाते हुए दो भाइयों को दी गई उम्रकैद की सजा को रद्द कर दिया है। जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस अवनीन्द्र कुमार सिंह की डिवीजन बेंच ने दमोह पुलिस की जांच में पाई गईं गंभीर खामियों, संदिग्ध एफआईआर और अभियोजन पक्ष के विरोधाभासी बयानों के आधार पर 17 साल से जेल में बंद दोनों भाइयों को रिहा करने के आदेश दिए। डिवीजन बेंच ने अपनी पड़ताल में पाया कि जो चाकू पुलिस ने बरामद किया, उस पर मृतक का खून नहीं था। एफआईआर जिस अधिकारी ने लिखी, उसके नाम का जिक्र ही नहीं है। और तो और मृतक की मौत पहले हुई और बाद में एफआईआर लिखी गई और लाश से उसमें अंगूठा लगवाया गया। ऐसे में पुलिस की पूरी कहानी ही दोषपूर्ण है, जिसके आधार पर आरोपियों को सजा नहीं दी जा सकती।

अगस्त 2009 का मामला

हाईकोर्ट ने यह फैसला दमोह के बालाजी मोहल्ले में रहने वाले तुलसीराम राजपाल और उसके भाई हरप्रसाद की अपील पर सुनाया। 25 अगस्त 2009 की रात करीब 08:45 बजे मड़ियादो थाना क्षेत्र में मृतक प्यारेलाल गड़रिया की चाकू मारकर हत्या करने के आरोप में दोनों को वहां की जिला सत्र न्यायालय  ने 29 जून 2012 को उम्रकैद की सजा सुनाई थी। इसी फैसले को चुनौती देकर यह अपील वर्ष 2012 में हाईकोर्ट में दाखिल की गई थी। आरोपियों की ओर से अधिवक्ता अजय कुमार जैन ने पैरवी की।  

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हाईकोर्ट में जांच और साक्ष्यों की खुली पोल

1. एफआईआर किसने लिखी, पुलिस को ही नहीं पता: जांच अधिकारी कोर्ट में यह तक नहीं बता पाए कि थाने में एफआईआर किस पुलिसकर्मी ने अपने हाथ से लिखी थी। जिस अधिकारी ने एफआईआर लिखी, उसका बयान कोर्ट में दर्ज ही नहीं कराया गया।

2. मृतक की उपस्थिति और मौत का समय संदिग्ध: मृतक के परिजनों के बयानों में भारी विरोधाभास पाया गया। बेटे ने कहा कि थाने से बाहर आते ही पिता की मौत हो गई, जबकि मां ने कहा कि अस्पताल पहुंचने तक वह जीवित थे। वहीं, डॉक्टर के अनुसार प्यारेलाल को अस्पताल लाते ही मृत घोषित कर दिया गया था।

3. फर्जी अंगूठा लगाने की आशंका: मृतक के परिजनों ने माना कि प्यारेलाल हमेशा हस्ताक्षर करते थे, लेकिन एफआईआर पर अंगूठे का निशान लगा था। कोर्ट ने माना कि यह बेहद संदिग्ध है कि एफआईआर प्यारेलाल ने दर्ज कराई थी या उनकी मौत के बाद किसी अज्ञात पुलिसकर्मी ने उनके शव/अंगूठे का इस्तेमाल किया।

4. चिकित्सीय दस्तावेज गायब: यदि प्यारेलाल एफआईआर दर्ज कराने के समय जीवित थे, तो पुलिस द्वारा अस्पताल में डॉक्टरी जांच के लिए भेजा जाने वाला अनिवार्य मांग पत्र क्यों पेश नहीं किया गया?

5. चाकू पर नहीं मिले खून के निशान: जब्ती मेमो के तहत बरामद चाकू की एफएसएल रिपोर्ट में खून के कोई निशान नहीं पाए गए। मुख्य गवाहों के धारा 161 के बयान घटना के 15 से 30 दिन बाद दर्ज किए गए, जिसका कोई ठोस कारण नहीं दिया गया। 

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Naresh Bhagoria
By Naresh Bhagoria

नरेश भगोरिया। 27 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हूं। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्ववि...Read More

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