मुरैना। सिस्टम के बड़े-बड़े दावे, लेकिन जमीनी हकीकत ने एक बार फिर स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोल दी। मध्य प्रदेश के मुरैना जिला अस्पताल में इमरजेंसी वार्ड उस वक्त ‘अंधेरे के हवाले’ हो गया, जब सड़क हादसे में घायल मरीज इलाज के लिए पहुंचे। बिजली गुल होते ही पूरा वार्ड सन्नाटे और अंधेरे में डूब गया और डॉक्टरों को मोबाइल टॉर्च की रोशनी में जिंदगी बचाने की जंग लड़नी पड़ी।
घटना रविवार सुबह करीब 11:15 बजे की बताई जा रही है। सड़क दुर्घटना में घायल कुछ लोगों को जैसे ही जिला अस्पताल की इमरजेंसी में लाया गया, अचानक बिजली चली गई। कुछ सेकंड में ही पूरा वार्ड अंधेरे में डूब गया न मशीनें, न रोशनी, सिर्फ अफरा-तफरी।
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इस दौरान डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ ने हार नहीं मानी। मोबाइल फोन की टॉर्च ऑन कर उन्होंने मरीजों का प्राथमिक उपचार शुरू किया। मरहम-पट्टी से लेकर जरूरी इलाज तक, सब कुछ उसी टॉर्च की रोशनी में किया गया। करीब 20 मिनट तक हालात ऐसे ही बने रहे, फिर जाकर बिजली बहाल हुई।

घटना के बाद मरीजों के परिजनों में भारी नाराजगी देखने को मिली। उनका कहना है कि जिस इमरजेंसी वार्ड में हर सेकंड कीमती होता है, वहां इस तरह का अंधेरा किसी बड़ी अनहोनी को न्योता दे सकता था। एक परिजन ने गुस्से में कहा, अगर मोबाइल टॉर्च ही सहारा है, तो फिर अस्पताल और घर में क्या फर्क रह गया?
सबसे बड़ा सवाल उस ‘थ्री-लेयर बिजली व्यवस्था’ पर उठ रहा है, जिसका दावा अस्पताल प्रशासन करता रहा है। नियम के मुताबिक, बिजली जाते ही तुरंत जेनरेटर चालू होना चाहिए और जरूरत पड़ने पर सोलर सिस्टम बैकअप देना चाहिए, लेकिन इस घटना में तीनों लेयर एक साथ फेल होती नजर आईं। न जेनरेटर तुरंत चला, न सोलर सपोर्ट मिला। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या ये व्यवस्थाएं सिर्फ कागजों तक सीमित हैं?
तो वहीं जिला अस्पताल प्रशासन का कहना है कि अस्पताल में बिजली की कोई समस्या नहीं है। पावर कट होने पर जेनरेटर तुरंत चालू हो जाता है, जिसमें एक-दो मिनट का समय लग सकता है। हालांकि, मौके पर मौजूद हालात इन दावों से मेल नहीं खाते। जब इलाज 20 मिनट तक मोबाइल टॉर्च में चलता रहा।