डॉ. मोहन भागवत बोले- धर्म भारत के DNA में, यह हमारे अस्तित्व के प्रारंभ से अंत तक रहता है

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ.मोहन भागवत शुक्रवार को उज्जैन में युवा धर्म संसद में शामिल हुए। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि धर्म हमारे अस्तित्व के प्रारंभ से अस्तित्व के अंत तक रहता है। अपनी इच्छापूर्ति, भय, लोभ, या प्राण बचाने के लिए भी धर्म का त्याग नहीं करना चाहिए।  
डॉ. मोहन भागवत बोले- धर्म भारत के DNA में, यह हमारे अस्तित्व के प्रारंभ से अंत तक रहता है
उज्जैन। संघ प्रमुख डॉ. मोहन भागवत ने युवा धर्म संसद को संबोधित किया।

उज्जैन। युवा  धर्म संसद में राष्ट्रीय स्वयंसेवक  संघ  के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि  सुख-दुख और परिस्थितियां बदलती रहती हैं, लेकिन धर्म स्थायी रहता है। उन्होंने कहा कि धर्म हमारे अस्तित्व के प्रारंभ से अस्तित्व के अंत तक रहता है। अपनी इच्छापूर्ति, भय, लोभ, या प्राण बचाने के लिए भी धर्म का त्याग नहीं करना चाहिए। धर्म को केवल ‘रिलिजन’ या पूजा-पद्धति के अर्थ में देखना उचित नहीं है। धर्म व्यक्ति के पूरे जीवन को अनुशासित करने वाली व्यवस्था है।

जिन्होंने भारत को तकलीफ दी हमने उनकी भी मदद की

डॉ. भागवत ने कहा कि पश्चिम दिशा का एक पड़ोसी देश बिना कारण विवाद करता है और बार-बार तकलीफ देता है। भारत ने उसे कई बार सबक सिखाया, लेकिन इसके बावजूद भारत ने यह नहीं कहा कि विवाद करने के कारण उसके साथ किस तरह का व्यवहार किया जाना चाहिए। डॉ. भागवत ने कहा कि देश में अलग-अलग विचारधाराओं की सरकारें रही हैं, लेकिन दुनिया में हुए संघर्षों में भारत ने अनावश्यक रूप से हस्तक्षेप नहीं किया। जिन लोगों ने भारत को तकलीफ दी, जरूरत पड़ने पर भारत ने उनकी मदद भी की। उन्होंने कहा कि भारत ने यह नहीं देखा कि वहां किस विचारधारा के लोग सत्ता में, क्योंकि भारत के डीएनए में धर्म है।

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यह बुढ़ापे की चीज नहीं

युवाओं के धर्म को लेकर विचार करने पर भागवत ने खुशी जताई। उन्होंने कहा कि आज धर्म के बारे में चर्चा कम होती है और कई लोग इसे बुढ़ापे की चीज मानते हैं। गीता और रामायण को रिटायरमेंट के बाद पढ़ने वाले ग्रंथ समझने की धारणा सही नहीं है। धर्म जीवन के हर चरण से जुड़ा हुआ है।

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पश्चिमी देशों के लोगों ने धर्म को दिया रिलिजन नाम

भागवत ने कहा कि धर्म को लेकर भ्रम का एक बड़ा कारण अपनी भाषा और धर्म के वास्तविक अर्थ को भूल जाना है। पश्चिमी देशों से आए लोगों ने भारत में धर्म से जुड़े आचरण, कर्मकांड और अनुशासन को देखा और उसे अपने यहां प्रचलित ‘रिलिजन’ के समान समझ लिया। बाद में भारत में भी धर्म के लिए रिलिजन शब्द का इस्तेमाल होने लगा। डॉ. भागवत ने कहा कि जिस तरह कुश्ती सीखने के लिए अखाड़े में दंड-बैठक लगाना अभ्यास का हिस्सा है, उसी तरह धर्म के कर्मकांड और अनुशासन भी उसके अभ्यास का हिस्सा हैं। कर्मकांड धर्म का एक अंग है, लेकिन वही पूरा धर्म नहीं है।

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अपनी उपासना के साथ दूसरों का भी सम्मान

डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि व्यक्ति को अपनी उपासना-पद्धति का सम्मान करना चाहिए, चाहे वह उसे प्रकृति, गुरु या परंपरा से मिली हो। इसके साथ ही दूसरों की उपासना-पद्धति का भी समान रूप से सम्मान किया जाना चाहिए। भागवत ने कहा कि अपनी आस्था का सम्मान करते हुए दूसरों की आस्था का सम्मान करना और किसी को कन्वर्ट नहीं करना भी धर्म का हिस्सा है। 

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धर्म केवल अनुष्ठानों तक सीमित नहीं-अवधेशानंद गिरि

शुक्रवार को गीता भवन में युवा धर्म संसद में उद्घाटन सत्र के बाद व्याख्यान सत्र में  जूनापीठाधीश्वर आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानन्द गिरि ने धर्म की अस्तित्वपरक अवधारणा एवं चारित्रिक उत्तरदायित्व विषय पर उद्बोधन प्रस्तुत किया। आचार्यश्री ने युवाओं से जीवन निर्माण के मूल स्तंभ—चरित्र, निष्ठा, आत्मानुशीलन, अनुशासन, सत्यनिष्ठा एवं शुद्धि को जीवन में आत्मसात करने का आह्वान किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि धर्म केवल अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह स्वयं के अस्तित्व का साक्षात्कार तथा समाज के प्रति चारित्रिक उत्तरदायित्व के निर्वहन का मार्ग है। आचार्यश्री ने युवाओं का आह्वान किया कि वे आत्मानुशीलन को अपनी दैनिक साधना बनाएं, स्वेच्छा से अनुशासन को अंगीकार करें तथा सत्यनिष्ठा के साथ आंतरिक और बाह्य शुद्धि के मार्ग पर चलें, क्योंकि जिसका चरित्र अडिग होता है, उसका जीवन सुदृढ़ होता है और ऐसे ही सुदृढ़ चरित्रों से समाज एवं राष्ट्र का भविष्य सुरक्षित होता है।

दूसरे दिन होगा युवा धर्म संसद का औपचारिक शुभारंभ 

युवा धर्म संसद के दूसरे दिन सुबह मुख्य कार्यक्रम का उद्घाटन होगा। इसमें संघ प्रमुख मोहन भागवत के साथ आचार्य मिथिलेशनन्दिनीशरण महाराज, संरक्षक-सेवाज्ञ संस्थानम्, प्रो. श्रीनिवास बरखेड़ी, कुलगुरु-केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली और आशीष कुमार आशु, अध्यक्ष-सेवाज्ञ संस्थानम् शामिल होंगे। कार्यक्रम में धर्म की अस्तित्वपरक अवधारणा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सूचना-विचार संघर्ष जैसे विषयों पर संवाद होगा। देशभर से चयनित युवाओं के लिए विशेष उद्बोधन सत्र भी रखा गया है।

मनोज मुंतशिर समेत कई वक्ता युवाओं से करेंगे संवाद

दोपहर 12 से 2 बजे तक व्याख्यान सत्र चलेगा। इसमें अवधेशानंद गिरि महाराज, आचार्य महामंडलेश्वर, जूना अखाड़ा, प्रसिद्ध गीतकार एवं पटकथा लेखक मनोज मुंतशिर, प्रो. श्रीनिवास बरखेड़ी, स्मृति अनंतलक्ष्मी जी और प्रज्ञा प्रवाह के राष्ट्रीय संयोजक जे. नंद कुमार युवाओं को संबोधित करेंगे।

Naresh Bhagoria
By Naresh Bhagoria

नरेश भगोरिया। 27 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हूं। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्ववि...

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