मध्य प्रदेश में बढ़ा बाघों का खतरा :6 महीने में 48 लोगों की मौत, 22 ग्रामीण टाइगर अटैक का शिकार

मध्य प्रदेश में बाघ और अन्य वन्य प्राणियों के हमले लगातार बढ़ रहे हैं। साल 2026 के पहले छह महीनों में 48 लोगों की जान जा चुकी है, जिनमें 22 मौतें बाघ के हमलों में हुईं। जानिए किन इलाकों में सबसे ज्यादा खतरा है और विशेषज्ञ क्या कहते हैं।
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6 महीने में 48 लोगों की मौत, 22 ग्रामीण टाइगर अटैक का शिकार

भोपाल। मध्य प्रदेश में बाघों और अन्य वन्य प्राणियों की बढ़ती संख्या अब इंसानी जान पर भारी पड़ने लगी है। जंगलों से निकलकर आबादी वाले इलाकों तक पहुंच रहे वन्य जीवों के कारण मानव-वन्यजीव संघर्ष लगातार बढ़ रहा है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 1 जनवरी से 30 जून 2026 के बीच प्रदेश में वन्य प्राणियों के हमलों में 48 लोगों की मौत हुई है। इनमें 22 लोगों की जान केवल बाघों के हमलों में गई। सबसे ज्यादा घटनाएं बालाघाट, सिवनी और बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के आसपास के गांवों में सामने आई हैं, जहां बड़ी संख्या में ग्रामीण आज भी अपनी आजीविका के लिए जंगलों पर निर्भर हैं।

100 से ज्यादा लोग हुए घायल

वन विभाग के अधिकृत आंकड़ों के अनुसार, इस वर्ष के पहले छह महीनों में वन्य प्राणियों के हमलों में 100 से ज्यादा लोग घायल भी हुए हैं। ज्यादातर घटनाएं उन इलाकों में हुईं, जहां ग्रामीण महुआ, तेंदूपत्ता, लकड़ी और अन्य वन उपज इकट्ठा करने के लिए जंगलों में जाते हैं। वन विभाग का मानना है कि प्रदेश में बाघों की संख्या लगातार बढ़ रही है। वर्ष 2022 की टाइगर गणना के अनुसार मध्य प्रदेश में 785 बाघ थे। इस समय नई गणना का काम चल रहा है और अधिकारियों का अनुमान है कि इस बार यह संख्या एक हजार से अधिक पहुंच सकती है। वहीं प्रदेश में 3,907 तेंदुए भी मौजूद हैं।

हर साल दर्जनों लोगों की जा रही जान

आंकड़े बताते हैं कि यह समस्या लगातार गंभीर होती जा रही है। पिछले छह वर्षों में वन्य प्राणियों के हमलों में 292 से अधिक लोगों की मौत हुई है, जबकि 11,182 लोग घायल हुए हैं। वहीं 2014 से 2022 के बीच केवल बाघों के हमलों में 497 लोगों की मौत दर्ज की गई। यानी औसतन हर साल करीब 55 लोगों की जान टाइगर अटैक में गई।

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क्यों बढ़ रहा है मानव-वन्यजीव संघर्ष?

विशेषज्ञों का मानना है कि जंगल सिकुड़ रहे हैं, जबकि बाघों और अन्य वन्य प्राणियों की संख्या बढ़ रही है। टाइगर रिजर्व के आसपास कई गांव अब भी बसे हुए हैं और बड़ी संख्या में लोग रोज जंगलों में जाते हैं। ऐसे में इंसानों और वन्य जीवों का आमना-सामना पहले की तुलना में ज्यादा हो रहा है। इसके अलावा जंगलों में अवैध कटाई, अतिक्रमण, आग लगने की घटनाएं और प्राकृतिक आवास के कम होने से भी बाघ सुरक्षित क्षेत्रों से बाहर निकल रहे हैं। कई युवा बाघ अपनी मां से अलग होने के बाद नए क्षेत्र की तलाश में गैर-संरक्षित इलाकों तक पहुंच जाते हैं।

वन विभाग क्या कर रहा है?

मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए वन विभाग ने कई कदम उठाए हैं। विभाग गांवों में लगातार जागरूकता अभियान चला रहा है और वन समितियों के साथ बैठकें कर लोगों को सावधानी बरतने की सलाह दी जा रही है। इसके अलावा गांवों में मुनादी कराई जा रही है, टाइगर रिजर्व के भीतर बसे गांवों के पुनर्वास की प्रक्रिया जारी है और आधुनिक तकनीक व विशेष उपकरणों की मदद से वन्य जीवों की निगरानी की जा रही है। विभाग का कहना है कि जनहानि के मामलों में प्रभावित परिवारों को नियमानुसार आर्थिक सहायता भी दी जा रही है।

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मौत पर मिलती है 8 लाख रुपए की सहायता

वन्य प्राणी के हमले में किसी व्यक्ति की मौत होने पर राज्य सरकार 8 लाख रुपए तक की आर्थिक सहायता देती है। वन विभाग के अधिकारियों का दावा है कि अधिकांश मामलों में मुआवजा दिया जा चुका है, जबकि कुछ प्रकरण अभी प्रक्रिया में हैं।

विशेषज्ञ बोले- जंगल बचेंगे तभी कम होगा संघर्ष

रिटायर्ड भारतीय वन सेवा (आईएफएस) अधिकारी जगदीश चंद्रा का कहना है कि संरक्षण के कारण बाघों और अन्य वन्य प्राणियों की संख्या बढ़ना अच्छी बात है, लेकिन उनके रहने के लिए पर्याप्त जंगल नहीं बच रहे हैं। उन्होंने कहा कि जंगल लगातार कट रहे हैं, अतिक्रमण बढ़ रहा है और वन क्षेत्र छोटे-छोटे हिस्सों में बंटते जा रहे हैं। ऐसे में जब इंसान वन्य प्राणियों के प्राकृतिक आवास में जाएगा तो संघर्ष होना तय है। यदि मानव और वन्यजीव संघर्ष को कम करना है तो सबसे पहले जंगलों और उनके प्राकृतिक आवास को बचाना होगा।

Sona Rajput
By Sona Rajput

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय से मास कम्युनिकेशन किया है। साल 2022 ...Read More

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