मप्र विधानसभा में बना अनोखा रिकॉर्ड : एक ही सदन में दो पूर्व अध्यक्ष, तीन प्रोटेम स्पीकर और चार नेता प्रतिपक्ष

मनीष दीक्षित, भोपाल। मप्र की 18वीं विधानसभा ने संसदीय इतिहास में अनोखा रिकॉर्ड दर्ज किया है। इस बार सदन में न केवल वर्तमान अध्यक्ष हैं, बल्कि दो पूर्व विधानसभा अध्यक्ष भी बतौर विधायक मौजूद हैं। इसके अलावा तीन ऐसे विधायक हैं, जो अलग-अलग कार्यकाल में प्रोटेम स्पीकर रह चुके हैं। चार नेता प्रतिपक्ष भी इसी सदन का हिस्सा हैं। एक वर्तमान में और तीन पूर्व में यह जिम्मेदारी निभा चुके हैं।
यह स्थिति इसलिए भी खास मानी जा रही है, क्योंकि परंपरागत रूप से ऐसे पदों पर रहने वाले नेता या तो सक्रिय राजनीति से संन्यास ले लेते हैं या विधानसभा में दोबारा लौटते नहीं हैं। लेकिन इस बार कई दिग्गज नेता फिर से चुने गए हैं और बतौर विधायक सदन का हिस्सा बने हुए हैं।
पहली बार एक ही सदन में तीन अध्यक्ष
वर्तमान अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर के साथ दो पूर्व अध्यक्ष गिरीश गौतम और सीताशरण शर्मा भी हैं। गिरीश गौतम शिवराज सरकार के अंतिम कार्यकाल में अध्यक्ष रहे। सीताशरण शर्मा इससे पहले के कार्यकाल में यह जिम्मेदारी संभाल चुके हैं। तीनों नेता अब बतौर विधायक सदन का हिस्सा हैं। संभवत: यह पहला मौका है जब अध्यक्ष और दो पूर्व अध्यक्ष एक ही समय में विधानसभा सदस्य हैं।
तीन प्रोटेम स्पीकर, तीनों अब विधायक
इस विधानसभा में तीन ऐसे सदस्य हैं, जो अलग-अलग समय में प्रोटेम स्पीकर की भूमिका निभा चुके हैं।
गोपाल भार्गव : 2023 में नई विधानसभा के गठन के बाद सबसे वरिष्ठ विधायक के रूप में उन्हें शपथ दिलाने की जिम्मेदारी दी गई।
जगदीश देवड़ा: मार्च 2020 में कमलनाथ सरकार के पतन और शिवराज सरकार की वापसी के समय प्रोटेम स्पीकर नियुक्त हुए।
रामेश्वर शर्मा: देवड़ा के मंत्री बनने के बाद उन्हें प्रोटेम स्पीकर की जिम्मेदारी दी गई। वे इस पद पर सबसे ज्यादा समय तक रहे।
तीनों नेता वर्तमान में सदन में सक्रिय विधायक हैं।
सिंघार के अलावा चार नेता प्रतिपक्ष एक साथ
18वीं विधानसभा में विपक्ष को भी अब तक का सबसे अनुभवी नेतृत्व मिला है। उमंग सिंघार वर्तमान नेता प्रतिपक्ष हैं। पूर्व नेता प्रतिपक्ष के तौर पर कमलनाथ, गोपाल भार्गव और अजय सिंह भी इस विधानसभा के सदस्य हैं। इन चारों नेताओं का कार्यकाल अलग-अलग समय और परिस्थितियों में रहा, जिससे विपक्ष की रणनीतिक गहराई और संसदीय पकड़ और मजबूत मानी जा रही है।
पहले ऐसा क्यों नहीं हुआ?
पूर्व विधानसभा सचिव भगवान देव इसरानी के अनुसार, ऐसी स्थिति पहले इसलिए नहीं बनी, क्योंकि पहले एक ही दल की सरकार लंबे समय तक रहती थी। तब अध्यक्ष पद पर उन नेताओं को बिठाया जाता था, जो अपने राजनीतिक कॅरियर के अंतिम पड़ाव पर होते थे। वे या तो अगली विधानसभा में चुनकर सदस्य नहीं बन पाते थे या सक्रिय राजनीति को अलविदा कह देते थे। इसलिए कभी एक ही सदन में दो या तीन पूर्व अध्यक्षों की मौजूदगी नहीं रहीं। मसलन- दिग्विजय सिंह के शासनकाल में श्रीनिवास तिवारी लंबे समय तक अध्यक्ष रहे। उसके बाद उमा भारती से लेकर शिवराज सिंह चौहान के शासन तक ईश्वरदास रोहाणी ने करीब 10 साल तक यह पद संभाला। इसके बाद इन नेताओं ने चुनावी राजनीति से दूरी बना ली।





















