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PU Special :अनुशासन और संयम का पालन करती थी पुरानी पीढ़ी, नई पीढ़ी चाहती है व्यक्तिगत स्वतंत्रता

जबलपुर के एक परिवार में आजादी की दो पीढ़ियों की सोच का अंतर सामने आया। 93 वर्षीय आचार्य बब्बन मिश्र ने आजादी के दौर में देशभक्ति, अनुशासन, परंपराओं और सामूहिक हित को प्राथमिकता देने की बात बताई। वहीं उनके 28 वर्षीय पौत्र हिमांशु मिश्र व्यक्तिगत स्वतंत्रता, तर्क, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और समानता को आजादी का आधार मानते हैं।
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अनुशासन और संयम का पालन करती थी पुरानी पीढ़ी, नई पीढ़ी चाहती है व्यक्तिगत स्वतंत्रता
जबलपुर। बबन मिश्र और हिमांशु मिश्र।

नरेन्द्र सिंह, जबलपुर। ऐसी पीढ़ी, जिसने आजाद होते देश को देखा था, के लोग अब बहुत कम ही बचे हैं। जो हैं, वे आजादी के समय बाल या किशोर अवस्था में रहे।उस समय की बात जब करते हैं तो उनकी बूढ़ी आंखों में आज भी चमक दिखाई देती है।  वहीं नई पीढ़ी, जिसे जेनजी के नाम से संबोधित किया जाता है, आजादी का मतलब तर्क और वैज्ञानिक दृष्टिकोण,व्यक्तिगत स्वतंत्रता और अपनी बात रखने की आजादी को ही स्वतंत्रता मानता है। दोनों की सोच में जमीन-आसमान का अंतर है। शहर के रांझी क्षेत्र के निवासी ऐसे ही एक ऐसे परिवार से पीपुल्स समाचार ने संपर्क कर बातचीत की तो दोनों पीढ़ियों की सोच का अंतर सामने आया।

देशभक्ति के साथ धर्म और परंपराओं का पालन करते थे: बब्बन मिश्र 

93 वर्षीय आचार्य बब्बन मिश्र कहते हैं कि मेरा जन्म 15 जून 1934 को हुआ था। जब देश आजाद हुआ, उस वक्त में मैं सिर्फ 13 साल का था। बहुत तो याद नहीं, मगर वह किसी बड़े त्योहार जैसा दिन था। घरों-घर पकवान बन रहे थे। तिरंगा हर घर में फहराया जा रहा था। लोग एक-दूसरे को बधाइयां दे रहे थे। हमारे घर में भी पिताजी सभी के लिए नए कपड़े लाए थे। वे खुद खादी के कपड़े पहनते थे और हमारे लिए भी खादी के ही कुर्ते-पाजामा लाए थे। मैं उस समय काशी स्थित एक विद्यालय में कक्षा 8वीं में अध्ययनरत था। उस समय जो प्रभात फेरी या रैली निकलती थीं, उनमें हम छात्रों को भी शामिल कर लिया जाता था। इन प्रभातफेरी या रैलियों में हम श्लोक पाठ करते थे।  उस समय के लोग संयम और अनुशासन का पालन करते थे। 

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परंपराओं का किया जाता था सम्मान

आजादी के साथ सामाजिक और पारिवारिक जिम्मेदारियों को जरूरी माना जाता था। इसी प्रकार परंपराओं का सम्मान किया जाता था। रीति-रिवाजों और पूर्वजों के नियमों को सुरक्षा कवच मानकर चलते थे। इसी तरह सामूहिक हित को वरीयता दी जाती थी। व्यक्तिगत इच्छाओं से ज्यादा परिवार और समाज को प्राथमिकता दी जाती थी। महात्मा गांधी ज्यादातर लोगों के आदर्श थे। उनके सिद्धांत और दृष्टिकोण का आदर दिया जाता था। उसका पालन करना अपना पहला कर्तव्य मानते थे। आजादी के महायज्ञ में क्रांतिकारियों के युवा जैसे दीवाने थे। सुभाष चंद्र बोस,भगत सिंह,राजगुरु,चंद्रशेखर आजाद  मुख्य नायक थे। देश के आजाद होने के बाद जब विभाजन हुआ तो देश भर में हिंदू-मुसलमान के बीच का दंगा उस वक्त का सबसे बड़ा दंश था।

80 साल में आजादी के बदले मायने: हिमांशु मिश्र

आचार्य बब्बन मिश्र के पौत्र 28 वर्षीय हिमांशु मिश्र कहते हैं कि हमारी पीढ़ी आजादी को तर्क और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखती है। उन सभी स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को हम नमन करते हैं,महात्मा गांधी के सपने के भारत को वर्तमान परिस्थितियों में देखते हैं तो सरकारों के प्रयास तो हुए हैं मगर आज तक उनके सपनों का भारत कहीं नजर नहीं आता। असमानता,गरीबी और बेरोजगारी का दंश आज भी समाज भुगत रहा है।

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हिमांशु ने कहा…

1.हमारी पीढ़ी चाहती है कि हमें व्यक्तिगत स्वतंत्रता मिले अपने फैसले खुद ले सकें और खुलकर अपनी बात रख सकें।

2.हर बात को बिना सवाल के मान लेना हमें स्वीकार नहीं,कोई भी बात  मनवाने के लिए तर्क और वैज्ञानिक दृष्टिकोण जरूरी हैं।

3.दबी-छुपी पाबंदियों और जेंडर रुढ़ियों से आजाद होकर जीवन जीना ठीक लगता है। हमारी आज की पीढ़ी के लिए यह जरूरी है।

4.नई पीढ़ी की सोच पुरानी पीढ़ी की सोच से अलग है। ऐसा नहीं है कि नई पीढ़ी गलत  है, परंतु उनकी सोच पुरानी पीढ़ी से मेल नहीं खाती।

Naresh Bhagoria
By Naresh Bhagoria

नरेश भगोरिया। 27 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हूं। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्ववि...Read More

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