PU Special :इस्कॉन मंदिर की अनूठी पहल: भगवान के भोग से अब ऑर्गेनिक भंडारे की तैयारी, 600 गायों की गोशाला भी बनेगी

मनोज चौरसिया, भोपाल। भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत की पूजा के माध्यम से प्रकृति के प्रति सम्मान और उसके संरक्षण का संदेश दिया था। इसी विचार को व्यवहार में उतारने की पहल भोपाल में रायसेन रोड पर रमाखेड़ी गांव के पास स्थित इस्कॉन मंदिर में की जा रही है। मंदिर परिसर से जुड़ी जमीन पर जैविक खेती के जरिए अनाज, सब्जियां, फल और फूल उगाए जा रहे हैं। फिलहाल करीब 10 एकड़ जमीन पर खेती हो रही है, जिसकी शुरुआत भगवान को शुद्ध भोग अर्पित करने के उद्देश्य से की गई थी। अब मंदिर प्रबंधन इस खेती का दायरा बढ़ाकर 30 एकड़ तक ले जाने और जैविक उपज से भंडारा तैयार करने की योजना बना रहा है। इसके साथ ही करीब 600 गायों की क्षमता वाली गोशाला बनाने की तैयारी भी है। गोशाला से मिलने वाले दूध और घी का इस्तेमाल भंडारे और मंदिर के अन्य कार्यों में करने की योजना है।
भगवान के भोग से शुरू हुई जैविक खेती की पहल
मंदिर के प्रभारी स्वामी अच्युतदास के अनुसार, भगवान को शुद्ध भोग लगाने के उद्देश्य से करीब आठ महीने पहले जैविक खेती की शुरुआत की गई थी। उनका कहना है कि जैसा अन्न होता है, उसका प्रभाव मन और जीवन पर भी पड़ता है। इसी विचार के साथ खेती को केवल अनाज उगाने तक सीमित नहीं रखा गया बल्कि इसे सात्विक भोजन की परंपरा और प्रकृति से जुड़ने के माध्यम के रूप में विकसित किया जा रहा है। फिलहाल खेतों में पैदा होने वाले अनाज और सब्जियों का उपयोग भगवान के भोग के लिए किया जाता है। अब मंदिर प्रबंधन चाहता है कि खेती का क्षेत्र बढ़ने के साथ जैविक उपज का इस्तेमाल बड़े स्तर पर होने वाले भंडारे में भी किया जाए। इसके लिए जमीन का रकबा बढ़ाने की तैयारी है और प्रबंधन अतिरिक्त जमीन की तलाश कर रहा है।
सेवक खुद संभालते हैं खेती की जिम्मेदारी
इस्कॉन मंदिर की जैविक खेती की खास बात यह है कि इसमें मंदिर के सेवक खुद भागीदारी निभाते हैं। खेतों में बुवाई से लेकर निंदाई-गुड़ाई और सिंचाई तक का काम सेवक करते हैं। खेती में रासायनिक खाद के बजाय प्राकृतिक संसाधनों से तैयार खाद का इस्तेमाल किया जाता है। सेवकों को जैविक खेती और खाद बनाने का प्रशिक्षण भी दिया गया है। इसका उद्देश्य खेतों में इस्तेमाल होने वाली सामग्री को स्थानीय और प्राकृतिक संसाधनों से तैयार करना है। इस तरह खेती की प्रक्रिया में भी सेवकों की सक्रिय भूमिका रहती है और उन्हें फसल उत्पादन के विभिन्न चरणों का व्यावहारिक अनुभव मिलता है।
गोबर, गोमूत्र और गुड़ से तैयार होती है प्राकृतिक खाद
खेतों की मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने के लिए मंदिर में प्राकृतिक खाद तैयार की जाती है। इसके लिए गोबर, गोमूत्र, गुड़, सरसों की खली और उड़द के आटे जैसी सामग्री का उपयोग किया जाता है। गोबर आसपास की गोशालाओं से मंगाया जाता है। फसलों को कीटों से बचाने के लिए भी प्राकृतिक विकल्प अपनाए जा रहे हैं। इनमें नीम का तेल, नीम की पत्तियों का बुरादा और खट्टी छाछ शामिल हैं। मंदिर प्रबंधन का प्रयास है कि खेती में रासायनिक खाद और कीटनाशकों पर निर्भरता के बजाय प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल किया जाए।
रोज 60 सेवकों के लिए तैयार होता है भोजन
मंदिर की रसोई में प्रतिदिन करीब 60 सेवकों के लिए भोजन तैयार किया जाता है। इसमें खेतों में उगाए गए अनाज और सब्जियों का उपयोग होता है। फसल का एक महत्वपूर्ण हिस्सा भगवान के भोग के लिए रखा जाता है। इस व्यवस्था में खेती से लेकर रसोई तक मंदिर के सेवकों की भागीदारी बनी रहती है। आगे खेती का क्षेत्र बढ़ने पर जैविक उपज से भंडारा तैयार करने की योजना है। इससे मंदिर में होने वाले सामूहिक भोजन के लिए अपने खेतों में उगाए गए अनाज और सब्जियों का अधिक इस्तेमाल किया जा सकेगा।
10 एकड़ से 30 एकड़ तक खेती बढ़ाने की योजना
मंदिर में अभी करीब 10 एकड़ जमीन पर जैविक खेती की जा रही है। प्रबंधन इसे बढ़ाकर करीब 30 एकड़ तक ले जाना चाहता है। इसके लिए अतिरिक्त जमीन की तलाश की जा रही है। योजना के मुताबिक खेती का दायरा बढ़ने पर अनाज, सब्जियों और अन्य फसलों का उत्पादन भी बढ़ाया जाएगा, ताकि मंदिर की भोजन व्यवस्था और प्रस्तावित भंडारे के लिए जैविक उपज का इस्तेमाल किया जा सके। मंदिर प्रबंधन की यह पहल धार्मिक परंपरा के साथ खेती और भोजन व्यवस्था को जोड़ने का प्रयास है। हालांकि 30 एकड़ में खेती और ऑर्गेनिक भंडारे की योजना अभी विस्तार की तैयारी के चरण में है।
600 गायों की गोशाला बनाने की भी तैयारी
जैविक खेती के विस्तार के साथ मंदिर प्रबंधन गोशाला बनाने की योजना पर भी काम कर रहा है। इसमें करीब 600 गायों को रखने की योजना है। प्रस्तावित गोशाला से मिलने वाले दूध और घी का उपयोग भंडारे सहित मंदिर के अन्य कार्यों में किया जाएगा। गोशाला की योजना खेती और भोजन व्यवस्था को आपस में जोड़ने की दिशा में एक और कदम है। प्राकृतिक खाद तैयार करने में गोबर और गोमूत्र का इस्तेमाल पहले से किया जा रहा है। भविष्य में गोशाला बनने पर इन संसाधनों की उपलब्धता को लेकर भी नई संभावनाएं बन सकती हैं। फिलहाल गोशाला निर्माण की योजना तैयार की जा रही है।
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खेतों में उग रहे गेहूं, दालें, फल, फूल और सब्जियां
मंदिर की जैविक खेती में अनाज से लेकर फल, फूल और सब्जियों तक की अलग-अलग फसलें शामिल हैं।
अनाज और दालें: खेतों में गेहूं, धान, मूंग और तुअर दाल उगाई जा रही है।
फल: आम, चीकू, पपीता, अमरूद सहित अन्य फलदार पौधे लगाए गए हैं।
फूल: गुलाब, गेंदा, मोगरा और सेवंती जैसे फूलों की खेती की जा रही है।
सब्जियां: आलू, बैंगन, टमाटर, गिलकी और भिंडी सहित कई सब्जियां उगाई जा रही हैं।
इन फसलों से मंदिर की रसोई और भगवान के भोग के लिए उपज उपलब्ध कराई जाती है। खेती का क्षेत्र बढ़ने पर उत्पादन और उपयोग का दायरा भी बढ़ाने की योजना है।
प्रकृति के संरक्षण और सात्विक भोजन को जोड़ने की पहल
रमाखेड़ी स्थित इस्कॉन मंदिर में शुरू हुई जैविक खेती की पहल धार्मिक आस्था, प्राकृतिक संसाधनों के इस्तेमाल और सात्विक भोजन की परंपरा को एक साथ जोड़ती है। सेवकों की भागीदारी से खेती करना, प्राकृतिक खाद तैयार करना और खेतों की उपज को भगवान के भोग में इस्तेमाल करना इस प्रयास के प्रमुख हिस्से हैं।




















