तेहरान। मिडिल ईस्ट में जारी अमेरिका-ईरान-इजरायल संघर्ष के बीच तनाव कम होने की उम्मीद फिलहाल नजर नहीं आ रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में दावा किया था कि, ईरान समझौते के लिए तैयार है और दोनों देशों के बीच बातचीत चल रही है। लेकिन तेहरान की तरफ से आई ताजा प्रतिक्रिया ने साफ कर दिया है कि मामला अभी शांत होने वाला नहीं है।
ईरान के सर्वोच्च नेता के वरिष्ठ सैन्य सलाहकार मोहसिन रेजाई ने बेहद सख्त बयान देते हुए कहा है कि, जब तक ईरान की सभी शर्तें पूरी नहीं होतीं, तब तक यह युद्ध जारी रहेगा। उन्होंने कहा कि ईरान न तो दबाव में झुकेगा और न ही पीछे हटेगा।
मोहसिन रेजाई ने अपने बयान में बेहद आक्रामक लहजा अपनाते हुए कहा कि, इस बार ईरान का जवाब पहले जैसा नहीं होगा। उनका कहना था कि, अब यह आंख के बदले आंख वाला जवाब नहीं होगा, बल्कि सिर के बदले सिर जैसा जवाब दिया जाएगा। उन्होंने चेतावनी दी कि, अगर संघर्ष बढ़ा तो विरोधी देशों को पूरे गल्फ क्षेत्र से पीछे हटना पड़ सकता है।
रेजाई ने यह भी कहा कि, ईरानी सेना पूरी ताकत के साथ ऑपरेशन चला रही है और युद्ध के दौरान दुश्मनों पर लगातार दबाव बनाए रखा जा रहा है। उनके मुताबिक, देश का नेतृत्व नए सुप्रीम लीडर के नेतृत्व में पूरी मजबूती के साथ हालात को संभाल रहा है।
रेजाई ने साफ कहा कि, अगर अमेरिका और उसके सहयोगी देशों को युद्ध रोकना है, तो उन्हें ईरान को हुए नुकसान का पूरा मुआवजा देना होगा, सभी आर्थिक प्रतिबंध हटाने होंगे और भविष्य में ईरान के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने की अंतरराष्ट्रीय गारंटी देनी होगी।
ईरान ने इस संघर्ष को खत्म करने के लिए तीन स्पष्ट शर्तें रखी हैं।
1. सभी आर्थिक प्रतिबंध हटाए जाएं
ईरान का कहना है कि उस पर लगाए गए सभी अमेरिकी और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध तुरंत समाप्त किए जाएं।
2. युद्ध के नुकसान का मुआवजा
ईरान ने मांग की है कि अमेरिका युद्ध के दौरान हुए बुनियादी ढांचे, ऊर्जा संयंत्रों और नागरिक नुकसान की भरपाई करे।
3. भविष्य में दखल न देने की गारंटी
तेहरान चाहता है कि, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह ठोस गारंटी दी जाए कि अमेरिका आगे ईरान के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगा।
ईरान का कहना है कि, ये मांगें केवल सरकार की नहीं बल्कि देश की जनता, सशस्त्र बलों और नेतृत्व की सामूहिक मांग हैं।
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इस पूरे घटनाक्रम से पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा था कि, अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत जारी है और दोनों देशों के प्रतिनिधि संपर्क में हैं। ट्रंप के अनुसार, अमेरिका के प्रतिनिधि स्टीव विटकॉफ और जेरेड कुशनर ने एक ईरानी नेता से बात भी की है। हालांकि उन्होंने उस नेता का नाम सार्वजनिक नहीं किया।
ट्रंप ने यह भी कहा था कि, बातचीत को मौका देने के लिए ईरान के पावर प्लांट्स और ऊर्जा केंद्रों पर होने वाले संभावित हमलों को पांच दिनों के लिए टाल दिया गया है।
हालांकि, ईरान ने ट्रंप के इन दावों को पूरी तरह खारिज कर दिया है। ईरान के विदेश मंत्रालय ने साफ कहा कि, अमेरिका के साथ किसी भी तरह की बातचीत नहीं हो रही है और ट्रंप प्रशासन तेल बाजारों और वैश्विक वित्तीय बाजारों को शांत करने के लिए झूठे बयान दे रहा है। ईरानी संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बाघेर गालिबाफ ने भी कहा कि देश की जनता हमलावरों को कड़ी सजा देने की मांग कर रही है और केवल बातचीत से अब काम नहीं चलेगा।
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ईरान की संसद के उपसभापति अली निकजाद ने भी ट्रंप पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि, ट्रंप झूठ बोल रहे हैं और अगर वास्तव में बातचीत हो रही है तो यह बताया जाए कि अमेरिका ने किस ईरानी नेता से संपर्क किया है। निकजाद ने कहा कि अमेरिका पर भरोसा करना मुश्किल है क्योंकि पहले भी दो बार जून 2025 और फरवरी 2026 में जब बातचीत आगे बढ़ रही थी, उसी दौरान अमेरिका ने ईरान पर हमले कर दिए थे।
मोहसिन रेजाई ने यह भी दावा किया कि, यह युद्ध एक हफ्ते के भीतर खत्म हो सकता था। उनके मुताबिक, अमेरिका युद्धविराम के लिए तैयार था और संघर्ष समाप्त करने की दिशा में आगे बढ़ रहा था। लेकिन इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने हमले जारी रखने पर जोर दिया, जिसके कारण युद्ध लंबा खिंच गया।
रेजाई ने कहा कि, युद्ध के 15वें दिन के बाद अमेरिका को भी समझ आ गया था कि इस संघर्ष में जीत का कोई स्पष्ट रास्ता नहीं है।
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मौजूदा संघर्ष की शुरुआत 28 फरवरी को हुई थी, जब अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर बड़े पैमाने पर हवाई हमले किए थे। इन हमलों के बाद ईरान ने जवाबी कार्रवाई शुरू कर दी और इसके बाद से मिडिल ईस्ट में हालात लगातार बिगड़ते गए। युद्ध के दौरान मिसाइल हमले, ऊर्जा केंद्रों पर हमले और समुद्री मार्गों पर तनाव लगातार बढ़ता गया।
इस युद्ध का सबसे बड़ा असर होर्मुज जलडमरूमध्य पर पड़ा है, जो दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में से एक है। ईरान ने चेतावनी दी है कि, जब तक उसके क्षतिग्रस्त बुनियादी ढांचे का पुनर्निर्माण नहीं होता, तब तक होर्मुज का रास्ता बंद रहेगा। इस रास्ते के बंद होने से वैश्विक तेल बाजार में भारी उथल-पुथल मच गई है और कच्चे तेल की कीमतें लगभग 115 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई हैं।
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अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के मुताबिक, इस संघर्ष के कारण खाड़ी क्षेत्र के कई देशों की ऊर्जा व्यवस्था पर भी गंभीर असर पड़ा है। बताया जा रहा है कि सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और कतर समेत नौ प्रमुख देशों के लगभग 40 प्रतिशत ऊर्जा ढांचे को नुकसान पहुंचा है। इस वजह से वैश्विक तेल आपूर्ति लगभग 11 मिलियन बैरल प्रतिदिन कम हो गई है, जो 2022 के बाद सबसे बड़ा ऊर्जा संकट माना जा रहा है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, ट्रंप का युद्ध से बातचीत की ओर झुकाव कई कारणों से हुआ है।
1. युद्ध का बढ़ता खर्च
अमेरिकी रक्षा मंत्रालय ने लगभग 19 लाख करोड़ रुपए के अतिरिक्त बजट की मांग की है और युद्ध में हर दिन हजारों करोड़ रुपये खर्च हो रहे हैं।
2. इजरायल के परमाणु केंद्रों पर हमला
ईरान ने इजरायल के डिमोना और अरद परमाणु केंद्रों पर मिसाइल हमले किए, जिससे अमेरिका और इजरायल दोनों दबाव में आ गए।
3. नाटो का समर्थन नहीं मिला
नाटो के 32 सदस्य देशों ने इस युद्ध में सीधे सैन्य मदद देने से इनकार कर दिया।
4. ताइवान में चिप उत्पादन संकट
मिडिल ईस्ट संकट का असर वैश्विक सेमीकंडक्टर उद्योग पर भी पड़ा है, जिससे टेक कंपनियों पर दबाव बढ़ गया है।
5. वैश्विक ऊर्जा संकट
खाड़ी क्षेत्र के ऊर्जा ढांचे को नुकसान होने से तेल और गैस की वैश्विक आपूर्ति प्रभावित हुई है।
6. अमेरिका में मिडटर्म चुनाव
नवंबर में होने वाले मिडटर्म चुनाव ट्रंप के लिए बड़ी चुनौती हैं और युद्ध के कारण बढ़ती महंगाई उनकी लोकप्रियता को प्रभावित कर रही है।
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फिलहाल दोनों पक्षों के बयान बताते हैं कि हालात अभी सामान्य होने से काफी दूर हैं। एक तरफ ट्रंप प्रशासन बातचीत और कूटनीति की बात कर रहा है, वहीं ईरान ने साफ कर दिया है कि जब तक उसकी शर्तें पूरी नहीं होतीं, तब तक युद्ध खत्म नहीं होगा। मिडिल ईस्ट में जारी यह संघर्ष अब केवल क्षेत्रीय नहीं बल्कि वैश्विक राजनीति, ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बड़ा संकट बनता जा रहा है।