
होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाली अंडरसी केबल्स वैश्विक इंटरनेट की अहम लाइफलाइन हैं। अगर इन्हें नुकसान पहुंचता है, तो कई देशों में इंटरनेट सेवाएं प्रभावित हो सकती हैं, जिसमें भारत भी शामिल है।
होर्मुज स्ट्रेट केवल तेल सप्लाई का मार्ग नहीं है, बल्कि यह डिजिटल दुनिया का भी एक बड़ा चोकपॉइंट है। इस क्षेत्र के नीचे कई इंटरनेशनल फाइबर ऑप्टिक केबल्स बिछी हुई हैं, जो एशिया, यूरोप और मिडिल ईस्ट को जोड़ती हैं। यही केबल्स वैश्विक डेटा ट्रैफिक का बड़ा हिस्सा संभालती हैं। खाड़ी देशों की इंटरनेट कनेक्टिविटी पूरी तरह इन पर निर्भर करती है। यूएई, सऊदी अरब, कतर और कुवैत जैसे देशों के लिए ये जीवनरेखा हैं। अगर यहां कोई बाधा आती है तो उसका असर सीमित नहीं रहेगा। कई देशों की डिजिटल सेवाएं एक साथ प्रभावित हो सकती हैं। यही कारण है कि इस क्षेत्र को रणनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील माना जाता है।
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हाल के दिनों में ईरान से जुड़े मीडिया और सुरक्षा एजेंसियों ने अंडरसी केबल्स की अहमियत को लेकर बयान दिए हैं। इससे यह आशंका पैदा हो गई है कि भविष्य में इन्हें निशाना बनाया जा सकता है। अब तक संघर्ष की चर्चा तेल टैंकर और मिसाइल हमलों तक सीमित थी। लेकिन अब डेटा इंफ्रास्ट्रक्चर को भी संभावित टारगेट माना जा रहा है। अगर ऐसा होता है तो यह पारंपरिक युद्ध से आगे बढ़कर डिजिटल युद्ध का रूप ले सकता है। इस तरह की रणनीति वैश्विक स्तर पर गंभीर असर डाल सकती है। इससे न सिर्फ संचार बल्कि आर्थिक गतिविधियां भी प्रभावित हो सकती हैं।
अगर अंडरसी केबल्स को नुकसान पहुंचता है तो सबसे पहले इंटरनेट स्पीड पर असर दिखेगा। इसके बाद वेबसाइट्स, क्लाउड सर्विसेस और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स प्रभावित होने लगेंगे। बैंकिंग सिस्टम, यूपीआई और डिजिटल पेमेंट सेवाएं भी बाधित हो सकती हैं। भारत की स्थिति भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं है क्योंकि उसका बड़ा डेटा ट्रैफिक मिडिल ईस्ट और यूरोप के रास्ते जाता है। ऐसे में इंटरनेशनल कनेक्टिविटी स्लो हो सकती है। हालांकि भारत के पास पूर्व दिशा में वैकल्पिक रूट है, लेकिन वह पूरी तरह पर्याप्त नहीं है। इसलिए जोखिम बना रहेगा।
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अंडरसी केबल्स को काटना तकनीकी रूप से आसान नहीं होता, लेकिन यह असंभव भी नहीं है। कई बार जहाजों के एंकर या समुद्री गतिविधियों के कारण भी केबल्स को नुकसान पहुंचता है। पहले भी ऐसे हादसे हो चुके हैं, जब एक ही घटना में कई केबल्स प्रभावित हुईं। अगर कोई देश जानबूझकर ऐसा करता है तो खतरा और बढ़ जाता है। एक साथ कई केबल्स को टारगेट किया जा सकता है। मरम्मत में लंबा समय लगता है और प्रभावित क्षेत्रों में सेवाएं बहाल होने में हफ्तों या महीनों लग सकते हैं। यही कारण है कि यह मुद्दा वैश्विक सुरक्षा से जुड़ा बड़ा खतरा बन गया है।