पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव का असर अब भारत की अर्थव्यवस्था पर साफ दिखाई देने लगा है। अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी Moody’s ने चालू वित्त वर्ष के लिए भारत की जीडीपी ग्रोथ का अनुमान घटाकर 6% कर दिया है, जो पहले 6.8% था। यह बदलाव केवल आंकड़ों का खेल नहीं बल्कि आने वाले समय में महंगाई, ईंधन कीमतों और आम लोगों के खर्च पर पड़ने वाले संभावित असर का संकेत है। रिपोर्ट में साफ तौर पर कहा गया है कि अगर पश्चिम एशिया में जारी तनाव लंबा खिंचता है, तो भारत की आर्थिक रफ्तार पर ब्रेक लग सकता है और महंगाई फिर से चिंता का कारण बन सकती है।
Moody’s की रिपोर्ट के मुताबिक अंतरराष्ट्रीय हालात खासकर पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष भारत की आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित कर सकता है। पहले जहां वित्त वर्ष 2026-27 के लिए 6.8% ग्रोथ का अनुमान था, अब इसे घटाकर 6% कर दिया गया है। यह संकेत है कि आने वाले महीनों में आर्थिक गतिविधियों में सुस्ती आ सकती है। इसका सीधा असर उद्योग, निवेश और खपत पर पड़ेगा, जिससे आर्थिक विकास की गति धीमी हो सकती है।
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है। रिपोर्ट के अनुसार करीब 55% कच्चा तेल और 90% से ज्यादा LPG पश्चिम एशिया से आता है। ऐसे में वहां की स्थिति में कोई भी अस्थिरता सीधे भारत पर असर डालती है। अगर सप्लाई प्रभावित होती है, तो ईंधन की कीमतें बढ़ेंगी, जिससे परिवहन और उत्पादन लागत भी बढ़ेगी।
Moody’s ने चेतावनी दी है कि फिलहाल महंगाई नियंत्रण में है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय हालात इसे ऊपर ले जा सकते हैं। अनुमान के मुताबिक 2026 में महंगाई दर लगभग 2.4% रही। वहीं 2027 में यह बढ़कर 4.8% तक जा सकती है। महंगे ईंधन और कच्चे माल का असर सीधे खाने-पीने की चीजों पर पड़ेगा, जिससे आम आदमी की जेब पर दबाव बढ़ेगा।
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भारत उर्वरकों के लिए भी आयात पर निर्भर है। ऐसे में अगर अंतरराष्ट्रीय कीमतें बढ़ती हैं, तो कृषि लागत बढ़ेगी और इसका असर खाद्य पदार्थों की कीमतों पर पड़ेगा। इसका मतलब है कि आने वाले समय में दाल, सब्जी और अनाज जैसी जरूरी चीजें महंगी हो सकती हैं।
सिर्फ Moody’s ही नहीं बल्कि कई अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने भी भारत की ग्रोथ को लेकर चिंता जताई है।
इन सभी रिपोर्ट्स में एक समान बात है- अंतरराष्ट्रीय तनाव भारत की अर्थव्यवस्था पर दबाव बना रहा है।
अगर महंगाई बढ़ती है, तो ब्याज दरों को लेकर भी बदलाव हो सकता है। रिपोर्ट के मुताबिक अगर हालात स्थिर रहे, तो दरें स्थिर रह सकती हैं लेकिन महंगाई बढ़ने पर दरों में धीरे-धीरे बढ़ोतरी हो सकती है। इसका असर लोन, EMI और निवेश पर पड़ेगा।
महंगे तेल और गैस की वजह से सरकार पर सब्सिडी का बोझ बढ़ सकता है। साथ ही टैक्स कलेक्शन प्रभावित हो सकता है, जीएसटी और कॉरपोरेट टैक्स में कमी आ सकती है और वित्तीय घाटा कम करना मुश्किल हो सकता है। इससे सरकार की आर्थिक योजनाओं पर भी असर पड़ सकता है।
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रिपोर्ट में बताया गया है कि हालिया घटनाओं के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में करीब 50% तक उछाल देखा गया है। यह बढ़ोतरी भारत जैसे आयात-निर्भर देश के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है।
हालांकि 2025 में भारत का चालू खाता घाटा घटकर 0.4% रहा लेकिन आने वाले समय में इसके बढ़ने की आशंका है। ध्यान देने वाली बात यह है कि भारत को मिलने वाले कुल रेमिटेंस का करीब 40% हिस्सा खाड़ी देशों से आता है।
पश्चिम एशिया भारतीय कृषि उत्पादों के लिए एक बड़ा बाजार है। अगर वहां तनाव बढ़ता है, तो व्यापार प्रभावित हो सकता है। इसका असर किसानों और निर्यातकों दोनों पर पड़ेगा।
इन सभी चुनौतियों के बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था पूरी तरह कमजोर नहीं है। 2025 में GDP ग्रोथ 7.5% रही। G-20 देशों में भारत सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था बना रहा। इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश और सुधार जारी हैं। यह संकेत है कि भारत के पास चुनौतियों से निपटने की क्षमता मौजूद है।