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PU Special :पहले अनुशासन और परंपराएं थीं, अब युवा पीढ़ी चाहती है अपनी बात कहने की आजादी

इंदौर की रिपोर्ट में 1938 में जन्मे रामचंद्र अग्रवाल की आजादी के दौर की यादों और उनकी पोती प्रियांशी अग्रवाल की आधुनिक सोच के जरिए दो पीढ़ियों के नजरिए का अंतर सामने आता है। पुरानी पीढ़ी अनुशासन और परंपराओं को महत्व देती थी, जबकि नई पीढ़ी शिक्षा, स्वतंत्र विचार, सवाल पूछने और अपनी बात खुलकर रखने को आजादी का अर्थ मानती है।
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पहले अनुशासन और परंपराएं थीं, अब युवा पीढ़ी चाहती है अपनी बात कहने की आजादी
इंदौर। रामचंद्र और प्रियांशी अग्रवाल।

प्रभा उपाध्याय, इंदौर। आज की युवा पीढ़ी उसी समाज में शिक्षा, सकारात्मक सोच और अपने विचारों को खुलकर रखने के अधिकार के साथ आगे बढ़ रही है। पुरानी पीढ़ी उन अनुशासनों और परंपराओं का सम्मान करती है, जिनके बीच उसने जीवन बिताया, वहीं नई पीढ़ी बदलते समय के साथ विचारों में बदलाव को जरूरी मानती है। आजादी की 79वीं वर्षगांठ पर तराना के 1938 में जन्मे रामचंद्र अग्रवाल की यादों के जरिए उस बदलाव को समझने की कोशिश, जिसमें अंग्रेजों से मिली आजादी से लेकर अपनी बात बेझिझक कहने की आजादी तक का सफर दिखाई देता है। वहीं उनकी पोती प्रियांशी अग्रवाल से भी हमने बात की जिन्होंने जेन-जी् के समय की आजादी के बारे में बताया।

रामचंद्र अग्रवाल की यादों में आजादी का जश्न

रामचंद्र अग्रवाल ने कहा-मेरा जन्म 1938 में उज्जैन जिले के तराना में हुआ। देश जब आजाद हुआ, तब हमारा परिवार यहीं रहता था। मेरे पिताजी ने अंग्रेजों का शासन देखा था। वे अक्सर बताते थे कि उस समय नियम-कायदे बहुत सख्त थे।  15 अगस्त 1947 को जब देश आजाद हुआ तो पूरे गांव में खुशी का माहौल था। लोगों के पास जो था, उसी से वे खुशी बांट रहे थे। कोई अपने घर से गुड़ लेकर आ रहा था तो कोई शक्कर। लोगों का मुंह मीठा कराया जाता और आजादी की खुशी मनाई जाती। मेरे पिताजी अनुशासन में पले थे। तो हमें भी अनुशासन में रहना पढ़ता था, पढ़ाई को लेकर थोड़े सख्त थे और गलती होने पर डांटने की बजाए समझाते थे।

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रीति रिवाजों का पालन  जरूरी था 

महिलाओं के लिए भी उस समय समाज और परिवार के कई नियम और पाबंदियां थीं। रीति-रिवाजों का पालन जरूरी माना जाता था। समय के साथ सब कुछ बदलता गया। आज हमारे पोते-पोतियां उस दौर की बातें सुनते हैं तो कई बार हंसते हैं या अनसुना कर देते हैं। हमारे समय में चंद्रशेखर आजाद और भगत सिंह जैसे क्रांतिकारी आदर्श थे। उन्होंने देश की आजादी के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। आजादी के बाद देश ही नहीं, समाज और परिवार भी बहुत बदले हैं। हमने गुलामी का दौर नहीं देखा, लेकिन उसे अपने माता-पिता की आंखों और उनकी बातों से जरूर महसूस किया। आज की पीढ़ी के लिए वह इतिहास है, जबकि हमारे लिए वह हमारी जिंदगी का हिस्सा रहा है।

बदलते दौर में आज की युवा पीढ़ी कहती है… 

प्रियांशी अग्रवाल का मानना है कि उस दौर से आज के दौर तक पहुंचने में लंबा समय बीता है। अब समाज और लोगों के सामने अपनी बात खुलकर रखने की आजादी है। हो सकता है कि हमारे विचार पुरानी रूढ़िवादी सोच और परंपराओं से मेल न खाते हों, लेकिन बदलते समय के साथ आज का युवा शिक्षित होने के साथ-साथ सकारात्मक सोच रखता है और सही-गलत के बीच अंतर समझने में सक्षम है। हम अपने दादा और पिता के उन नियमों और अनुशासन का भी सम्मान करते हैं, जिनके बीच उन्होंने अपना जीवन बिताया। वह उस समय की परिस्थितियों और समाज की सोच का हिस्सा था। लेकिन समय के साथ बदलाव जरूरी है। आज देश में ऐसा वातावरण होना चाहिए, जहां हर व्यक्ति बिना डर के अपने विचार सामने रख सके, सवाल पूछ सके और अपनी बात कह सके। यही लोकतंत्र की खूबसूरती है और आजादी का भी सही अर्थ है। हमारे लिए आजादी सिर्फ अंग्रेजों से मुक्ति नहीं, बल्कि अपने विचारों को स्वतंत्र रूप से व्यक्त करने, सही सोच के साथ आगे बढ़ने और समाज को बेहतर बनाने की स्वतंत्रता भी है। 

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Naresh Bhagoria
By Naresh Bhagoria

नरेश भगोरिया। 27 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हूं। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्ववि...Read More

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