सिर्फ बातें भूलना नहीं है डिमेंशिया का संकेत, इन लक्षणों को न करें नजरअंदाज

विशेषज्ञों के मुताबिक, एक ही सवाल बार-बार पूछना, जाने-पहचाने रास्तों में भटक जाना और दवाइयों या पैसों का हिसाब रखने में परेशानी होना जांच की जरूरत का संकेत है। भारत में बुजुर्गों की बढ़ती आबादी को देखते हुए इस बीमारी की समय पर पहचान महत्वपूर्ण है। डॉक्टरों का कहना है कि याददाश्त में बदलाव के दूसरे कारण भी हो सकते हैं, जिनमें कुछ का इलाज संभव है। शुरुआती जांच से बीमारी को समझने, उचित देखभाल और भविष्य की सहायता की योजना बनाने में मदद मिल सकती है।
याददाश्त में लगातार गिरावट को नजरअंदाज न करें
सीताराम भरतिया इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एंड रिसर्च में जेरियाट्रिक मेडिसिन के सलाहकार डॉ. हरजीत सिंह भट्टी ने कहा कि बुजुर्गों की याददाश्त, व्यवहार या रोजमर्रा के कामकाज में लगातार बदलाव दिखाई देने पर परिवार को ध्यान देना चाहिए। कभी-कभार चश्मा रखकर भूल जाना या किसी का नाम याद करने में समय लगना उम्र बढ़ने के साथ सामान्य हो सकता है। लेकिन कुछ ही मिनटों में एक ही सवाल बार-बार पूछना या किसी जरूरी बातचीत को भूल जाना डिमेंशिया के चेतावनी भरे संकेत हो सकते हैं। इसलिए ऐसे बदलावों को केवल बुढ़ापे का हिस्सा मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
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जाने-पहचाने कामों में परेशानी भी हो सकती है संकेत
डॉ. भट्टी के मुताबिक, जाने-पहचाने पड़ोस में रास्ता भटक जाना या घर के रोजमर्रा के काम करने में परेशानी होना भी डिमेंशिया के संभावित संकेत हैं। बिना स्पष्ट कारण के पैसों से जुड़ी गलतियां करना और दवाइयों का सही तरीके से प्रबंधन नहीं कर पाना भी चिकित्सकीय जांच की जरूरत दिखाता है। इसके अलावा भाषा से जुड़ी समस्याएं, असामान्य संदेह, चिड़चिड़ापन या उदासीनता जैसे बदलावों पर भी ध्यान देना चाहिए। परिवार को इन लक्षणों की अनदेखी करने के बजाय डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए।
रोजमर्रा की जिंदगी पर असर पड़ने पर लें चिकित्सकीय सलाह
राम मनोहर लोहिया अस्पताल में मेडिसिन की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. शेली दत्ता ने कहा कि याददाश्त की समस्या को किसी एक घटना के आधार पर नहीं आंकना चाहिए, बल्कि लगातार हो रहे बदलावों के स्वरूप को समझना चाहिए। उन्होंने कहा कि यह देखना महत्वपूर्ण है कि भूलने की समस्या व्यक्ति की रोजमर्रा की जिंदगी को कितना प्रभावित कर रही है। अगर कोई व्यक्ति सालों से घर की जिम्मेदारियां खुद संभाल रहा था, लेकिन अब जाने-पहचाने कामों में परेशानी महसूस करने लगे, अपॉइंटमेंट भूलने लगे या सामान्य वित्तीय लेन-देन न कर पाए, तो उसे चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए। सामाजिक कलंक और मानसिक बदलावों को केवल उम्र का असर मानने की प्रवृत्ति से बीमारी की पहचान में देरी हो सकती है।
डॉ. शेली दत्ता ने दिए जरूरी टिप्स
डॉ. शेली दत्ता ने कहा कि परिवारों को डिमेंशिया के संभावित लक्षणों से जूझ रहे व्यक्ति के साथ धैर्य और सम्मान से पेश आना चाहिए। ऐसे में बहस करने से बचना चाहिए और याददाश्त, व्यवहार या रोजमर्रा के कामों में दिखाई देने वाले बदलावों को लिखकर रखना उपयोगी हो सकता है। डॉक्टर से परामर्श के दौरान ऐसा रिश्तेदार महत्वपूर्ण जानकारी दे सकता है, जो संबंधित व्यक्ति को अच्छी तरह जानता हो। शुरुआती जांच से परिवार को बीमारी समझने, सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर चर्चा करने और लंबे समय तक देखभाल की योजना बनाने का समय मिल सकता है।
डिमेंशिया की पहचान के लिए जरूरी है जांच
दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के नेशनल सेंटर फॉर एजिंग में जेरियाट्रिक मेडिसिन के प्रमुख डॉ. अविनाश चक्रवर्ती ने कहा कि डिमेंशिया का आकलन व्यापक चिकित्सकीय जांच के आधार पर होना चाहिए। यह किसी एक स्मृति परीक्षण या किसी एक लक्षण के आधार पर तय नहीं किया जा सकता। जांच में संबंधित व्यक्ति और परिवार के किसी करीबी सदस्य से विस्तृत जानकारी लेना, दवाइयों की समीक्षा करना और तंत्रिका तंत्र की जांच करना शामिल है। इसके साथ यह भी देखा जाता है कि मानसिक क्षमताओं में बदलाव व्यक्ति की रोजमर्रा की गतिविधियों और स्वतंत्र रूप से काम करने की क्षमता को किस तरह प्रभावित कर रहे हैं।
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याददाश्त की हर समस्या डिमेंशिया नहीं
डॉ. चक्रवर्ती के मुताबिक, अवसाद, नींद से जुड़े विकार, दवाइयों के दुष्प्रभाव और कुछ अन्य चिकित्सकीय स्थितियां भी याददाश्त तथा एकाग्रता को प्रभावित कर सकती हैं। इनमें से कुछ कारणों का इलाज संभव है, इसलिए भूलने की हर घटना को डिमेंशिया मान लेना सही नहीं है। डिमेंशिया उन स्थितियों के लिए इस्तेमाल होने वाला व्यापक शब्द है, जिनमें मानसिक क्षमताओं में इतनी गंभीर गिरावट आती है कि व्यक्ति की स्वतंत्र रूप से काम करने की क्षमता प्रभावित होती है। अल्जाइमर रोग डिमेंशिया का सबसे आम कारण है, इसलिए लक्षण दिखाई देने पर समय पर चिकित्सकीय मूल्यांकन कराना महत्वपूर्ण है।




















