World Polio Day 2026: पोलियो की दो बूंदें कितनी जरूरी? एक भी डोज छूटने पर क्या करें, बार-बार वैक्सीन पिलाने की क्या है वजह?

विश्व पोलियो दिवस 2026 पर जानें बच्चों को बार-बार पोलियो ड्रॉप्स क्यों पिलाई जाती हैं, एक खुराक छूटने पर क्या करें और पोलियो ड्रॉप्स व इंजेक्शन दोनों क्यों जरूरी हैं।
World Polio Day 2026: पोलियो की दो बूंदें कितनी जरूरी? एक भी डोज छूटने पर क्या करें, बार-बार वैक्सीन पिलाने की क्या है वजह?

पोलियो की दो बूंदें... एक छोटा-सा कदम, जो बच्चे को जिंदगीभर की विकलांगता से बचाने में अहम भूमिका निभा सकता है। लेकिन क्या बच्चे को एक बार पोलियो ड्रॉप्स पिला देना काफी है? अगर पहले वैक्सीन लग चुकी है, तो पल्स पोलियो अभियान में दोबारा बूंदें पिलाने की जरूरत क्यों पड़ती है? और अगर कोई खुराक छूट जाए, तो माता-पिता को क्या करना चाहिए? विश्व पोलियो दिवस 2026 के मौके पर समझिए पोलियो से जुड़े इन जरूरी सवालों के जवाब। 

विश्व पोलियो दिवस 2026 कब है?

विश्व पोलियो दिवस हर साल 24 अक्टूबर को मनाया जाता है। वर्ष 2026 में यह दिन शनिवार को है। इसका उद्देश्य पोलियो के प्रति जागरूकता बढ़ाना और दुनिया को पोलियो मुक्त बनाने के लिए टीकाकरण तथा निगरानी की अहमियत को सामने लाना है।

पोलियो क्या है और यह कितना खतरनाक है?

पोलियो या पोलियोमाइलाइटिस एक संक्रामक बीमारी है, जो पोलियोवायरस के कारण होती है। यह मुख्य रूप से पांच साल से कम उम्र के बच्चों को प्रभावित करती है। वायरस शरीर में प्रवेश करने के बाद कुछ मामलों में नर्वस सिस्टम पर हमला कर सकता है, जिससे मांसपेशियों में कमजोरी और स्थायी लकवा हो सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मुताबिक, पोलियोवायरस से संक्रमित हर 200 में से लगभग एक मामले में ऐसा लकवा हो सकता है, जो ठीक नहीं होता। लकवे से प्रभावित लोगों में 5 से 10 प्रतिशत की मौत हो सकती है, अगर सांस लेने वाली मांसपेशियां काम करना बंद कर दें। पोलियो का कोई विशिष्ट इलाज नहीं है, लेकिन टीकाकरण से इससे बचाव संभव है।

5 साल से कम उम्र के बच्चों को ही क्यों दी जाती हैं पोलियो ड्रॉप्स?

पांच साल से कम उम्र के बच्चों में पोलियो संक्रमण का खतरा अधिक रहता है। इसीलिए पल्स पोलियो अभियान में इस उम्र के हर बच्चे तक पहुंचने पर जोर दिया जाता है। ध्यान देने वाली बात यह है कि पोलियो का खतरा केवल उन बच्चों तक सीमित नहीं है, जिन्हें पहले कोई खुराक नहीं मिली। टीकाकरण की पूरी सुरक्षा के लिए तय समय पर नियमित वैक्सीन लेना और अभियान के दौरान अतिरिक्त खुराक लेना- दोनों महत्वपूर्ण हैं।

एक बार नहीं, बार-बार पोलियो ड्रॉप्स क्यों पिलाई जाती हैं?

माता-पिता के मन में अक्सर सवाल आता है कि जब बच्चे को पहले ही पोलियो की खुराक दी जा चुकी है, तो अभियान के दौरान दोबारा बूंदें पिलाने की जरूरत क्यों है? इसकी वजह है कि हर बच्चे में वैक्सीन से पर्याप्त प्रतिरक्षा एक जैसी तरह से विकसित नहीं होती। ओरल पोलियो वैक्सीन की कई खुराकें देने से सुरक्षा मजबूत करने में मदद मिलती है। अतिरिक्त खुराकें उन बच्चों को भी सुरक्षा बढ़ाने का मौका देती हैं, जिन्हें पहले खुराक मिल चुकी है।

पल्स पोलियो अभियान का मकसद सिर्फ एक बच्चे का टीकाकरण करना नहीं, बल्कि समुदाय में वायरस के फैलाव की संभावना को कम करना भी है। इसलिए पांच साल से कम उम्र के बच्चे को अभियान के दौरान बूथ पर ले जाकर पोलियो ड्रॉप्स जरूर पिलाएं, भले ही उसे पहले भी खुराक मिल चुकी हो।

पोलियो की एक खुराक छूट जाए तो क्या करें?

अगर किसी वजह से बच्चे की पोलियो वैक्सीन की कोई नियमित खुराक छूट गई है, तो घबराने की जरूरत नहीं है। लेकिन इसे नजरअंदाज भी न करें।

बच्चे का टीकाकरण कार्ड देखें कि कौन-सी खुराक बाकी है।

अपने नजदीकी सरकारी स्वास्थ्य केंद्र, आशा कार्यकर्ता या एएनएम से संपर्क करें।

छूटी हुई खुराक और आगे के टीकाकरण का सही समय स्वास्थ्यकर्मी से पता करें।

नियमित टीकाकरण के साथ-साथ पल्स पोलियो अभियान में भी बच्चे को निर्धारित अतिरिक्त खुराक दिलवाएं।

याद रखें: नियमित टीकाकरण की कोई खुराक छूटने पर पूरा टीकाकरण कार्यक्रम आम तौर पर दोबारा शुरू नहीं करना पड़ता। स्वास्थ्यकर्मी की सलाह के अनुसार बाकी खुराकें पूरी कराई जाती हैं। अभियान की खुराक नियमित टीकाकरण का विकल्प नहीं है और न ही नियमित खुराक अभियान का विकल्प है।

पोलियो के लक्षण क्या हैं?

पोलियो से संक्रमित कई लोगों में कोई स्पष्ट लक्षण नहीं दिखते। कुछ लोगों में बुखार, थकान, सिरदर्द, उल्टी, गले में खराश या मांसपेशियों में दर्द जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। गंभीर मामलों में अचानक मांसपेशियों में कमजोरी या लकवा हो सकता है।

अगर किसी बच्चे में अचानक हाथ-पैर में कमजोरी, चलने में परेशानी या लकवे जैसे लक्षण दिखाई दें, तो तुरंत चिकित्सकीय सहायता लें। लक्षणों का इंतजार करने के बजाय समय पर टीकाकरण कराना ही बचाव का सबसे अच्छा तरीका है।

पोलियो ड्रॉप्स और इंजेक्शन, दोनों क्यों जरूरी हैं?

पोलियो से बचाव के लिए दो तरह की वैक्सीन इस्तेमाल होती हैं- ओरल पोलियो वैक्सीन (OPV), जो मुंह से बूंदों के रूप में दी जाती है, और इनएक्टिवेटेड पोलियो वैक्सीन (IPV), जो इंजेक्शन के जरिए दी जाती है। ओरल वैक्सीन आंतों में प्रतिरक्षा विकसित करने में मदद करती है, जिससे वायरस के प्रसार को रोकने में भी मदद मिल सकती है। वहीं, इंजेक्शन वाली वैक्सीन शरीर में पोलियो के खिलाफ सुरक्षा विकसित करती है। भारत के टीकाकरण कार्यक्रम में दोनों तरह की वैक्सीन की भूमिका है। बच्चे को किस उम्र में और कितनी खुराक देनी है, यह निर्धारित टीकाकरण कार्यक्रम के अनुसार तय होता है। इसलिए केवल पोलियो अभियान में बूंदें पिलवाकर नियमित टीकाकरण को अधूरा न छोड़ें।

भारत पोलियो मुक्त है, तो अब भी खतरा क्यों?

भारत में जंगली पोलियोवायरस का आखिरी मामला 2011 में सामने आया था और देश को 2014 में WHO के दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र के साथ पोलियो-मुक्त प्रमाणित किया गया। लेकिन दुनिया से पोलियो पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। अंतरराष्ट्रीय यात्रा के जरिए वायरस ऐसे देशों से दूसरे क्षेत्रों में पहुंच सकता है, जहां संक्रमण मौजूद है। अगर किसी समुदाय में टीकाकरण का स्तर कम हो, तो वायरस के फैलने का खतरा बना रह सकता है। इसी वजह से भारत में नियमित टीकाकरण, पल्स पोलियो अभियान और निगरानी जारी रखना जरूरी है। WHO के अनुसार, 1988 में वैश्विक पोलियो उन्मूलन अभियान शुरू होने के बाद दुनिया में जंगली पोलियोवायरस के मामलों में 99 प्रतिशत से अधिक कमी आई है। हालांकि, बीमारी का पूरी तरह उन्मूलन अभी बाकी है।

निष्कर्ष: बच्चे को पोलियो की दो बूंदें पिलाना जरूरी है, लेकिन केवल एक बार नहीं। पांच साल से कम उम्र के हर बच्चे को पल्स पोलियो अभियान के दौरान खुराक दिलवाएं और नियमित टीकाकरण का पूरा शेड्यूल भी स्वास्थ्यकर्मी की सलाह के अनुसार पूरा कराएं। क्योंकि पोलियो से बचाव में छोटी-सी लापरवाही भी भारी पड़ सकती है।

Shivani Gupta
By Shivani Gupta

शिवानी गुप्ता | MCU, भोपाल से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में ग्रेजुएशन | 9 वर्षों की टीवी और डिजिटल तक की य...

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