मदद के हाथ कम पड़े, लेकिन हौसला नहीं टूटा... जरूरतमंद बच्चों की दिवाली रोशन करने में जुटे अंकुश

ग्वालियर। दिवाली पर हर घर रोशनी और खुशियों से जगमगाता है, लेकिन कई जरूरतमंद बच्चों के लिए त्योहार की खुशियां जुटाना भी मुश्किल होता है। ऐसे बच्चों की दिवाली खास बनाने के लिए ग्वालियर के समाजसेवी अंकुश हर साल बस्तियों में पहुंचकर उनके साथ त्योहार मनाते हैं। हालांकि, इस बार उनके सामने मदद जुटाने की चुनौती है। आर्थिक मंदी के चलते दानदाताओं का सहयोग उम्मीद के मुताबिक नहीं मिल रहा है। इसके बावजूद अंकुश ने हिम्मत नहीं हारी है और बच्चों के चेहरों पर मुस्कान लाने की कोशिश में जुटे हैं।
इस बार कम मिल रहा सहयोग, आयोजन सीमित रखने की नौबत
अंकुश बताते हैं कि उन्होंने इस बार भी कई लोगों से संपर्क कर बच्चों की दिवाली के लिए मदद मांगी है। अलग-अलग जगह बातचीत की, लेकिन अब तक अपेक्षित सहयोग नहीं मिल पाया है। पिछले वर्षों में बच्चों को नए कपड़े, मिठाई, पटाखे और उपहार दिए जाते थे। इस बार सहयोग कम मिलने के कारण आयोजन पहले की तुलना में सीमित रखना पड़ सकता है। हालांकि, अंकुश का कहना है कि मदद छोटी हो या बड़ी, किसी बच्चे के चेहरे पर मुस्कान लाने के लिए काफी होती है। इसलिए सहयोग कम होने के बावजूद उन्होंने अपनी कोशिश जारी रखी है।
बच्चों की मुस्कान बनी पहल की वजह
अंकुश बताते हैं कि बच्चों के चेहरों पर खुशी देखकर ही उनके मन में उनके साथ दिवाली मनाने का विचार आया था। उनका मानना है कि त्योहार की खुशियों पर हर बच्चे का अधिकार है। इसी सोच के साथ उन्होंने जरूरतमंद बच्चों के बीच दिवाली मनाने की शुरुआत की। यह उनका पहला आयोजन नहीं है। वे हर साल शहर की जरूरतमंद बस्तियों में जाकर बच्चों के साथ त्योहार मनाते हैं। इस बार भी दिवाली पर अलग-अलग बस्तियों में पहुंचकर बच्चों को खुशियां बांटने की तैयारी है।
सहयोग कम, लेकिन उम्मीद अब भी कायम
इस बार आर्थिक सहयोग की कमी ने अंकुश के सामने मुश्किलें जरूर खड़ी की हैं, लेकिन उनका हौसला बरकरार है। वे चाहते हैं कि समाज के सक्षम लोग आगे आएं और अपनी सामर्थ्य के अनुसार इस पहल में योगदान दें, ताकि जरूरतमंद बच्चों की दिवाली भी खुशियों से रोशन हो सके। उनका संदेश साफ है कि किसी की मदद करने के लिए बड़ी रकम जरूरी नहीं है। छोटी-सी कोशिश भी किसी बच्चे के त्योहार को यादगार बना सकती है।




















