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PU Special :1947 की आजादी से आज की स्वतंत्रता तक-बदली सोच, कायम है भारत की मजबूत तस्वीर

ग्वालियर के 90 वर्षीय सेवानिवृत्त प्राचार्य दीपानंद नाथ शास्त्री और उनकी पोती सिमरन शास्त्री ने आजादी के बदलते मायनों पर अपने विचार साझा किए। शास्त्री ने 1947 की स्वतंत्रता को संघर्ष और बलिदान की विरासत बताया, जबकि सिमरन ने शिक्षा, रोजगार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और जिम्मेदार नागरिकता को आधुनिक आजादी का आधार माना।
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1947 की आजादी से आज की स्वतंत्रता तक-बदली सोच, कायम है भारत की मजबूत तस्वीर
ग्वालियर के शास्त्री परिवार के अलग-अलग पीढ़ियों के सदस्य।

अम्बरीश आनंद, ग्वालियर। आजादी का अर्थ हर पीढ़ी के लिए अलग हो सकता है, लेकिन देश के प्रति जिम्मेदारी और मजबूत भारत का सपना सभी को एक सूत्र में जोड़ता है।पीपुल्स समाचार से खास बातचीत में 90 वर्षीय सेवानिवृत्त प्राचार्य दीपानंद नाथ शास्त्री ने कहा कि पहले लोगों को किसी भी बात के लिए जागरूक करना पड़ता था, साथ अपनी बात रखने के लिए सैकड़ों बार सोचना पड़ता था, लेकिन आज की पीढ़ी को सामाजिक माध्यमों के जरिए हर विषय की जानकारी तुरंत मिल जाती है। युवा अपनी बात बेबाकी से रखते हैं और अपने अधिकारों को लेकर पहले की अपेक्षा अधिक सजग हैं। हमने उस दौर का संघर्ष भी देखा है, इसलिए आज की स्वतंत्रता का महत्व और अधिक समझ में आता है।

हमने संघर्ष, स्वतंत्रता की कीमत और विभाजन का दर्द करीब से देखा: दीपानंद नाथ शास्त्री 

सेवानिवृत्त प्राचार्य दीपानंद नाथ शास्त्री ने बताया कि- वर्ष 1947 में जब देश अंग्रेजी शासन से मुक्त हुआ, तब आजादी का अर्थ था अपने देश पर अपना शासन, तिरंगे का सम्मान और गुलामी की बेड़ियों से मुक्ति। हमने विभाजन का दर्द, संघर्ष और स्वतंत्रता की कीमत को करीब से देखा है। हमारे लिए आजादी केवल उत्सव नहीं, बल्कि अनगिनत बलिदानों और संघर्षों की विरासत है। 1947 की आजादी ने भारतीयों को अपने फैसले स्वयं लेने का अधिकार दिया, जबकि आज की आजादी उस अधिकार का जिम्मेदारी के साथ इस्तेमाल करने की परीक्षा है। हमारे लिए राष्ट्र सर्वोपरि है।

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युवा पीढ़ी स्वतंत्रता के साथ समानता, व्यक्तिगत अधिकारों को महत्वपूर्ण मानती है: सिमरन

दीपानंद नाथ शास्त्री की पोती सिमरन शास्त्री का मानना है कि आजादी का मतलब अपनी पसंद से शिक्षा हासिल करना, रोजगार चुनना, अपनी बात रखना, सपने देखना और उन्हें पूरा करने का अवसर मिलना है। डिजिटल युग ने अभिव्यक्ति के माध्यमों को व्यापक बनाया है। युवा सामाजिक माध्यमों के जरिए अपनी आवाज देश और दुनिया तक पहुंचा सकते हैं। अधिकारों के साथ देश की प्रगति में योगदान देना और जिम्मेदार नागरिक बनना भी उनका कर्तव्य है। तीनों पीढ़ियों की सोच में अंतर जरूर है, लेकिन मंजिल एक ही है, मजबूत, सुरक्षित, आत्मनिर्भर और समृद्ध भारत। वर्ष 1947 की आजादी हमें अपने पूर्वजों के संघर्ष और बलिदान की याद दिलाती है, जबकि आज की आजादी हमें यह जिम्मेदारी देती है कि हम देश को आने वाली पीढ़ियों के लिए और बेहतर बनाएं। असली स्वतंत्रता तभी सार्थक होगी, जब हम अपने अधिकारों के साथ कर्तव्यों का भी ईमानदारी से पालन करें।

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Naresh Bhagoria
By Naresh Bhagoria

नरेश भगोरिया। 27 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हूं। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्ववि...Read More

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