PU Special :95 साल की आंखों देखी आजादी, तिरंगे के सफर से इमरजेंसी तक; भरत चंद्र नायक ने देखा बदलता भारत

अम्बरीश आनंद, ग्वालियर। आजादी के 80वें साल में जब देश एक बार फिर 15 अगस्त को तिरंगे को सलाम करने की तैयारी कर रहा है, तब कुछ लोगों की जिंदगी खुद आजाद भारत के इतिहास का दस्तावेज बन जाती है। 95 वर्षीय पूर्व जनसंपर्क अधिकारी भरत चंद्र नायक ऐसे ही लोगों में शामिल हैं, जिन्होंने न सिर्फ अंग्रेजों का दौर देखा बल्कि आजादी के बाद देश को बदलते हुए भी अपनी आंखों के सामने देखा। उन्होंने तिरंगे को पहली बार आजाद भारत में शान से लहराते देखा, बदलती राजनीति को करीब से महसूस किया, इमरजेंसी के दौर को अपनी आंखों के सामने गुजरते देखा और पत्रकारिता के उस दौर के भी गवाह रहे, जब अखबार सिर्फ खबरें प्रकाशित करने तक सीमित नहीं थे बल्कि सत्ता के सामने अपनी बात रखने का साहस भी दिखाते थे। पीपुल्स समाचार से विशेष बातचीत में भरत चंद्र नायक ने अपने जीवन के अनुभव साझा करते हुए कहा कि उनके लिए आजादी केवल इतिहास की किताबों में दर्ज घटनाओं का नाम नहीं है। उन्होंने देश को बदलते देखा है और समय को कई बार करवट लेते हुए महसूस किया है।
मंत्री की खबर सही लेकिन तस्वीर हमेशा उलटी छपती थी
ग्वालियर में नौकरी के दौरान का एक किस्सा सुनाते हुए भरत चंद्र नायक ने उस दौर की पत्रकारिता के तेवर का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि एक बड़े अखबार की किसी बात को लेकर एक बड़े मंत्री से विवाद हो गया था। इसके बाद अखबार ने तय किया कि अब मंत्री की तस्वीर सामान्य तरीके से प्रकाशित नहीं की जाएगी। इसके बाद जो हुआ, वह उस समय की पत्रकारिता के अलग अंदाज की मिसाल बन गया। मंत्री से जुड़ी खबरें पूरी तरह सही तरीके से प्रकाशित होती रहीं, लेकिन उनकी तस्वीर हमेशा उलटी छापी जाती थी। यह सिलसिला लंबे समय तक चलता रहा। बताया गया कि जब तक मंत्री ने अपने व्यवहार को लेकर खेद व्यक्त नहीं किया, तब तक अखबार ने तस्वीर उलटी प्रकाशित करना जारी रखा। नायक कहते हैं कि उस दौर के अखबारों में सत्ता से असहमति जताने और अपनी बात रखने का अलग ही तेवर था।
अंग्रेजों का दौर भी देखा और आज का भारत भी
95 साल के अपने जीवन को याद करते हुए भरत चंद्र नायक कहते हैं कि उन्होंने अंग्रेजों का दौर भी देखा है और आजादी के बाद देश में हुए बड़े बदलावों को भी करीब से महसूस किया है। उन्होंने आजादी के बाद तिरंगे को सम्मान के साथ लहराते देखा। देश की राजनीति और व्यवस्था में बदलाव देखे। इमरजेंसी का दौर देखा और उसके बाद पत्रकारिता के बदलते स्वरूप को भी महसूस किया। उनका कहना है कि उस समय और आज के समय में काफी बदलाव आया है। राजनीति बदली, व्यवस्था बदली, पत्रकारिता बदली और समाज भी लगातार बदलता गया।
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पिता की आंखों में दर्ज इतिहास को मैंने उनके साथ जिया
भरत चंद्र नायक के पुत्र प्रफुल्ल नायक कहते हैं कि हाल में उन्हें काफी समय तक अपने पिता के साथ बैठकर बातचीत करने का मौका मिला। इस दौरान पिता ने जीवन, नौकरी, देश और बदलते समय से जुड़े कई ऐसे किस्से सुनाए, जो उनके लिए महज पारिवारिक यादें नहीं, बल्कि एक पूरे दौर की तस्वीर हैं। प्रफुल्ल कहते हैं कि पिता की बातें सुनते हुए उन्हें महसूस हुआ कि किसी व्यक्ति के 95 साल सिर्फ उसकी उम्र नहीं होते। ये 95 साल देश, समाज, व्यवस्था, राजनीति, पत्रकारिता और बदलती पीढ़ियों के भी 95 साल होते हैं। उन्होंने अपने पिता के जीवन को आजादी के बाद भारत के सफर से जोड़ते हुए कहा कि उन्होंने अंग्रेजों का समय देखा, आजादी का दौर देखा, तिरंगे को शान से लहराते देखा, इमरजेंसी देखी और बदलती सत्ता के साथ पत्रकारिता के तेवरों में आया बदलाव भी देखा।
'ये मेरे ब्याज के ब्याज हैं'
प्रफुल्ल नायक ने परिवार की एक तस्वीर का जिक्र करते हुए कहा कि तस्वीर में जिन बच्चों के कंधों पर उनके पिता ने हाथ रखा है, वे उनके 'ब्याज के ब्याज' हैं। वे इसे चक्रवर्ती ब्याज की चौथी पीढ़ी बताते हैं। एक तरफ 95 साल का जीवन है और दूसरी तरफ चौथी पीढ़ी का बचपन। इन दोनों के बीच भारत की आजादी से लेकर आज तक का पूरा सफर समाया हुआ है। यही तस्वीर उस बदलाव को भी दिखाती है जिसमें एक पीढ़ी ने गुलामी का दौर देखा, अगली पीढ़ियों ने आजादी को जिया और अब चौथी पीढ़ी उस आजादी की विरासत को आगे ले जा रही है।
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कुछ लोगों की जिंदगी खुद इतिहास का दस्तावेज होती है
हर साल 15 अगस्त देश को आजादी की कहानी याद दिलाता है। तिरंगा हमें उन संघर्षों की याद दिलाता है, जिनके बाद देश स्वतंत्र हुआ। लेकिन कुछ लोगों की जिंदगी में यह इतिहास किताबों के पन्नों तक सीमित नहीं रहता। भरत चंद्र नायक की 95 साल की जिंदगी भी ऐसे ही एक जीवंत दस्तावेज की तरह है। उन्होंने देश को गुलामी से आजादी की ओर बढ़ते देखा। तिरंगे को पहली बार सम्मान के साथ लहराते देखा। बदलती राजनीति और व्यवस्था को देखा। इमरजेंसी जैसी ऐतिहासिक घटना को अपनी आंखों के सामने से गुजरते देखा। पत्रकारिता के तेवर बदलते देखे और अब उसी आजादी की विरासत को चौथी पीढ़ी के सामने देख रहे हैं। शायद वक्त की सबसे खूबसूरत तस्वीर यही है- जिस पीढ़ी ने गुलामी का दौर देखा, उसकी अगली पीढ़ियों ने आजादी को जिया और अब चौथी पीढ़ी उस आजादी की विरासत को आगे बढ़ा रही है।













