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PU Special :77 साल से हर महीने आती है शहादत की याद, 105 साल की सूखी कुंवर आज भी कहती हैं-‘वो देश के लिए गए थे’

1948 के युद्ध में शहीद हुए ग्वालियर के सैनिक जिलेदार सिंह का पार्थिव शरीर कभी घर नहीं लौटा। तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल  नेहरू का संवेदना पत्र आज भी परिवार के पास धरोहर के रूप में संभालकर रखा हुआ है। शहीद की 105 वर्षीय पत्नी सूखी  कुंवर 77 सालों से पति की यादों के साथ जीवन व्यतीत कर रही हैं।
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77 साल से हर महीने आती है शहादत की याद, 105 साल की सूखी कुंवर आज भी कहती हैं-‘वो देश के लिए गए थे’
ग्वालियर। शहीद जिलेदार सिंह की पत्नी परिवार की पांचवीं पीढ़ी के बच्चे के साथ।

सागर यादव, ग्वालियर। हर साल 15 अगस्त को जब पूरा देश तिरंगा फहराकर आजादी का जश्न मनाता है, तब ग्वालियर के एक घर में आज भी शहादत की एक अनकही कहानी जीवित हो उठती है। यह कहानी है 105 वर्षीय सूखी कुंवर की, जिनकी जिंदगी पिछले 77 वर्षों से अपने शहीद पति राइफलमैन जिलेदार सिंह की स्मृतियों के साथ गुजर रही है। उनके लिए हर स्वतंत्रता दिवस सिर्फ उत्सव नहीं, बल्कि उस कीमत की याद है जो एक सैनिक और उसका परिवार देश के लिए चुकाता है। 

सैनिक का पार्थिव शरीर कभी घर नहीं लौटा

सूखी कुंवर के पति जिलेदार सिंह भारतीय सेना में थे। वर्ष 1948 के युद्ध में उन्होंने मातृभूमि की रक्षा करते हुए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। लेकिन उनका पार्थिव शरीर कभी घर नहीं पहुंचा। सेना से शहादत का संदेश आया और कुछ समय बाद सिर्फ उनकी टोपी और बेल्ट परिवार तक पहुंची। इन्हीं निशानियों को सीने से लगाकर परिवार ने अपने बेटे, पति और सैनिक को अंतिम विदाई दी। उनके घर में आज भी पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू का भेजा गया संवेदना पत्र सुरक्षित रखा है। यह केवल एक पत्र नहीं, बल्कि उस दौर का प्रमाण है जब पूरा राष्ट्र अपने शहीदों के परिवारों के साथ खड़ा था। परिवार इसे अपनी सबसे बड़ी धरोहर मानता है। 

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आटे के पुतले का हुआ अंतिम संस्कार

शरीर नहीं मिला, इसलिए परंपरा निभाने के लिए आटे का पुतला बनाकर अंतिम संस्कार किया गया। उस दिन गांव रोया था, लेकिन हर आंख में गर्व भी था कि गांव का एक बेटा देश के लिए अमर हो गया।

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राष्ट्र अपने वीर सपूत को नहीं भूला 

शहादत के बाद सरकार ने सूखी कुंवर को पारिवारिक पेंशन स्वीकृत की। पिछले 77 वर्षों से यह पेंशन लगातार उनके पास पहुंच रही है। उनके लिए यह राशि सिर्फ आर्थिक सहायता नहीं, बल्कि हर महीने मिलने वाला वह सम्मान है जो उन्हें याद दिलाता है कि राष्ट्र अपने वीर सपूत को भूला नहीं है।

देश सबसे पहले है, बाकी सब बाद में

समय बदल गया। पीढ़ियां बदल गईं। देश आजादी के 100वें वर्ष की ओर बढ़ रहा है, लेकिन सूखी कुंवर की स्मृतियों में वह युद्ध आज भी ताजा है। उनकी आंखों में उम्र की धुंध है, मगर पति की शहादत का गर्व आज भी साफ दिखाई देता है। वे अक्सर कहती हैं कि देश सबसे पहले है, बाकी सब बाद में।

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105 वर्ष की आयु में भी सकारात्मक 

परिजन बताते हैं कि सूखी कुंवर आज भी दूध पीना पसंद करती हैं और मिठाई की शौकीन हैं। 105 वर्ष की आयु में भी उनका आत्मबल और जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण लोगों को प्रेरित करता है। बचपन में उन्होंने अपने परिवार को आजादी और विभाजन के दौर की कहानियां सुनाईं, जिससे नई पीढ़ी ने जाना कि स्वतंत्रता केवल एक तारीख नहीं, बल्कि अनगिनत बलिदानों की विरासत है। 

Naresh Bhagoria
By Naresh Bhagoria

नरेश भगोरिया। 27 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हूं। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्ववि...Read More

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