साल1947 में चौक के व्यापारियों की पहल पर पहली बार की गई थी भोपाल के राजा की स्थापना

मनोज चौरसिया
भोपाल। भोपाल के पीपल चौक गणेशोत्सव का अपना एक इतिहास है। राजधानी भोपाल में गणेश जी की झांकी सजाने और प्रतिमा विराजित करने की परंपरा साल 1947 में यहीं से शुरू हुई थी। आजादी से पहले, जब भोपाल में नवाबी शासन था, यहां इस तरह के आयोजन नहीं होते थे। जब 1947 में देश आजाद हो हुआ तो उसी साल से यहां गणेशोत्सव मनाने की परंपरा की शुरुआत हो गई और इसका श्रेय चौक के व्यापारियों को जाता है।
समिति के अध्यक्ष रामबाबू अग्रवाल ने बताया कि भोपाल के राजा श्री गजानन की प्रतिमा प्रारंभ से ही अपने मूल स्वरूप में विराजमान होती आ रही है। यहां श्री गणेश अपनी पत्नी रिद्धि-सिद्धि एवं पुत्र शुभ-लाभ के साथ विराजमान होते हैं। प्रारंभ से ही स्थापना से विसर्जन तक का पूरा आयोजन एवं पूजा अर्चना पौराणिक विधि-विधान से की जा रही है। साल 1947 में पहली बार चौक के व्यापारियों की पहल पर श्री गणेश जी को यहां स्थापित किया गया था। संस्थापक स्व. सिंघल थे, जो स्वयं एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भी रहे थे।
मथुरा के कारीगर तैयार करते करते हैं छप्पन भोग
समिति के सदस्य दीपक गोयल ने बताया कि भगवान श्री लंबोदर को नित्य भोग लगाया जाता है एवं शृंगार किया जाता है। गणेशोत्सव के दसवें दिन हवन में विशेष भोग लगाया जाता है। जिसमें 6 मन लड्डुओं के साथ, छप्पन भोग लगाया जाता है। मथुरा के कारीगरों द्वारा इसे तैयार किया जाता है। भोपाल के राजा का विसर्जन डोल ग्यारस पर किया जाता है। इस चल समारोह में कई प्रतिमाएं भी शामिल होती हैं। चलसमारोह की अगुवाई करते हैं भोपाल के राजा: दीपक गोयल ने बताया कि भोपाल के राजा ही डोल ग्यारस पर चल समारोह की अगुवाई करते हैं। उन्होंने बताया कि समिति ने कभी कोई पुरस्कार नहीं लिया क्योंकि हम सबका नेतृत्व करते हैं। हम दूसरी समितियों का नाम आगे बढ़ा देते हैं।





















