उपवास सिर्फ आस्था नहीं बल्कि विज्ञान भी! अब साइंस भी मानता है सेहत से जुड़े इसके फायदे

उपवास और सेहत के बीच संबंध पर देश-विदेश में कई शोध हुए हैं। ऑटोफैगी, वजन, सूजन, हृदय, ब्लड प्रेशर, कोलेस्ट्रॉल और डायबिटीज पर उपवास का असर पड़ सकता है।
उपवास सिर्फ आस्था नहीं बल्कि विज्ञान भी! अब साइंस भी मानता है सेहत से जुड़े इसके फायदे
उपवास सिर्फ आस्था नहीं बल्कि विज्ञान भी!

हम सभी जानते हैं कि उपवास को अच्छी सेहत से जोड़कर देखा जाता है। इस मान्यता को समझने के लिए देश-विदेश में हुए कई वैज्ञानिक शोधों का अध्ययन किया गया है। इन शोधों से भारत की सदियों पुरानी उपवास परंपरा और स्वास्थ्य के बीच संबंध को वैज्ञानिक नजरिए से समझने में मदद मिलती है। सरल शब्दों में कहें तो उपवास या व्रत का मतलब एक निश्चित समय तक भोजन से दूरी बनाना या बहुत कम मात्रा में भोजन करना है। आमतौर पर इंटरमिटेंट फास्टिंग में 12 से 24 घंटे तक भोजन से दूरी रखी जा सकती है, जबकि कुछ तरीके इससे अलग भी होते हैं। कुछ व्रतों में भोजन के साथ पानी पीने की अनुमति होती है जबकि कुछ में फलाहार, चाय या कॉफी ली जाती है। उदाहरण के लिए, नवरात्रि में कई लोग फलाहार करते हैं जबकि निर्जला एकादशी में व्रत के दौरान पानी भी नहीं पिया जाता। हालांकि उपवास का तरीका और अवधि हर व्यक्ति की परंपरा और स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार अलग हो सकती है। वैज्ञानिक शोध में भी उपवास के अलग-अलग तरीकों के परिणामों का अध्ययन किया जाता है।

ऑटोफैगी को बढ़ावा देता है उपवास

ऑटोफैगी हमारे शरीर की एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, जो कोशिकाओं के पुराने या क्षतिग्रस्त हिस्सों को तोड़कर उनका दोबारा इस्तेमाल करने में मदद करती है। अपोलो हेल्थकेयर की वेबसाइट Apollo247.com के अनुसार ऑटोफैगी को शरीर की कोशिकाओं की सफाई और रीसाइक्लिंग व्यवस्था के रूप में समझा जा सकता है। ऑटोफैगी शब्द ग्रीक भाषा से आया है जिसका अर्थ है ‘खुद को खाना’। इस प्रक्रिया में कोशिकाएं पुराने, खराब या बेकार हो चुके हिस्सों को तोड़कर उनसे उपयोगी सामग्री प्राप्त करती हैं। इसे कोशिकाओं की गहरी सफाई की तरह समझा जा सकता है।

व्रत से शुरू होती है ऑटोफैगी

जब शरीर को भोजन से मिलने वाली ऊर्जा उपलब्ध नहीं होती, तो वह ऊर्जा के दूसरे स्रोतों का इस्तेमाल करने लगता है। उपवास के दौरान इंसुलिन का स्तर कम हो सकता है और कोशिकाओं में ऊर्जा से जुड़ी प्रक्रियाओं में बदलाव आता है। इन बदलावों का संबंध ऑटोफैगी से भी है। इस प्रक्रिया में कोशिकाएं कुछ पुराने या क्षतिग्रस्त प्रोटीन और अन्य हिस्सों को तोड़कर उनका दोबारा इस्तेमाल करती हैं। हालांकि, यह जरूरी नहीं है कि उपवास शुरू करते ही ऑटोफैगी एक निश्चित समय पर सक्रिय हो जाए। इंसानों में इस प्रक्रिया के समय और स्तर को लेकर अभी और शोध की जरूरत है।

उपवास रखने के वैज्ञानिक फायदे

कई लोग मानते हैं कि व्रत-उपवास केवल एक धार्मिक अनुष्ठान है। लेकिन वैज्ञानिक शोध में उपवास और स्वास्थ्य के बीच कई संभावित संबंध सामने आए हैं। आइए जानते हैं उपवास से जुड़े प्रमुख स्वास्थ्य पहलुओं के बारे में।

1. कैंसर से बचाव और इलाज में संभावित भूमिका

अमेरिकन कैंसर सोसायटी के जर्नल में 2021 में प्रकाशित एक समीक्षा में बताया गया था कि कुछ परिस्थितियों में इंटरमिटेंट फास्टिंग कैंसर के इलाज और उससे जुड़े परिणामों पर सकारात्मक असर डाल सकती है। कुछ शोधों में ट्यूमर की वृद्धि और कीमोथेरेपी से होने वाले दुष्प्रभावों पर उपवास के संभावित प्रभावों का अध्ययन किया गया है। हालांकि शोधकर्ताओं का कहना है कि इस विषय पर बेहतर गुणवत्ता वाले क्लिनिकल ट्रायल की जरूरत है। कैंसर का इलाज करा रहे लोगों को डॉक्टर की सलाह के बिना उपवास शुरू नहीं करना चाहिए। इस तरह के मरीजों में उपवास का अध्ययन चिकित्सकीय निगरानी और उपयुक्त शोध परिस्थितियों में ही किया जाना चाहिए।

2. सूजन से लड़कर बेहतर स्वास्थ्य को बढ़ावा

सूजन शरीर की प्राकृतिक प्रतिरक्षा प्रक्रिया है, जो संक्रमण और चोट से लड़ने में मदद करती है। लेकिन लंबे समय तक बनी रहने वाली सूजन हृदय रोग, कैंसर और रुमेटीइड गठिया जैसी कुछ दीर्घकालिक बीमारियों से जुड़ी हो सकती है। अमेरिकी नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन के प्लेटफॉर्म PubMed सेंट्रल पर उपलब्ध शोधों में उपवास और सूजन के बीच संबंध का अध्ययन किया गया है। कुछ अध्ययनों में उपवास के बाद सूजन से जुड़े संकेतक सी-रिएक्टिव प्रोटीन (CRP) के स्तर में कमी देखी गई। 2022 की एक समीक्षा में 18 अध्ययनों के नतीजों के आधार पर बताया गया कि उपवास से CRP के स्तर में कमी आ सकती है। हालांकि परिणाम हर व्यक्ति में एक जैसे हों, यह जरूरी नहीं है। उपवास को सूजन से जुड़ी बीमारियों का इलाज नहीं माना जा सकता।

3. मोटापा कम करने में मदद

उपवास का एक प्रमुख संभावित फायदा वजन घटाने में मदद करना है। जब कोई व्यक्ति खाने की अवधि और कुल कैलोरी की मात्रा सीमित करता है, तो शरीर की चर्बी घट सकती है। हालांकि इसका असर इस बात पर निर्भर करता है कि उपवास के दौरान और बाकी समय में कितना और किस तरह का भोजन लिया जा रहा है। PubMed सेंट्रल पर उपलब्ध शोधों में इंटरमिटेंट फास्टिंग और लगातार कैलोरी कम करने वाली डाइट की तुलना की गई है। कुछ अध्ययनों में उपवास से वजन, शरीर की चर्बी और पेट के आसपास जमा चर्बी में कमी देखी गई है। लेकिन सभी अध्ययनों में इंटरमिटेंट फास्टिंग को सामान्य कैलोरी-नियंत्रित डाइट से बेहतर नहीं पाया गया। उपवास के दौरान पर्याप्त पोषण लेना जरूरी है। ठोस भोजन की जगह केवल तरल पदार्थ लेना हर व्यक्ति के लिए उचित नहीं है। वजन घटाने के लिए संतुलित आहार और नियमित शारीरिक गतिविधि भी महत्वपूर्ण हैं।

4. पाचन तंत्र को लेकर क्या कहते हैं शोध?

कुछ लोगों को भोजन का समय व्यवस्थित करने से पेट भारी रहने या बार-बार खाने की आदत में सुधार महसूस हो सकता है। लेकिन उपवास को पाचन तंत्र के लिए किसी प्रमाणित ‘हीलिंग थेरेपी’ या सभी पाचन विकारों के इलाज के रूप में नहीं देखा जा सकता। एक शोध में बताया गया कि 62.33 प्रतिशत लोगों को उपवास के दौरान अपच की समस्या नहीं हुई, जबकि 27 प्रतिशत लोगों ने अपच में सुधार की जानकारी दी। हालांकि, इन आंकड़ों के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि उपवास सभी लोगों की पाचन संबंधी परेशानियां दूर कर देता है। इसके लिए मूल शोध की पद्धति और प्रतिभागियों की स्वास्थ्य स्थिति को समझना जरूरी है। कुछ लोगों को लंबे समय तक खाली पेट रहने से एसिडिटी, कमजोरी या पेट से जुड़ी दूसरी परेशानियां भी हो सकती हैं। इसलिए बार-बार होने वाली पाचन संबंधी समस्याओं के लिए चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी है।

5. हृदय स्वास्थ्य को बढ़ावा देने में संभावित मदद

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार हृदय रोग दुनिया भर में मृत्यु के प्रमुख कारणों में शामिल हैं। उच्च रक्तचाप, खराब LDL कोलेस्ट्रॉल का बढ़ना, धूम्रपान और असंतुलित खानपान हृदय स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक हैं। कुछ अध्ययनों में इंटरमिटेंट फास्टिंग के साथ वजन, रक्तचाप और कोलेस्ट्रॉल से जुड़े मापदंडों में सुधार देखा गया है। अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन भी हृदय स्वास्थ्य के लिए संतुलित खानपान, नियमित शारीरिक गतिविधि और जोखिम कारकों को नियंत्रित रखने के महत्व पर जोर देता है। एक छोटे अध्ययन में आठ सप्ताह तक वैकल्पिक दिन उपवास करने वाले प्रतिभागियों में खराब LDL कोलेस्ट्रॉल में 25 प्रतिशत और ब्लड ट्राइग्लिसराइड्स में 32 प्रतिशत तक कमी दर्ज होने की जानकारी दी गई थी। यह एक विशिष्ट अध्ययन का नतीजा है, इसे सभी लोगों पर लागू नहीं किया जा सकता। हृदय रोग से बचाव के लिए केवल उपवास पर निर्भर रहना उचित नहीं है। जरूरत पड़ने पर डॉक्टर की सलाह, दवाएं और स्वस्थ जीवनशैली महत्वपूर्ण हैं।

6. ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करने में संभावित भूमिका

उच्च रक्तचाप से हृदय और रक्त वाहिकाओं से जुड़ी बीमारियों का जोखिम बढ़ सकता है। कुछ अध्ययनों में इंटरमिटेंट फास्टिंग के साथ रक्तचाप में कमी देखी गई है। यह असर वजन कम होने, कैलोरी सेवन घटने और खानपान में बदलाव से जुड़ा हो सकता है। हालांकि, उपवास सभी लोगों में ब्लड प्रेशर नियंत्रित करने का भरोसेमंद तरीका नहीं है। जिन लोगों को लो ब्लड प्रेशर की समस्या है, उन्हें लंबे समय तक भोजन और पानी से दूर रहने पर कमजोरी या चक्कर आने का खतरा हो सकता है। ब्लड प्रेशर की दवाएं लेने वाले लोगों को भी उपवास से पहले डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए।

7. ब्रेन फंक्शन और न्यूरोडीजेनेरेटिव विकारों पर असर

कई अध्ययनों में उपवास और मस्तिष्क के स्वास्थ्य के बीच संभावित संबंधों की जांच की गई है। चूहों पर किए गए एक अध्ययन में 11 महीने तक रुक-रुक कर उपवास कराने के बाद मस्तिष्क की संरचना और कुछ कार्यों में सुधार देखा गया। अन्य पशु अध्ययनों में भी उपवास के दौरान तंत्रिका कोशिकाओं और संज्ञानात्मक क्षमता से जुड़े बदलावों का अध्ययन किया गया है। शोधकर्ताओं ने यह भी जांचा है कि उपवास से सूजन और कोशिकाओं की मरम्मत से जुड़ी प्रक्रियाओं में बदलाव का मस्तिष्क पर क्या असर पड़ता है। कुछ पशु अध्ययनों में अल्जाइमर और पार्किंसंस जैसी न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारियों से जुड़े संभावित लाभों की चर्चा हुई है। हालांकि, इंसानों में उपवास से इन बीमारियों की रोकथाम या इलाज का पुख्ता प्रमाण अभी उपलब्ध नहीं है। इस विषय पर और मानव अध्ययनों की जरूरत है।

8. लंबी आयु देने में संभावित भूमिका

उपवास और लंबी उम्र के बीच संबंध को लेकर भी शोध किया गया है। कुछ पशु अध्ययनों में कैलोरी सीमित करने और भोजन के समय में बदलाव का उम्र बढ़ने से जुड़ी प्रक्रियाओं पर असर देखा गया है। इंसानों में अभी यह साबित नहीं हुआ है कि उपवास करने से उम्र निश्चित रूप से बढ़ती है। संतुलित और पौष्टिक भोजन, पर्याप्त नींद, नियमित शारीरिक गतिविधि और बीमारियों की समय पर पहचान स्वस्थ जीवन के लिए महत्वपूर्ण हैं। धार्मिक मान्यताओं में उपवास को संयम और स्वस्थ जीवनशैली से जोड़ा जाता है, लेकिन उपवास से लंबी उम्र मिलने के दावे को वैज्ञानिक रूप से स्थापित करने के लिए और शोध की जरूरत है।

9. कोलेस्ट्रॉल कम करने में मदद

खराब LDL कोलेस्ट्रॉल का स्तर बढ़ने से हृदय रोग का जोखिम बढ़ सकता है। कुछ अध्ययनों में इंटरमिटेंट फास्टिंग के साथ LDL कोलेस्ट्रॉल, कुल कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड्स के स्तर में कमी देखी गई है। हालांकि यह कहना सही नहीं होगा कि सप्ताह में एक बार उपवास करने से हर व्यक्ति का कोलेस्ट्रॉल नियंत्रित हो जाएगा। परिणाम व्यक्ति की डाइट, वजन, शारीरिक गतिविधि और स्वास्थ्य स्थिति पर निर्भर करते हैं। कोलेस्ट्रॉल कम करने के लिए संतुलित आहार, नियमित व्यायाम और डॉक्टर की सलाह के अनुसार इलाज जरूरी है। उपवास को कोलेस्ट्रॉल की दवाओं का विकल्प नहीं बनाना चाहिए।

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10. इम्युनिटी बढ़ाने में संभावित भूमिका

शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली संक्रमणों से लड़ने और शरीर को स्वस्थ रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। ऑटोफैगी कोशिकाओं के पुराने या क्षतिग्रस्त हिस्सों को तोड़ने और उनका दोबारा इस्तेमाल करने की प्रक्रिया है। इसका संबंध प्रतिरक्षा प्रणाली के कुछ कार्यों से भी है। कुछ अध्ययनों में उपवास के दौरान सूजन और कोशिकाओं की गतिविधियों से जुड़े बदलाव देखे गए हैं। लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि उपवास करने से हर व्यक्ति की इम्युनिटी मजबूत हो जाएगी या सभी बीमारियों से बचाव होगा। प्रतिरक्षा प्रणाली को ठीक से काम करने के लिए पर्याप्त प्रोटीन, विटामिन, खनिज, नींद और ऊर्जा की जरूरत होती है। लंबे समय तक बहुत कम भोजन लेने से पोषक तत्वों की कमी हो सकती है जिसका शरीर पर उल्टा असर भी पड़ सकता है।

11. शरीर को डिटॉक्स करने में मदद का दावा

उपवास को कई बार शरीर की सफाई या डिटॉक्स से जोड़कर देखा जाता है। शरीर में लिवर और किडनी जैसे अंग अपशिष्ट पदार्थों को संसाधित करने और बाहर निकालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऑटोफैगी कोशिकाओं के कुछ पुराने या क्षतिग्रस्त हिस्सों को तोड़कर उनका दोबारा इस्तेमाल करने में मदद करती है। उपवास के दौरान शरीर के मेटाबॉलिज्म में भी बदलाव हो सकता है। लेकिन इन प्रक्रियाओं को इस बात का प्रमाण नहीं माना जा सकता कि उपवास शरीर से सभी विषैले पदार्थ निकाल देता है। शरीर को स्वस्थ रखने के लिए पर्याप्त पानी, संतुलित भोजन और स्वस्थ जीवनशैली जरूरी हैं। लंबे समय तक केवल तरल पदार्थों पर निर्भर रहना या बिना चिकित्सकीय सलाह के लंबे उपवास करना नुकसानदायक हो सकता है।

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टाइप-2 डायबिटीज के जोखिम को कम करने में मदद

इंटरमिटेंट फास्टिंग और ब्लड शुगर के बीच संबंध पर कई अध्ययन हुए हैं। इनमें कुछ लोगों में इंसुलिन रेजिस्टेंस और फास्टिंग ब्लड शुगर के स्तर में कमी देखी गई है। इंसुलिन एक हार्मोन है, जो खून में मौजूद ग्लूकोज को शरीर की कोशिकाओं तक पहुंचाने में मदद करता है। जब कोशिकाएं इंसुलिन के प्रति कम प्रतिक्रिया देती हैं तो इसे इंसुलिन रेजिस्टेंस कहा जाता है। यह टाइप-2 डायबिटीज के विकास से जुड़ा एक प्रमुख कारक है।

अमेरिकी नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन पर उपलब्ध एक शोधपत्र के अनुसार, प्रीडायबिटीज वाले लोगों पर किए गए कुछ मानव अध्ययनों में 8 से 12 सप्ताह के दौरान फास्टिंग ब्लड शुगर में 3 से 6 प्रतिशत और फास्टिंग इंसुलिन में 20 से 31 प्रतिशत तक कमी दर्ज की गई। इंसुलिन रेजिस्टेंस कम होने पर शरीर इंसुलिन के प्रति बेहतर प्रतिक्रिया दे सकता है और खून से ग्लूकोज को कोशिकाओं तक पहुंचाने की क्षमता में सुधार हो सकता है। हालांकि इन आंकड़ों को हर व्यक्ति के लिए निश्चित परिणाम नहीं माना जा सकता। उपवास से डायबिटीज ठीक हो जाती है, ऐसा कहना भी सही नहीं है।

Ref:

Dr. Sumit  Shrivastava
By Dr. Sumit Shrivastava

सुमित श्रीवास्तव एक अनुभवी मीडिया प्रोफेशनल, बिजनेस पत्रकार और शोधकर्ता हैं। मास कम्युनिकेशन में M.P...

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