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EC बोला :सभी राज्यों की SIR प्रक्रिया अलग-अलग, जिनके नाम कटे, अब तक उनकी शिकायतें नहीं मिली

इस मामले में चुनाव आयोग की ओर से पेश वरिष्ठ वकील राकेश द्विवेदी ने SIR प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट में कई अहम बिंदु रखे। उन्होंने कहा कि स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) का आदेश एक सामान्य और देशव्यापी आदेश है, जो पूरे भारत में लागू होता है।
सभी राज्यों की SIR प्रक्रिया अलग-अलग, जिनके नाम कटे, अब तक उनकी शिकायतें नहीं मिली
AI जनरेटेड सारांश
    यह सारांश आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस द्वारा तैयार किया गया है और हमारी टीम द्वारा रिव्यू की गई है।

    नई दिल्ली। चुनाव आयोग ने मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में स्पष्ट किया कि स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया के तहत जिन मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए हैं, उनमें से अब तक किसी भी व्यक्ति की ओर से कोई औपचारिक शिकायत सामने नहीं आई है। SIR से जुड़ी सुनवाई के दौरान आयोग ने कहा कि किसी एक राज्य, जैसे पश्चिम बंगाल, के तथ्यों को आधार बनाकर अन्य राज्यों की SIR प्रक्रिया पर सवाल उठाना सही नहीं है।

    मतदाता सूची के सत्यापन का काम BLO ने किया- EC

    आयोग के मुताबिक, हर राज्य में यह प्रक्रिया स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग तरीके से पूरी की गई है। आयोग ने जबरदस्ती या अत्यधिक जांच के आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि इस पूरी कवायद में किसी भी स्तर पर पुलिस की भूमिका नहीं रही। मतदाता सूची के सत्यापन का काम केवल बूथ लेवल ऑफिसर्स (BLO) ने घर-घर जाकर किया है और प्रक्रिया पूरी तरह निर्धारित दिशा-निर्देशों के तहत संपन्न हुई है।

    अब जानें सीनियर वकील राकेश द्विवेदी ने क्या कहा

    • इस मामले में चुनाव आयोग की ओर से पेश वरिष्ठ वकील राकेश द्विवेदी ने SIR प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट में कई अहम बिंदु रखे। उन्होंने कहा कि स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) का आदेश एक सामान्य और देशव्यापी आदेश है, जो पूरे भारत में लागू होता है। इसमें केवल असम को अलग रखा गया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि SIR के तहत अपनाए जाने वाले सिद्धांत और दस्तावेजों का पूरा ढांचा पहले से ही तय है।
    • राकेश द्विवेदी ने बताया कि मतदाता सूची की तैयारी और उसके संशोधन से जुड़े कानूनी प्रावधान पहले से मौजूद हैं। संविधान के अनुच्छेद 324 से 326 और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 19 मिलकर यह सुनिश्चित करते हैं कि मतदाता सूची में केवल भारतीय नागरिकों को ही शामिल किया जाए।
    • उन्होंने यह भी कहा कि SIR इस धारणा पर आधारित नहीं है कि हर मतदाता से दस्तावेज मांगे जाएंगे। जिन मतदाताओं के नाम जून 2025 तक की पुरानी मतदाता सूचियों में दर्ज हैं, यदि वे अपने माता-पिता के नाम से उससे पहले की मतदाता सूची से लिंक स्थापित कर देते हैं, तो उन्हें स्वतः वैध माना जाएगा।
    • द्विवेदी के मुताबिक, केवल उन्हीं मामलों में 11 निर्धारित दस्तावेज मांगे जाएंगे, जहां ऐसा कोई लिंक उपलब्ध नहीं है। इन दस्तावेजों में आधार कार्ड भी शामिल है। उन्होंने बताया कि जून 2025 तक सभी मतदाताओं को एन्यूमरेशन फॉर्म जारी किए गए थे, जिससे वर्ष 2002 की मतदाता सूची को भी प्रामाणिकता मिली है।

    19 जनवरी : बंगाल के मतदाता को नाम जुड़वाने का एक और मौका

    सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल के करीब 1.25 करोड़ मतदाताओं को वोटर लिस्ट में नाम जुड़वाने के लिए एक और मौका दिया है। कोर्ट ने निर्देश दिया कि ये मतदाता 10 दिनों के भीतर अपने जरूरी दस्तावेज चुनाव आयोग के समक्ष जमा कर सकते हैं। शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए चुनाव आयोग को गड़बड़ी वाली वोटर लिस्ट सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करनी होगी।

    बता दें यह सूची ग्राम पंचायत भवनों, ब्लॉक कार्यालयों और वार्ड कार्यालयों में चस्पा की जाए, ताकि संबंधित मतदाता उसे देखकर समय रहते आपत्ति दर्ज करा सकें या दस्तावेज जमा कर सकें। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस कदम का उद्देश्य किसी को मतदान के अधिकार से वंचित करना नहीं, बल्कि मतदाता सूची को त्रुटिरहित और विश्वसनीय बनाना है।

    Aakash Waghmare
    By Aakash Waghmare

    आकाश वाघमारे | MCU, भोपाल से स्नातक और फिर मास्टर्स | मल्टीमीडिया प्रोड्यूसर के तौर पर 3 वर्षों का क...Read More

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