कर्नाटक के बेलगावी में साइबर ठगी के एक बड़े मामले का खुलासा हुआ है, जहां एक 81 वर्षीय व्यापारी को ‘डिजिटल अरेस्ट’ के जाल में फंसाकर 15 करोड़ रुपये से अधिक की ठगी कर ली गई। खुद को CBI अधिकारी बताकर आरोपियों ने पीड़ित को मनी लॉन्ड्रिंग केस में फंसाने की धमकी दी और लगातार वीडियो कॉल के जरिए डराकर उससे पैसे ट्रांसफर करवाए। इस मामले में कर्नाटक पुलिस ने कार्रवाई करते हुए हैदराबाद से दो साइबर आरोपियों को गिरफ्तार किया है।
यह मामला बेलगावी सिटी साइबर क्राइम पुलिस स्टेशन में दर्ज हुआ था। शिकायत के मुताबिक बुजुर्ग व्यापारी को कई दिनों तक लगातार कॉल और वीडियो कॉल आते रहे। कॉल करने वाले खुद को जांच एजेंसियों का अधिकारी बताते थे और दावा करते थे कि व्यापारी एक बड़े आर्थिक अपराध में शामिल है। आरोपियों ने पीड़ित को बताया कि उसके नाम पर मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़ा मामला दर्ज है और उसे तुरंत जांच में सहयोग करना होगा, नहीं तो गिरफ्तारी हो सकती है। इसी डर का फायदा उठाकर उन्होंने उसे अपने बैंक विवरण साझा करने के लिए मजबूर किया।
जांच में सामने आया कि आरोपियों ने पीड़ित से लगभग छह हफ्तों तक संपर्क बनाए रखा। इस दौरान उसे मानसिक रूप से दबाव में रखा गया और अलग-अलग खातों में पैसे ट्रांसफर करवाए गए। पीड़ित को यह विश्वास दिलाया गया कि उसके पैसे “सरकारी सुरक्षित खाते” में रखे जा रहे हैं और जांच पूरी होने के बाद वापस कर दिए जाएंगे। इसी बहाने उससे 15 करोड़ रुपये से अधिक की राशि अलग-अलग ट्रांजेक्शन के जरिए हड़प ली गई।
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जांच के दौरान पुलिस को कई बैंक खातों और ट्रांजेक्शन का पता चला, जो देश के अलग-अलग राज्यों में फैले हुए थे। इनमें दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, गुजरात और पश्चिम बंगाल के करीब 10 लाभार्थी खाते शामिल थे। सबसे अहम सुराग हैदराबाद के एक बैंक खाते से मिला, जिसमें लगभग 2 करोड़ रुपये ट्रांसफर किए गए थे। इसके बाद साइबर कमांड यूनिट ने 6 अप्रैल को हैदराबाद में छापेमारी की और दो आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया। गिरफ्तार आरोपियों की पहचान वेंकटेश शरथ नाइक और देगावत श्रीपदा नाइक के रूप में हुई है। दोनों पर साइबर ठगी और धोखाधड़ी का मामला दर्ज किया गया है।
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पुलिस के अनुसार गिरफ्तार आरोपियों ने अपने बैंक खाते, इंटरनेट बैंकिंग डिटेल्स और चेकबुक एक अन्य फरार हैंडलर को दे रखी थी। यह व्यक्ति अभी भी पुलिस की गिरफ्त से बाहर है। जांच एजेंसियां अब पूरे नेटवर्क की जांच कर रही हैं ताकि यह पता लगाया जा सके कि इस साइबर फ्रॉड में और कौन-कौन लोग शामिल हैं और पैसा किन-किन खातों में भेजा गया।
इस तरह के मामलों में ठग खुद को पुलिस, सीबीआई या अन्य जांच एजेंसी का अधिकारी बताते हैं। वे वीडियो कॉल या फोन कॉल के जरिए पीड़ित को बताते हैं कि उसके खिलाफ गंभीर मामला दर्ज है। इसके बाद डराने-धमकाने का सिलसिला शुरू होता है और पीड़ित को जांच में सहयोग के नाम पर पैसे ट्रांसफर करने के लिए मजबूर किया जाता है। कई मामलों में लोग डर के कारण बड़ी रकम गंवा देते हैं।