दमोह:1000 रुपए किलो तक बिक रहा जंगली मशरूम, 15 दिन तक रहती है मांग
दमोह जिले के वन क्षेत्रों में लगातार हो रही बारिश के बीच इन दिनों जंगली मशरूम (मसरूम) की भरपूर पैदावार हो रही है। सुबह होते ही ग्रामीण बड़ी संख्या में जंगलों का रुख कर रहे हैं और प्राकृतिक रूप से उगे मशरूम को एकत्र कर रहे हैं। यह मौसमी मशरूम जहां ग्रामीणों की थाली का स्वाद बढ़ा रहा है वहीं कई परिवारों के लिए अतिरिक्त आय का जरिया भी बन गया है। स्थानीय बाजारों के साथ-साथ इसे जबलपुर तक बेचने ले जाया जा रहा है, जहां इसकी कीमत 800 से 1000 रुपए प्रति किलोग्राम तक मिल रही है।
दीमक की बांबी के आसपास उगता है मशरूम
ग्रामीणों के अनुसार यह जंगली मशरूम मुख्य रूप से दीमक की बांबी (टीले) के आसपास उगता है। ताला, धरीमाल और जलहरी के बीच स्थित वन क्षेत्रों में इस समय इसकी अच्छी पैदावार देखने को मिल रही है। स्थानीय लोगों का मानना है कि तेज बारिश और रात में बादलों की गर्जना के बाद अगली सुबह मशरूम अधिक मात्रा में निकलता है। हालांकि वैज्ञानिक दृष्टि से इसकी पैदावार का कारण वर्षा, पर्याप्त नमी और अनुकूल तापमान माना जाता है।
सुबह 8 बजे से पहले तोड़ना सबसे बेहतर
ग्रामीण अरविंद यादव ने बताया कि मशरूम एकत्र करने का सबसे अच्छा समय सुबह 8 बजे से पहले होता है। इसके बाद मशरूम तेजी से फैलने लगता है जिससे उसकी गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। उन्होंने बताया कि मशरूम को अच्छी तरह साफ कर पहले उबाला या हल्का तला जाता है फिर उसकी स्वादिष्ट सब्जी बनाई जाती है। यह प्राकृतिक मशरूम केवल 10 से 15 दिनों तक ही उपलब्ध रहता है।
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प्राकृतिक और पौष्टिक खाद्य पदार्थ
ग्रामीणों का कहना है कि जंगलों में मिलने वाला यह मशरूम पूरी तरह प्राकृतिक और ऑर्गेनिक होता है। इसमें प्रोटीन, विटामिन और कई आवश्यक पोषक तत्व प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। स्थानीय लोगों का अनुभव है कि इसका सेवन करने से भूख भी अच्छी लगती है और यह स्वास्थ्य के लिए लाभकारी माना जाता है।
जहरीले मशरूम से सावधान रहने की सलाह
ग्रामीणों ने बताया कि जंगलों में दो प्रकार के मशरूम पाए जाते हैं जिनमें एक प्रजाति जहरीली भी होती है। इसलिए सही पहचान के बिना किसी भी जंगली मशरूम का सेवन नहीं करना चाहिए। उनके अनुसार जहरीला मशरूम आकार में अपेक्षाकृत छोटा और हल्के पीले रंग का हो सकता है। गलत मशरूम खाने से गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं।
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ग्रामीणों के लिए आय का भी बन रहा साधन
बरसात के मौसम में उगने वाला यह जंगली मशरूम ग्रामीणों के लिए केवल स्वादिष्ट भोजन ही नहीं बल्कि अतिरिक्त आमदनी का भी जरिया बन गया है। सीमित समय तक मिलने वाले इस मशरूम की बाजार में अच्छी मांग रहती है जिसके कारण कई ग्रामीण इसे स्थानीय मंडियों के अलावा जबलपुर तक बेचने पहुंचते हैं। प्राकृतिक रूप से उगने वाला यह मौसमी मशरूम वर्षा ऋतु में दमोह के जंगलों की समृद्ध जैव विविधता का सुंदर उदाहरण भी बनकर सामने आया है।
Edited By: Sumit Shrivastava














