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चीन की जुगाड़: कोयला खदान के पानी से ठंडे होंगे Data Centers, 12 अरब क्यूबिक मीटर पानी के इस्तेमाल का प्लान

कोयला खदान के पानी से ठंडे होंगे डेटा सेंटर, चीन की नई रिसर्च में बड़ा दावा, कोयला खदानों से हर साल अरबों क्यूबिक मीटर पानी बर्बाद हो जाता है। अब वैज्ञानिकों का कहना है कि इसी पानी से देश के तेजी से बढ़ते डेटा सेंटर्स को ठंडा किया जा सकता है।
चीन की जुगाड़: कोयला खदान के पानी से ठंडे होंगे Data Centers, 12 अरब क्यूबिक मीटर पानी के इस्तेमाल का प्लान
कोयला खदान के पानी से ठंडे होंगे Data Centers

बीजिंग। जर्नल ऑफ एनवायरनमेंटल कैमिकल इंजीनियरिंग में छपी एक लेटेस्ट स्टडी में कोल माइंस के पानी से डेटा सेंटर को ठंडा रखने पर रिसर्च की गई है। स्टडी का टाइटल है - 'डेटा सेंटर्स के लिए कूलिंग मीडियम के तौर पर कोयला खदान के पानी की संभावना।' रिसर्चर जैनिंग ली और उनकी टीम ने पता लगाया कि क्या लिक्विड-कूल्ड डेटा सेंटर्स में नॉर्मल पानी की जगह ट्रीट किया हुआ माइन वाटर इस्तेमाल हो सकता है।

2030 तक दोगुनी हो जाएगी डेटा सेंटर्स की प्यास

रिसर्च के मुताबिक चीन में डेटा सेंटर्स की पानी की खपत तेजी से बढ़ने वाली है। 2024 में जहां ये खपत करीब 1.3 बिलियन क्यूबिक मीटर थी, वहीं 2030 तक ये बढ़कर 3 बिलियन क्यूबिक मीटर से ज्यादा हो जाएगी। इस बड़ी छलांग की वजह है क्लाउड कंप्यूटिंग, AI और High-Performance Computing का जबरदस्त विस्तार। हालांकि नई Liquid-Cooling Technology बिजली की खपत कम करने और PUE (Power Usage Effectiveness) को नीचे लाने में मदद कर रही है। लेकिन, कूलिंग सिस्टम को साफ और अच्छी क्वालिटी वाले की जरूरत पड़ती है। इसलिए वैज्ञानिक मीठे पानी पर बोझ कम करने के लिए कोयला खदान के पानी को एक विकल्प के तौर पर देख रहे हैं। इसके लिए कितना पानी लगेगा इसका अंदाज इससे लगाया जा सकता है कि सिर्फ Alibaba ने ही FY24 में 0.036 बिलियन क्यूबिक मीटर पानी इस्तेमाल किया था। 

कोयला खदानें पानी का अनदेखा खजाना

ये मौका इसलिए भी बड़ा है क्योंकि चीन की कोयला इंडस्ट्री पानी का बहुत बड़ा सोर्स है। रिपोर्ट बताती है कि चीन ने 2023 में 4.7 बिलियन टन कच्चा कोयला निकाला था और हर एक टन कोयले के साथ लगभग दो टन पानी भी बाहर आता है। इस हिसाब से 2023 में ही करीब 9.4 बिलियन क्यूबिक मीटर माइन वाटर निकला।

जमीन के नीचे का पानी ठंडा

रिसर्चर्स को ये पानी कूलिंग के लिए खास इसलिए लगता है क्योंकि जमीन के नीचे इस पानी का तापमान काफी कम और एक जैसा बना रहता है, जो कूलिंग के लिए परफेक्ट है। लेकिन, इसमें एक पेंच भी है, वह यह कि बिना साफ किए ये पानी सीधे इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। इसमें मौजूद मिनरल्स से तीन बड़ी दिक्कतें हो सकती हैं – स्केलिंग ( पाइपों में कैल्शियम कार्बोनेट की परत जमना),  जंग लगना, बायोफालिंग  (बैक्टीरिया और जैविक कचरा जमना) । इनसे महंगे कूलिंग इक्विपमेंट को नुकसान पहुंच सकता है, इसलिए पहले प्रॉपर ट्रीटमेंट जरूरी है।

ट्रीटेड माइन वाटर पड़ेगा सस्ता

इस पर रिसर्च के इकोनॉमिक एनालिसिस का जवाब है – हां, ट्रीटेड वाटर से कूलिंग की लागत 9 साल में निकाली जा सकती है। रिपोर्ट के मुताबिक माइन वाटर ट्रीटमेंट की लागत करीब 1.37 युआन / क्यूबिक मीटर (19.61 रुपए) है, जबकि नगर निगम के पानी की लागत: करीब 3.87 युआन/क्यूबिक (55.41 रुपए)  मीटर है। मतलब साफ पानी की तुलना में खदान का पानी ट्रीट करके इस्तेमाल करना लगभग तीन गुना सस्ता है। स्टडी में बताया गया है कि इस नए ट्रीटमेंट प्लांट को लगाने का खर्च 4.6 से 8.8 साल के अंदर वसूल हो जाएगा।

कार्बन उत्सर्जन में 93.8% तक की कमी

पेपर में एक बड़े सिनेरियो का मॉडल भी बनाया गया है। अगर डेटा सेंटर अपना पावर यूसेज इफेक्टिवनेस (PUE)  को 1.6 से सुधार कर 1.2 तक ले आते हैं और साथ में लोकल विंड एनर्जी का इस्तेमाल करते हैं, तो सालाना कार्बन उत्सर्जन में 93.8% तक की भारी कमी आ सकती है। हालांकि ध्यान देना जरूरी है कि ये 93.8% की कमी सिर्फ खदान के पानी के इस्तेमाल से नहीं है। ये आंकड़ा डेटा सेंटर के ओवरऑल एनर्जी और कूलिंग सिस्टम में कई सारे सुधारों को मिलाकर निकाला गया है।

Puneet Pandey
By Puneet Pandey

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