सुप्रीम कोर्ट के सवाल के बाद 397 दवाएं सस्ती: कैंसर का 80 हजार का इंजेक्शन अब 7 हजार रुपए में, नई कीमत 9 नवंबर से लागू

कैंसर की दवा सस्ती हो गई है। 543 दवा ब्रांड और पैक की कीमतें बदली हैं। इनमें 397 के दाम घटे हैं। NPPA new prices 9 नवंबर से लागू होंगी। सबसे ज्यादा कटौती सैमटेपा इंजेक्शन में हुई है। इसकी कीमत करीब 11 गुना कम हो गई। एनपीपीए (NPPA – National Pharmaceutical Pricing Authority) दवा के दाम तय करने वाली संस्था है। उसके फैसले के बाद 73% दवाओं के दाम घटाए गए।
एमआरपी (MRP – Maximum Retail Price) पैक पर छपी अधिकतम कीमत होती है। 217 दवाओं की एमआरपी आधे से भी कम हो गई। 97 ब्रांड में 70% से ज्यादा कटौती हुई। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एनपीपीए से सवाल किया था। कोर्ट ने पूछा कि दवाओं की कीमतों पर लगाम क्यों नहीं लगाई जा रही। इसके बाद कंपनियों ने एनपीपीए नई कीमतें जारी कीं। ये 9 नवंबर से लागू होंगी।
कैंसर दवा के दाम में कटौती कितनी?
50 ब्रांड में 80% से ज्यादा कटौती हुई है। पांच दवाओं के दाम 90% से ज्यादा घटे हैं। यह cancer drug price cut 543 में से 397 दवाओं पर हुआ है। सैमटेपा इंजेक्शन की कीमत 80,071 रुपए से घटकर 7,150 रुपए हो गई। पैलबोप्रो के 21 कैप्सूल वाले पैक की कीमत भी बदली है।
पहले यह 40,421 रुपए थी। अब 2,720 रुपए होगी। सोचिए एक बार। पैक की कीमत 40 हजार रुपए से ज्यादा थी। अब वह सिर्फ 2,720 रुपए का होगा। राहत मिली है, पर अधूरी।
कीट्रूडा की कीमत क्यों नहीं बदली?
अब जरा दूसरी तस्वीर देखिए। क्या सभी दवाएं सस्ती हुईं? नहीं। 146 ब्रांड-पैक की कीमतों में कोई बदलाव नहीं हुआ।
- कीट्रूडा इम्यूनोथेरेपी (शरीर की प्रतिरोधक क्षमता से इलाज) की दवा है। 21 से ज्यादा तरह के कैंसर में इसका इस्तेमाल होता है। Keytruda price in India अब भी 2,16,500 रुपए है।
- ब्रेस्ट कैंसर में इस्तेमाल होने वाली रिबोसाइक्लिब की कीमत 24,435 रुपए पर बनी है। टैग्रिसो, टेसेंट्रिक, डार्जालेक्स और इम्फिंजी के दाम भी नहीं बदले।
आखिर इन दवाओं के दाम क्यों नहीं घटे? आकलन के मुताबिक पेटेंट वाली दवाओं के दाम घटाना मुश्किल है। ये नई तकनीक और पेटेंट अधिकारों पर आधारित होती हैं। कीमतें घटने पर कंपनियां भारत में सप्लाई घटा या बंद कर सकती हैं।
यानी cheaper cancer drugs की सूची में ये महंगी दवाएं अभी शामिल नहीं हैं। नई cancer medicine price list में इनके दाम पहले जैसे ही हैं।
सुप्रीम कोर्ट की पिछली 3 सुनवाई
अब जरा पीछे चलते हैं। कैंसर और दूसरी दवाओं पर ज्यादा मुनाफे का मामला कोर्ट में चल रहा है।
27 अक्टूबर: पूरा सिस्टम किसकी मदद में?
कोर्ट ने एमआरपी और रिटेलर की कीमत के भारी अंतर पर सवाल किया। उसने पूछा कि पूरा सिस्टम दवा निर्माताओं की मदद क्यों कर रहा है। कोर्ट ने कहा कि यह सरकार की नजरों के सामने हो रहा है। दोनों मामलों की सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया गया।
12 अक्टूबर: ट्रेड मार्जिन पर सवाल
केंद्र ने एंटी-कैंसर दवाओं का ट्रेड मार्जिन एमआरपी के 30% तक सीमित किया है। ट्रेड मार्जिन यानी बीच के विक्रेताओं का मुनाफा। कोर्ट ने पूछा कि दूसरी दवाओं की सीमा तय क्यों नहीं हो सकती। केंद्र के मुताबिक इससे मरीजों को सालाना करीब 2,500 करोड़ रुपए बचेंगे।
29 सितंबर: 2,700 की दवा 27,000 की?
कोर्ट ने पूछा कि 2,700 रुपए की दवा पर एमआरपी 27,000 रुपए क्यों है। कोर्ट ने नाराजगी जताते हुए ऊंची कीमतों को नरसंहार जैसा बताया।
कैंसर दवा की मूल्य सूची कैसे बनती है?
डीपीसीओ (DPCO – Drug Price Control Order) जरूरी दवाओं की कीमत नियंत्रित करता है। नेशनल लिस्ट ऑफ एसेंशियल मेडिसिन्स (NLEM) जरूरी दवाओं की सरकारी सूची है। 2013 के डीपीसीओ के तहत इन दवाओं का अधिकतम दाम सरकार तय करती है। बाजार की कीमतों के आधार पर यह सीमा तय होती है। इससे ज्यादा कीमत पर दवा बेचना गैरकानूनी है। स्वास्थ्य मंत्रालय सुरक्षा, असर और कीमत देखकर यह सूची बनाता है।
ट्रेड मार्जिन नीति में कहां हैं खामियां?
विश्लेषण के मुताबिक जेनेरिक दवा कंपनियां भारी मार्जिन ले रही थीं। ट्रेड मार्जिन रैशनलाइजेशन (TMR – Trade Margin Rationalisation) नीति में चार खामियां बताई गईं। यह मार्जिन को तर्कसंगत बनाने की नीति है।
- पहली खामी पेटेंट दवाओं को लेकर है। टीएमआर में वितरक को बेची कीमत पर 42.8% तक मार्जिन की छूट है। दवा बेहद महंगी हो, तो यह रकम बहुत ज्यादा हो जाती है। सप्लाई चेन में एक-दो बिचौलिये होते हैं। ऐसे में चंद लोगों को भारी मुनाफा मिल सकता है।
- दूसरी खामी मरीज सहायता कार्यक्रमों से संबंधित है। इनमें मुफ्त मिलने वाली दवाएं टीएमआर की गणना से बाहर हैं। इन्हें जोड़ने पर पेटेंट दवाओं के दाम कुछ घट सकते थे।
- तीसरी खामी 16% की मार्जिन सीमा से संबंधित है। डीपीसीओ की यह सीमा कैंसर दवाओं पर लगती, तो ज्यादा राहत मिलती।
- चौथी खामी एनपीपीए पर सवाल है। उसके पास सप्लाई चेन की कीमतों का ठोस डेटा नहीं है। कंपनियां बिना स्वतंत्र जांच कीमतें लागू कर सकती हैं।




















