बांग्ला पाठ्यपुस्तकों में बदलाव, पानी-अब्बा, अम्मी जैसे शब्द हटेंगे

प्रस्ताव के तहत बांग्ला की किताबों में पानी की जगह जल और अब्बा की जगह बाबा जैसे शब्द इस्तेमाल किए जाएंगे। इसके अलावा डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के जीवन को पाठ्यक्रम में शामिल करने की तैयारी है, जबकि मुगल शासन और मार्क्सवादी विचारधारा से जुड़े कुछ हिस्सों को कम किया जाएगा। इतिहास की किताबों में सिनौली और राखीगढ़ी की पुरातात्विक खोजों को भी जगह मिलेगी। वहीं, सिंगूर आंदोलन और कन्याश्री योजना से जुड़े पाठ हटाने का फैसला किया गया है।
बांग्ला की किताबों से हटेंगे पानी,अब्बा और अम्मी शब्द
बांग्ला की किताबों में इस्तेमाल होने वाले कुछ शब्दों को बदलने का फैसला किया गया है। समिति के अनुसार, बांग्ला में आम बोलचाल के दौरान पानी, अब्बा और अम्मी शब्दों का सामान्य रूप से इस्तेमाल नहीं होता है। इसलिए इनकी जगह जल, बाबा और मां जैसे शब्द रखे जाएंगे। समिति का कहना है कि इन बदलावों का उद्देश्य विद्यार्थियों को रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाले शब्दों से परिचित कराना है।
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जनवरी 2027 तक तैयार होंगी नई किताबें
बताया जा रहा है कि नई पाठ्यपुस्तकों को तैयार करने के लिए समिति के पास काफी कम समय था। ऐसे में पाठ्यक्रम में बड़े बदलाव करने के बजाय जरूरी संशोधन और गलतियों को ठीक करने पर ध्यान दिया गया है। उन्होंने बताया कि 2 जनवरी तक नई किताबें उपलब्ध करानी हैं और इसके लिए 12 करोड़ से अधिक पुस्तकों का प्रकाशन किया जाना है। इतनी बड़ी संख्या में किताबें तैयार करने की समयसीमा को देखते हुए व्यापक बदलाव करना संभव नहीं था। समिति का लक्ष्य जनवरी 2027 तक नई पाठ्यपुस्तकों का पहला संस्करण तैयार करना है।
श्यामा प्रसाद मुखर्जी और पुरातात्विक खोजों को मिलेगी जगह
नई इतिहास की किताबों में हिंदू राष्ट्रवादी नेता डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के जीवन को शामिल करने की सिफारिश की गई है। इसके साथ ही उत्तर प्रदेश के सिनौली और हरियाणा के राखीगढ़ी में हुई पुरातात्विक खुदाई से जुड़ी जानकारी भी पाठ्यक्रम का हिस्सा बनेगी। इन स्थलों पर मिली चीजों का उल्लेख आर्यों के भारत आने से जुड़े प्रचलित सिद्धांतों पर सवाल उठाने के संदर्भ में किया जाता रहा है। देबाशीष चटर्जी के अनुसार, विद्यार्थियों को अब तक पढ़ाया जाता रहा है कि आर्य अपने साथ सभ्यता लेकर भारत आए थे रथ और घोड़े भी उन्हीं के साथ आए थे। समिति का कहना है कि हाल के वर्षों में सामने आए नए तथ्यों को भी इतिहास की किताबों में जगह दी जाएगी।
मुगल शासन और मार्क्सवाद से जुड़े कुछ हिस्से होंगे कम
समिति के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, इतिहास की किताबों में मुगल शासन, भारत में ब्रिटिश औपनिवेशिक इतिहास और मार्क्सवाद से जुड़े कुछ हिस्सों को कम किया गया है। वहीं, साहित्य की किताबों में रवींद्रनाथ टैगोर की कविता शिवाजी उत्सव और द्विजेंद्रलाल रॉय के नाटक मेवाड़ पतन को शामिल किया गया है। दूसरी ओर, सिराजुद्दौला पर आधारित नाटक को पाठ्यक्रम से हटाने का फैसला लिया गया है। इसके अलावा रवींद्रनाथ टैगोर की कविता अफ्रीका को भी किताबों से बाहर किया जाएगा। इन बदलावों के जरिए साहित्य और इतिहास की मौजूदा विषयवस्तु में संशोधन किया जा रहा है।
सिंगूर आंदोलन और कन्याश्री योजना के पाठ भी हटेंगे
पश्चिम बंगाल में पिछली ममता बनर्जी सरकार के दौरान इतिहास की किताबों में सिंगूर में भूमि अधिग्रहण के खिलाफ हुए आंदोलन से जुड़े अध्याय शामिल किए गए थे। इसके साथ ही स्कूली छात्राओं को आर्थिक सहायता देने वाली कन्याश्री योजना को भी पाठ्यक्रम में प्रमुखता से जगह दी गई थी। अब नई पाठ्यक्रम समीक्षा के तहत इन दोनों विषयों को किताबों से हटाने का फैसला किया गया है। इस बदलाव के साथ पिछली सरकार के कार्यकाल में पाठ्यक्रम में शामिल किए गए कुछ विषयों को भी हटाया जा रहा है। नई किताबों में इनकी जगह किन विषयों को कितनी प्रमुखता मिलेगी, यह संशोधित पाठ्यपुस्तकों में स्पष्ट होगा।
कम समय में संशोधन पूरा करने की तैयारी
पाठ्यक्रम समीक्षा समिति के सामने नई किताबों को तय समय पर तैयार करने और बड़े स्तर पर उनका प्रकाशन कराने की चुनौती है। इसी वजह से इस बार व्यापक बदलावों के बजाय जरूरी संशोधनों और कुछ गलतियों को सुधारने पर जोर दिया गया है। समिति ने भाषा, इतिहास और साहित्य से जुड़े कई बदलावों की सिफारिश की है। इनमें शब्दों के चयन से लेकर ऐतिहासिक घटनाओं और साहित्यिक रचनाओं को शामिल करने या हटाने तक के फैसले शामिल हैं। अब इन संशोधनों के आधार पर तैयार होने वाली नई पाठ्यपुस्तकों में विद्यार्थियों को बदला हुआ पाठ्यक्रम पढ़ने को मिलेगा।




















