वर्ल्ड साइकिल डे विशेष:ट्रैक से उतरी साइकिल, कभी ग्रीन ट्रांसपोर्ट का मॉडल रहा प्रोजेक्ट अब बदहाली का शिकार

प्रवीण श्रीवास्तव, भोपाल। आंकड़े बताते हैं कि इस दौरान करीब 223 टन कार्बन डाइआक्साइड उत्सर्जन कम हुआ, लेकिन अब वही साइकिलें कबाड़ हो चुकी हैं, ट्रैक भी अतिक्रमण, टूट-फूट और पार्किंग में बदल चुका है। आज वर्ल्ड साइकिल-डे है। इस मौके पर कभी शहर की पहचान बने इस प्रोजेक्ट की हालत सवाल खड़े कर रही है कि करोड़ों रुपए खर्च होने के बाद भी यह व्यवस्था आखिर क्यों नहीं बच सकी ?
तीन करोड़ का प्रोजेक्ट, अब नए सिरे से शुरुआत
स्मार्ट सिटी डेवलपमेंट लिमिटेड से मिली जानकारी के मुताबिक इस प्रोजेक्ट में करीब तीन करोड़ रुपए खर्च हुए थे। करीब 40 हजार लोगों ने इसमें रजिस्ट्रेशन भी कराया, लेकिन प्रोजेक्ट बंद हो चुका है। अब इस प्रोजेक्ट को नए सिरे से और बड़े स्वरूप में शुरू किया जाएगा। अधिकारी दावा कर रहे हैं कि पब्लिक बाइक शेयरिंग सिस्टम को फिर से सक्रिय बनाने की तैयारी चल रही है। हालांकि मौजूदा हालात इस योजना की बदहाली को साफ बयां कर रहे हैं।
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भोपाल का मॉडल समय के साथ कमजोर पड़ा
सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि जिस ट्रैक को कभी देश में सबसे लंबा बताया गया था, वह अब यह दर्जा भी खो चुका है। हैदराबाद में 23 किमी लंबा सोलर साइकिल ट्रैक और आगरा-इटावा के बीच 207 किमी लंबा साइकिल मार्ग जैसी परियोजनाएं उससे कहीं आगे निकल चुकी हैं। देश के कई शहरों ने साइकिलिंग इंफ्रास्ट्रक्चर को लगातार मजबूत किया है। वहीं भोपाल का मॉडल समय के साथ कमजोर पड़ता चला गया। आज यह तुलना शहर की योजना पर कई सवाल खड़े करती है।
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ट्रैक की यह है हालात
आरआरएल तिराहे के आगे डेडिकेटेड साइकिल ट्रैक पार्किंग के काम आ रहा है। यहां कार और टू व्हीलर मोटर साइकिल पार्क होती हैं। वृंदावन ढाबा और मेपल हाई स्ट्रीट के आसपास शोरूम्स ने यहां कब्जा कर परमानेंट पार्किंग बना दी गई है। कई जगह दुकानों का सामान रखा रहता है। वहीं बीयू से लेकर दानिश नगर तक ट्रैक की हालत बहुत खराब है, बैरियर टूट चुके हैं और डक्ट होल के ढक्कन तक गायब हो गए हैं।

मेंटेनेंस न होने से ज्यादातर साइकिल बर्बाद
करीब 250 साइकिलें आईएसबीटी स्थित स्टोर में पड़ी हुई हैं। मेंटेनेंस न होने से अधिकतर साइकिल बर्बाद हो चुकी हैं। इन साइकिलों की मॉनिटरिंग के लिए लगाए गए जीपीएस सिस्टम भी चोरी हो गए। देखरेख ना होने की वजह से पूरी व्यवस्था धीरे-धीरे खत्म होती चली गई। जो साइकिलें कभी शहर की सड़कों पर दौड़ती थीं, वे आज कबाड़ में बदल चुकी हैं।

लोगों की उम्मीदें और अधिकारियों का दावा
रवि शर्मा, रोहित विश्वकर्मा, अमित तिवारी, रोहित सेन और पंकज पटेल जैसे उपयोगकर्ताओं का कहना है कि यह व्यवस्था सस्ती, सुरक्षित और पर्यावरण हितैषी थी, लेकिन धीरे-धीरे स्टेशन बंद होते गए और पूरा सिस्टम खत्म हो गया। उनका मानना है कि सेवा बंद होने के बाद लोग फिर पेट्रोल वाहनों पर निर्भर हो गए हैं। वहीं स्मार्ट सिटी के पीआरओ नितिन दवे का कहना है कि इसे खत्म नहीं माना जा सकता। पब्लिक बाइक शेयरिंग को फिर से शुरू करने की योजना पर काम किया जा रहा है। इसे और विस्तार के साथ दोबारा शुरू करने की तैयारी की जा रही है।












