भोपाल में अपना घर वृद्धाश्रम ने शुरू किया अतिथि आश्रम, जहां बुजुर्गों को कुछ दिन रखने की है निशुल्क व्यवस्था

पल्लवी वाघेला
भोपाल। हम तो पिताजी की वजह से घर में बंधकर रह गए हैं। बाहर तो छोड़िए शहर में भी कहीं जाना मुश्किल हो गया है। इस तरह जुमले उन बच्चों के मुंह से सुनना बहुत आम है जो अपने बुजुर्ग माता-पिता के साथ रहने के कारण खुद सोशल लाइफ से कटा हुआ महसूस करते हैं। ऐसे में उन्हें बुजुर्गों की देखभाल बोझ की तरह लगने लगी है। दरअसल, ये लोग अपने बुजुर्ग माता-पिता की जिम्मेदारी से मुक्त नहीं होना चाहते, लेकिन उन्हें खुद के लिए कभी एक ब्रेक तो चाहिए ही होता है।
ऐसे लोगों के लिए यह जानकारी काम की है कि शहर के अपना घर वृद्धाश्रम ने परिसर में ही अतिथि आश्रम की व्यवस्था शुरू की है। इस आश्रम में बुजुर्गों को एक निश्चित अवधि के लिए बुजुर्गों को अतिथि के रूप में निशुल्क रखने की व्यवस्था है। इस साल अप्रैल से अब तक छह माह में यहां 19 बुजुर्ग आकर रह चुके हैं। यहां अपने हमउम्र लोगों के साथ रहने के उनके अनुभव पहुत अच्छे रहे हैं।
कुंभ के दौरान की ई यह व्यवस्था
अपना घर की विभूति मिश्र ने बताया कि कुछ ऐसी घटनाएं सुनी हैं कि बुजुर्ग को घर में अकेला छोड़ा और कुछ अनहोनी हो गई। तब हमने कुंभ के दौरान बुजुर्गों को अपने यहां रखने की पहल की, ताकि परिजन स्नान को आराम से जा सकें। जैसे-जैसे इसकी जानकारी फैल रही, अतिथि बुजुर्गों की संख्या भी बढ़ रही है। संचालिका माधुरी मिश्रा से बताया इसके बाद अप्रैल से इसे रेगुलर बेस पर शुरू किया है।
10 दिन से 3 माह तक रहना निशुल्क
यहां 10 दिन से तीन माह तक रखने की व्यवस्था पूरी तरह से निशुल्क है। वहीं, यदि कोई छह माह से एक साल के लिए बुजुर्ग को रखता चाहता है या फिर अटेंडर या किसी बुजुर्ग को कोई विशेष जरूरत है तो इसका शुल्क लिया जाता है। इंद्रा राजपूत हाल ही में चौथी बार अपना घर से विदा हुई हैं। दरअसल, उनके नाती का एडमिशन पुणे में हुआ है। इसके चलते बेटे-बहू को वहां बार-बार जाना पड़ा। उनकी परेशानी को देखक इंद्रा राजपूत ने खुद यहां रहने की इच्छा जाहिर की। अब उन्हें यह स्थान अपने घर जैसा ही सुविधाजनक लगता है।












