
इलेक्शन डेस्क। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में इस बार राजनीतिक सरगर्मी अपने चरम पर है और सबसे ज्यादा चर्चा दक्षिण कोलकाता की भबानीपुर सीट को लेकर हो रही है। यह सीट मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की पारंपरिक सीट मानी जाती है, लेकिन इस बार हालात बदले हुए हैं। भाजपा ने इस सीट पर ऐसी रणनीति तैयार की है, जिससे मुकाबला बेहद कांटे का हो गया है। पहले जहां इसे ममता बनर्जी का गढ़ माना जाता था, वहीं अब यहां सत्ता और प्रतिष्ठा दोनों की लड़ाई बन गई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस सीट का परिणाम पूरे राज्य की राजनीति पर असर डाल सकता है।
भबानीपुर में भाजपा ने अपने मजबूत नेता सुवेंदु अधिकारी को मैदान में उतारकर मुकाबले को और रोचक बना दिया है। अधिकारी पहले ममता बनर्जी के करीबी सहयोगी रहे हैं, लेकिन अब वही उनके सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी बनकर सामने हैं। यह मुकाबला 2021 के नंदीग्राम चुनाव की याद दिलाता है, जहां ममता बनर्जी को हार का सामना करना पड़ा था। हालांकि यह हार सिर्फ 1975 वोटों की थी। इसके बाद ममता ने भबानीपुर उपचुनाव जीतकर वापसी की थी, लेकिन इस बार परिस्थिति कहीं अधिक जटिल नजर आ रही है।
TMC ने भवानीपुर में चुनाव को भावनात्मक रंग देने की रणनीति अपनाई है। पार्टी ‘घर की बेटी’ यानी ‘घोरेर मेये’ के नारे के साथ जनता से जुड़ने की कोशिश कर रही है। पार्टी नेतृत्व का मानना है कि यह सिर्फ चुनाव नहीं, बल्कि क्षेत्र की बेटी के सम्मान का सवाल है। TMC के कार्यकर्ताओं को घर-घर जाकर ममता बनर्जी के विकास कार्यों और उनके व्यक्तिगत जुड़ाव को बताने के निर्देश दिए गए हैं। इस रणनीति का मकसद मतदाताओं में भावनात्मक समर्थन को मजबूत करना है।
TMC ने इस चुनाव में आक्रामक राजनीति के बजाय जनसंपर्क पर ज्यादा जोर दिया है। भबानीपुर के विभिन्न इलाकों में ‘फोटो कॉर्नर’ बनाए गए हैं, जहां लोग ममता बनर्जी के कटआउट के साथ तस्वीरें खिंचवा सकते हैं। वॉर्ड 73 के मुक्तदल मोड़ पर ऐसा पहला बूथ बनाया गया है, जो सीधे तौर पर जनता को जोड़ने का माध्यम बन रहा है। पार्टी नेताओं का कहना है कि यह अभियान लोगों को यह महसूस कराने के लिए है कि ममता सिर्फ नेता नहीं, बल्कि परिवार का हिस्सा हैं।
भाजपा ने भबानीपुर में चुनावी रणनीति को पूरी तरह सामाजिक और जातीय समीकरणों के आधार पर तैयार किया है। इस सीट को ‘मिनी इंडिया’ कहा जाता है, जहां अलग-अलग समुदायों के लोग रहते हैं। भाजपा का मानना है कि अगर हिंदू वोटों को एकजुट किया जाए और अल्पसंख्यक वोटों में थोड़ी भी कमी आए, तो मुकाबला उनके पक्ष में जा सकता है। पार्टी ने महीनों तक बूथ स्तर पर काम कर अलग-अलग समुदायों के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश की है।
भबानीपुर में बंगाली भद्रलोक, मारवाड़ी-गुजराती व्यापारी, सिख-जैन परिवार और मुस्लिम आबादी है। लगभग 42 प्रतिशत मतदाता बंगाली हिंदू, 34 प्रतिशत गैर-बंगाली हिंदू और 24 प्रतिशत मुस्लिम हैं। यहां मुस्लिम 24.5 प्रतिशत, कायस्थ 26.2 प्रतिशत, पूर्वी भारतीय प्रवासी समुदाय 14.9 प्रतिशत, मारवाड़ी 10.4 प्रतिशत और ब्राह्मण 7.6 प्रतिशत हैं।
भवानीपुर में वोटर लिस्ट के संशोधन को लेकर भी विवाद खड़ा हो गया है। करीब 47,000 नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं, जिससे चुनावी समीकरण प्रभावित हो सकते हैं। भाजपा इस प्रक्रिया को अपने पक्ष में मान रही है, जबकि टीएमसी का कहना है कि इससे उनके पारंपरिक और अल्पसंख्यक वोट प्रभावित हो सकते हैं।
पिछली बार भबानीपुर उपचुनाव में भबानीपुर से TMC ने 58,832 वोटों से जीत हासिल की थी, लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में यहां पार्टी की लीड सिर्फ 8,297 वोट की रह गई थी।भबानीपुर के आठ वार्डों में TMC सिर्फ 3 वार्डों में आगे थी, जबकि भाजपा ने 5 वार्डों में बढ़त बनाई थी। इन आंकड़ों से पता चलता है कि अब भबानीपुर अब TMC का पारंपरिक गढ़ नहीं बचा। भबानीपुर सीट पर 29 अप्रैल को मतदान होगा। पूरे देश की नजरें इस सीट पर टिकी हैं, क्योंकि इसका परिणाम पश्चिम बंगाल की राजनीति की दिशा तय कर सकता है।