UP:हलाला और तीन तलाक केस में इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त, कहा- धर्म की आड़ में अपराध नहीं चलेगा

प्रयागराज। नाबालिग से हलाला के नाम पर यौन शोषण और बाद में गैंगरेप के आरोपों से जुड़े मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अहम टिप्पणी की है। अदालत ने सभी आरोपियों की FIR रद्द करने की मांग खारिज करते हुए कहा कि मामला बेहद गंभीर है और इसकी पूरी आपराधिक जांच होनी चाहिए। कोर्ट ने माना कि शुरुआती स्तर पर जांच रोकी नहीं जा सकती। साथ ही यह भी कहा कि किसी भी धार्मिक परंपरा या व्यक्तिगत कानून का इस्तेमाल अपराध को सही ठहराने के लिए नहीं किया जा सकता। अदालत ने इस मामले में पहले दी गई अंतरिम राहत भी समाप्त कर दी।
धार्मिक प्रथा के नाम पर अपराध स्वीकार नहीं
इलाहाबाद हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने इस मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि यदि किसी घटना में गंभीर आपराधिक आरोप सामने आते हैं तो केवल धार्मिक प्रथा या व्यक्तिगत कानून का हवाला देकर कार्रवाई से बचा नहीं जा सकता। अदालत ने कहा किया कि कानून सभी नागरिकों के लिए समान है और किसी भी अपराध की निष्पक्ष जांच होना जरूरी है। इसलिए इस स्तर पर FIR रद्द करने का कोई आधार नहीं बनता।
नाबालिग की सहमति को कानून नहीं मानता
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि यदि घटना के समय पीड़िता की उम्र 18 वर्ष से कम थी, तो उसकी सहमति का कोई कानूनी महत्व नहीं है। ऐसे मामलों में यौन संबंध कानून की नजर में अपराध माने जाएंगे और संबंधित धाराओं के साथ पॉक्सो कानून भी लागू होगा। अदालत ने कहा कि इस तरह के आरोपों की गहराई से जांच जरूरी है ताकि सच्चाई सामने आ सके।
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क्या है पूरा मामला?
मामला उत्तर प्रदेश के अमरोहा जिले का है। शिकायत के अनुसार पीड़िता का निकाह वर्ष 2015 में तब कराया गया था, जब वह नाबालिग थी। कुछ समय बाद उसे तीन तलाक दिया गया। आरोप है कि दोबारा शादी कराने के नाम पर उसे हलाला की प्रक्रिया से गुजरने के लिए मजबूर किया गया। बाद के वर्षों में फिर से हलाला के नाम पर उसके साथ सामूहिक दुष्कर्म किए जाने का भी आरोप लगाया गया। इस मामले में कुल नौ लोगों के खिलाफ FIR दर्ज की गई है।
आरोपियों ने क्या दलील दी?
याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत में कहा गया कि उस समय तीन तलाक और हलाला से जुड़े धार्मिक नियम लागू थे। उनका यह भी कहना था कि पीड़िता वयस्क थी और मामला आपसी विवाद के कारण दर्ज कराया गया। वहीं सरकारी पक्ष ने अदालत को बताया कि FIR में बेहद गंभीर आरोप हैं, इसलिए बिना जांच के किसी भी आरोपी को राहत नहीं दी जा सकती।
कोर्ट ने जांच जारी रखने के दिए संकेत
हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में सामने आए आरोप बेहद गंभीर हैं और इन्हें केवल प्रारंभिक दलीलों के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता। अदालत ने माना कि जांच एजेंसियों को सभी पहलुओं की निष्पक्ष जांच करने का पूरा अवसर मिलना चाहिए। कोर्ट ने यह भी कहा कि आरोपियों की भूमिका जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगी।
संविधान के मूल्यों का भी किया जिक्र
अपने फैसले में अदालत ने कहा कि देश का संविधान सभी नागरिकों को समानता, गरिमा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है। यदि किसी महिला या नाबालिग के साथ अपराध होता है, तो उसे किसी भी धार्मिक या सामाजिक परंपरा के नाम पर सही नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में कानून का पालन सबसे पहले होना चाहिए।
जांच आगे बढ़ेगी, अंतरिम राहत खत्म
हाईकोर्ट ने सभी याचिकाएं खारिज करते हुए पहले दी गई अंतरिम राहत भी समाप्त कर दी। अब पुलिस और जांच एजेंसियां मामले की आगे जांच करेंगी। अदालत ने स्पष्ट किया कि जांच पूरी होने के बाद ही आरोपों की सच्चाई और सभी संबंधित लोगों की भूमिका तय होगी।











