World Cycle Day : पैडल पर सेहत, साइकिलिंग बनी डिप्रेशन और बीमारियों से बचाव का मंत्र

प्रीति जैन, भोपाल। शहर में साइकिलिंग को पैशन बनाने वाले लोगों का कहना है कि आज अधिकांश लोगों के सामने स्ट्रेस, स्लीप साइकिल का डिस्टर्ब होना, बीपी, शुगर और मोटापा जैसी समस्याएं हैं। वहीं महिलाओं में आर्थराइटिस और मेनोपॉज के साथ ही ऑस्टियोपोरोसिस की समस्या आती है। कोई अपनी फैमिली हिस्ट्री देखते हुए बीपी और मोटापे को बढ़ने से रोकने पर काम कर रहा है तो कोई जॉब और बिजनेस के स्ट्रेस को नियंत्रित करके सुबह के समय साइकलिंग और रनिंग का दामन थाम रहा है। आज प्रस्तुत हैं तीन प्रेरक कहानियां....
बीमारी पर जीत हासिल की

मैं अपने हर जन्मदिन पर अपनी उम्र के बराबर किलोमीटर साइकिल चलाती हूं। इस वर्ष मैं 65 साल पूरे करूंगी तो अपने जन्मदिन पर 65 किलोमीटर साइकिल चलाउंगी। साल 2018 से पहले एक ऐसा समय भी आया था, जब डॉक्टरों ने फुल बेड रेस्ट की सलाह दी थी। वे एथलीट रही हैं, नेशनल हॉकी प्लेयर रह चुकी हूं तथा मलखंब और जिम्नास्टिक में भी अपने शहर का नाम रोशन कर चुकी हैं। मेरे लिए बिस्तर पर पड़े-पड़े जीवन बिताना स्वीकार करना बहुत मुश्किल था। मैंने खुद को फिर से खड़ा करने का संकल्प लिया और अपने भीतर के जोश को जिंदा रखा। आज साइकिलिंग, मैराथन और योग मेरे जीवन का अहम हिस्सा हैं। मैं 200 किमी तक साइकिलिंग कर लेती हूं। साइकिलिंग की वजह से कमर दर्द की बड़ी समस्या पर काबू कर पाई।
मालती इंदौरिया, साइकिलिस्ट
ये भी पढ़ें: Indore Airport : जनवरी के मुकाबले मई में 38 हजार कम यात्री, छुट्टियों के बावजूद नहीं हुए 4 लाख यात्री
फैमिली हिस्ट्री को जानकर किया बदलाव

मेरे परिवार में मोटापा और बीपी अनुवांशिक रूप से रहा है तो यह मैं जानता था कि मैं भी इसकी गिरफ्त में आ सकता हूं। यह सोचकर मैंने वर्कआउट और साइकिलिंग शुरू की लेकिन मैं रेगुलर नहीं था क्योंकि अकेले यह सब कुछ बोरिंग लग रहा था। फिर बाइसिकल एसोसिएशन ग्रुप से जुड़ा तो 10 किमी तक ग्रुप मेंबर के साथ साइकलिंग करने लगा। मुझे लगता है कि ग्रुप के साथ वर्कआउट ज्यादा सफल होते हैं क्योंकि सभी के साथ कब 200 किमी तक साइकिलिंग कर जाता हूं पता नहीं चलता। नए दोस्त मिलते हैं और सामाजिक दायरा बढ़ता है तो मन को अच्छा लगता है। सिर्फ फिजिकल ही नहीं बल्कि मेंटल हेल्थ भी ग्रुप के साथ स्पोर्ट्स या साइकिलिंग जैसी एक्टिविटीज से अच्छी रहती है।
अखिलेश अग्रवाल, साइकिलिस्ट
एंजाइटी से मिली राहत

मेरी जिंदगी में एक समय ऐसा आया कि निजी कारणों से एंजाइटी और डिप्रेशन सा महसूस करने लगी थी। मेरी मदर-इन-लॉ के निधन के बाद मुझे जॉब छोडना पड़ी। मेरी बेटी बैडमिंटन सीखने जाती थी तो एक दिन मैंने उसे कहा हम दोनों साइकिल से ट्रेनिंग के लिए जाया करेंगे। उस दिन से मेरी साइकलिंग जर्नी शुरू हो गई। मुझे पता भी नहीं चला और मुझे बेहतर महसूस होने लगा। साल 2019 से लगातार साइकलिंग कर रही हूं। कोरोना के समय मेंटल हेल्थ को साइकलिंग से बहुत सपोर्ट मिला। अब यह मेरे जीवन का हिस्सा है, इसके बिना मुझे जीवन अधूरा लगता है। मैं साइकिल से महाकाल और छींद जाती हूं।
चंद्रकांता बजाज, साइकिलिस्ट
ये भी पढ़ें: उमरिया: बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में पर्यटकों के सामने आक्रामक हुई बाघिन 'रॉ', वीडियो वायरल












