पश्चिम बंगाल में UCC की तैयारी :आज विधानसभा में पेश हो सकता है विधेयक; जानिए क्या बदलेगा?

उत्तराखंड आजादी के बाद UCC लागू करने वाला पहला राज्य बना। इसके बाद गुजरात विधानसभा ने UCC विधेयक पारित किया। मई 2026 में असम विधानसभा ने भी UCC बिल को मंजूरी दे दी
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आज विधानसभा में पेश हो सकता है विधेयक; जानिए क्या बदलेगा?

कोलकाता। पश्चिम बंगाल की भाजपा सरकार सोमवार को विधानसभा में समान नागरिक संहिता (UCC) विधेयक पेश कर सकती है। भाजपा ने विधानसभा चुनाव के दौरान अपने संकल्प पत्र में सरकार बनने के छह महीने के भीतर राज्य में UCC लागू करने का वादा किया था। 9 मई को नई सरकार के गठन के बाद अब इस दिशा में पहला बड़ा कदम उठाया जा रहा है।

प्रस्तावित कानून का उद्देश्य विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, संपत्ति के बंटवारे और गोद लेने जैसे नागरिक मामलों में धर्म आधारित अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों की जगह सभी नागरिकों के लिए एक समान कानून लागू करना है।

अब तक दो राज्यों में UCC बिल पास, एक में लागू

उत्तराखंड आजादी के बाद UCC लागू करने वाला पहला राज्य बना। इसके बाद गुजरात विधानसभा ने UCC विधेयक पारित किया। मई 2026 में असम विधानसभा ने भी UCC बिल को मंजूरी दे दी, जिससे वह ऐसा करने वाला तीसरा राज्य बन गया। हालांकि, उत्तराखंड में कानून लागू हो चुका है, जबकि गुजरात और असम में विधेयक पारित होने के बाद आगे की प्रक्रिया जारी है।

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UCC से जुड़े जरूरी सवाल जवाब जानिए

क्या UCC सभी धर्मों पर लागू होगा?

इसका उद्देश्य सभी नागरिकों के लिए एक समान नागरिक कानून बनाना है। हालांकि संविधान के प्रावधानों के तहत अनुसूचित जनजातियों (ST) को विशेष छूट मिल सकती है।

क्या इससे धार्मिक परंपराएं खत्म हो जाएंगी?

 नहीं। UCC केवल नागरिक मामलों जैसे शादी, तलाक और संपत्ति से जुड़ा है। पूजा-पद्धति, धार्मिक आस्था और रीति-रिवाजों पर इसका सीधा असर नहीं पड़ता।

क्या बिल पेश होते ही कानून लागू हो जाएगा?

नहीं पहले विधानसभा से बिल पारित होगा, फिर राज्यपाल की मंजूरी मिलेगी और अधिसूचना जारी होने के बाद ही कानून लागू होगा।

गोवा में पहले से लागू है UCC

गोवा में लंबे समय से समान नागरिक कानून लागू है, लेकिन यह पुर्तगाली सिविल कोड के तहत संचालित होता है। इसलिए उत्तराखंड को आजाद भारत में UCC लागू करने वाला पहला राज्य माना जाता है।

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कब शुरू हुई थी समान नागरिक संहिता की चर्चा?

समान नागरिक संहिता का विचार नया नहीं है। वर्ष 1835 में ब्रिटिश सरकार ने देशभर में आपराधिक मामलों और अनुबंधों के लिए एक समान कानून बनाने की सिफारिश की थी। 1840 में इसे लागू भी किया गया, लेकिन हिंदू और मुस्लिम समुदाय के व्यक्तिगत कानून अलग रखे गए। यहीं से भविष्य में समान नागरिक संहिता की मांग की पृष्ठभूमि तैयार हुई।

Aakash Waghmare
By Aakash Waghmare

आकाश वाघमारे | MCU, भोपाल से स्नातक और फिर मास्टर्स | मल्टीमीडिया प्रोड्यूसर के तौर पर 3 वर्षों का क...Read More

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