PU Special :106 साल की उम्र में भी जिंदा हैं आजादी के संघर्ष की यादें, बसंतीलाल पांडे ने अंग्रेजों की लाठियां झेलीं

प्रभा उपाध्याय, इंदौर। युवावस्था में चंद्रावतीगंज से इंदौर आए बसंतीलाल पांडे ने महात्मा गांधी की सभा देखी और उनके विचारों से प्रभावित होकर स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा लिया। ‘करो या मरो’ और ‘भारत छोड़ो’ के संदेश से प्रभावित होकर उन्होंने गांव-गांव जाकर लोगों को जागरूक किया और पर्चे बांटे। आंदोलन के दौरान उन्होंने अंग्रेजों की लाठियां, गोलियां झेलीं और साथियों के साथ गिरफ्तार होकर करीब दो महीने जेल में बिताए।
अंग्रेजों की लाठियां और गोलियां भी झेलीं
स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान बसंतीलाल पांडे और उनके साथियों को अंग्रेजी शासन के दमन का सामना करना पड़ा। उन्होंने बताया कि आंदोलन के दौरान अंग्रेजों की लाठियां और गोलियां भी झेलनी पड़ीं। कई साथियों के साथ उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेजा गया। जेल में उन्होंने करीब दो माह तक कठिन परिस्थितियों में समय बिताया। उस दौर की घटनाओं को याद करते हुए वे बताते हैं कि स्वतंत्रता की लड़ाई में लोगों ने अपना सब कुछ देश के लिए समर्पित कर दिया था।
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आजादी करोड़ों भारतीयों के त्याग का परिणाम
बसंतीलाल पांडे के अनुसार स्वतंत्रता केवल एक राजनीतिक उपलब्धि नहीं थी, बल्कि करोड़ों भारतीयों के त्याग और बलिदान का परिणाम थी। उन्होंने जिस दौर को देखा, उसमें देश को आजाद कराने के लिए आम लोगों ने भी संघर्ष किया था। आंदोलन से जुड़े लोगों ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ आवाज उठाई और आजादी की लड़ाई को मजबूत किया। बसंतीलाल पांडे की जीवन यात्रा भी इसी संघर्ष और समर्पण की कहानी है। 106 वर्ष की उम्र में भी उन्हें उस दौर की घटनाएं याद हैं और वे आजादी के महत्व को समझाने का प्रयास करते हैं।
युवाओं को देशभक्ति और त्याग का दिया संदेश
बसंतीलाल पांडे आज भी युवाओं को देशभक्ति, ईमानदारी और सामाजिक समानता का संदेश देते हैं। उनका कहना है कि आजादी की असली कीमत तभी समझी जा सकती है, जब नई पीढ़ी स्वतंत्रता सेनानियों के संघर्ष और बलिदान को याद रखे। वे चाहते हैं कि युवा देश के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को समझें और समाज में समानता, भाईचारे की भावना को आगे बढ़ाएं। उनकी जीवन यात्रा देश के लिए समर्पण और संघर्ष की प्रेरक कहानी बनी हुई है।













