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उज्जैन-इंदौर मेट्रोपॉलिटन का मामला पहुंचा हाईकोर्ट :16 हजार वर्ग किमी क्षेत्र वाली अधिसूचना पर उठे संवैधानिक सवाल?

उज्जैन-इंदौर मेट्रोपॉलिटन क्षेत्र की अधिसूचना को जनहित याचिका के जरिए हाई कोर्ट में चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता ने स्थानीय निकायों से परामर्श नहीं लेने और संवैधानिक प्रावधानों की अनदेखी करने का आरोप लगाया है।
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16 हजार वर्ग किमी क्षेत्र वाली अधिसूचना पर उठे संवैधानिक सवाल?
फाइल फोटो

इंदौर। उज्जैन-इंदौर मेट्रोपॉलिटन क्षेत्र के गठन को लेकर राज्य शासन द्वारा जारी अधिसूचना अब कानूनी चुनौती का सामना कर रही है। इस संबंध में मध्यप्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ में एक जनहित याचिका दायर की गई है, जिसमें अधिसूचना को संवैधानिक और कानूनी आधारों पर चुनौती दी गई है।

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मंगलवार को न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी की युगलपीठ ने मामले पर प्रारंभिक सुनवाई की। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से याचिका में कुछ संशोधन करने की अनुमति मांगी गई, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया। मामले की अगली सुनवाई एक सप्ताह बाद निर्धारित की गई है।

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याचिका अधिवक्ता अक्षत पहाड़िया द्वारा दायर की गई है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि उज्जैन-इंदौर मेट्रोपॉलिटन क्षेत्र की अधिसूचना जारी करते समय संविधान के 74वें संशोधन की मूल भावना की अनदेखी की गई है। संविधान का उद्देश्य स्थानीय स्वशासन संस्थाओं को मजबूत करना है, लेकिन अधिसूचना में स्थानीय निकायों की भूमिका सीमित कर दी गई है।

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याचिकाकर्ता का कहना है कि कानून के अनुसार मेट्रोपॉलिटन क्षेत्र के लिए गठित समिति में दो-तिहाई सदस्य उन क्षेत्रों के निर्वाचित जनप्रतिनिधि होने चाहिए, जो मेट्रोपॉलिटन क्षेत्र का हिस्सा बन रहे हैं। जबकि वर्तमान व्यवस्था में एक अलग अथॉरिटी गठित की जा रही है, जिसके प्रमुख मुख्यमंत्री होंगे तथा इसमें मंत्री और प्रशासनिक अधिकारी सदस्य के रूप में शामिल रहेंगे। मेट्रोपॉलिटन समिति को पर्याप्त अधिकार नहीं दिए गए हैं, जबकि अधिकांश शक्तियां अथॉरिटी को सौंप दी गई हैं।

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याचिका में यह भी कहा गया है कि मेट्रोपॉलिटन क्षेत्र में शामिल किए गए स्थानीय निकायों, पंचायतों और नगर निगमों से न तो कोई राय ली गई और न ही सुझाव या आपत्तियां आमंत्रित की गईं। यह प्रक्रिया संवैधानिक प्रावधानों और लोकतांत्रिक सिद्धांतों के विपरीत बताई गई है।

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याचिकाकर्ता ने क्षेत्र की भौगोलिक और सामाजिक प्रकृति को लेकर भी सवाल उठाए हैं। उनका तर्क है कि इंदौर प्रदेश की व्यावसायिक राजधानी के रूप में विकसित शहर है, जबकि उज्जैन धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान वाला नगर है। दोनों शहरों की विकास संबंधी प्राथमिकताएं और आवश्यकताएं अलग-अलग हैं, ऐसे में इन्हें एक ही मेट्रोपॉलिटन क्षेत्र में शामिल करने के निर्णय पर पुनर्विचार आवश्यक है।याचिका में उज्जैन-इंदौर मेट्रोपॉलिटन क्षेत्र के नामकरण को लेकर भी आपत्ति दर्ज कराई गई है। याचिकाकर्ता ने सवाल उठाया है कि क्षेत्र के नाम में इंदौर को उज्जैन के बाद क्यों रखा गया।

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गौरतलब है कि नगरीय विकास एवं आवास विभाग द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार लगभग 16 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को मेट्रोपॉलिटन क्षेत्र में शामिल किया गया है। इसमें इंदौर, उज्जैन, देवास, धार, शाजापुर और रतलाम जिलों की कुल 38 तहसीलें शामिल हैं। यह प्रदेश की सबसे बड़ी क्षेत्रीय विकास परियोजनाओं में से एक मानी जा रही है।

Hemant Nagle
By Hemant Nagle

हेमंत नागले | पिछले बीस वर्षों से अधिक समय से सक्रिय पत्रकारिता में हैं। वर्ष 2004 में मास्टर ऑफ जर्...Read More

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