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PU Special :‘पुलिस और समाज एक-दूसरे से जुड़े हैं, थाना और जनता के बीच जितना मजबूत भरोसा होगा, अपराध से लड़ना उतना ही आसान होगा’

पूर्व पुलिस अधिकारी ‘मप्र पुलिस के व्हाइट टाइगर’ सलीम खान की जीवनी पर किताब लिखने वाले लेखक सिब्तैन शाहिदी से पुलिसिंग, संघर्ष और सिस्टम में दलाव पर पीपुल्स समाचार ने खुलकर बात की। उन्होंने पुलिसिंग के विविध पहलुओं पर जानकारी दी।
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‘पुलिस और समाज एक-दूसरे से जुड़े हैं, थाना और जनता के बीच जितना मजबूत भरोसा होगा, अपराध से लड़ना उतना ही आसान होगा’
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सतीश उपाध्याय, भोपाल। पूर्व सीएसपी सलीम खान का मानना था कि 'पुलिस जनता के वेलफेयर के लिए बनी है, किसी और चीज के लिए नहीं इसलिए उन्होंने पुलिस सर्विस को अलग अंदाज में निभाया। सिब्तैन शाहिदी ने अपनी पुस्तक अखाड़ा में सलीम खान की जीवनी के जरिए पुलिस के विभिन्न पहलुओं को सामने लाने की कोशिश की। इस किताब का विमोचन 9 अगस्त को पटकथा लेखकर और फिल्म निर्देशक रूमी जाफरी करेंगे। पुस्तक के विमोचन से पहले पढ़िए सिब्तैन शाहिदी से पीपुल्स समाचार से हुई खास बातचीत…

सवाल: आपकी किताब एक पुलिस अधिकारी की जीवनी के जरिए पुलिस और समाज के रिश्ते को देखने की कोशिश करती है। इसकी मूल सोच क्या रही?

जवाब: इस किताब के जरिए मैं बदलते समाज और बदलती पुलिस के रिश्ते को देखना चाहता था। एक इंस्पेक्टर किस तरह विभाग और जनता के बीच खड़ा होता है, उसकी जिम्मेदारी क्या होती है और वह पुलिसिंग को किस नजर से देखता है, यह इस किताब का मूल विषय है। सलीम खान का विश्वास रहा कि 'पुलिस जनता के वेलफेयर के लिए बनी है, किसी और चीज के लिए नहीं'।

सवाल: सलीम खान की पुलिसिंग का सबसे सीधा सिद्धांत क्या था?

जवाब: उनका सीधा सिद्धांत था कि 'जो गरीबों को पीड़ा दे, वह अपराधी है।'  उनके लिए अपराधी की पहचान उसके रसूख से नहीं, बल्कि उसके कर्म से होती थी। इसीलिए उनके सामने कोई कितना भी बड़ा व्यक्ति क्यों न हो, अगर वह किसी को पीड़ा दे रहा है तो वह उनके लिए अपराधी था। मुख्यमंत्री तक की हाजिरी उनके थाने में हो चुकी थी, लेकिन कानून के सामने सब बराबर थे।

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सवाल: आपकी किताब में उनके निजी संघर्ष को भी जगह मिली है? 

जवाब:  बिल्कुल। अपराध और पुलिसिंग की बहुत सारी किताबें लिखी गई हैं, लेकिन यह किताब एक ऐसे बच्चे की कहानी भी है, जिसने अपने परिवार के साथ अभाव में जीवन बिताया। परिस्थितियां मुश्किल थीं, लेकिन उन्होंने संघर्ष किया। तमाम मुश्किलों के बावजूद अपना आत्मसम्मान बनाए रखा और नकारात्मक ताकतों के साथ समझौता नहीं किया। उनकी कहानी यह बताती है कि 'मुश्किल परिस्थितियों के बीच भी ईमानदारी और आत्मसम्मान के साथ पुलिस की नौकरी को जिया जा सकता है।'

सवाल: आप पुलिस को समाज और सरकार के बीच किस रूप में देखते हैं?

जवाब: पुलिस सरकार का अंतिम चेहरा होती है और समाज के सामने उसका पहला चेहरा भी। प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री सरकार का चेहरा हो सकते हैं, लेकिन आम आदमी जब सरकार से सीधे मिलता है तो अक्सर उसका सामना पुलिस से होता है। 'एक तरफ थाना होता है और दूसरी तरफ जनता। इन दोनों के बीच पुल बनाने की जिम्मेदारी पुलिस की होती है'।

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सवाल:  सलीम खान की पुलिसिंग में ऐसा क्या अलग था, जो आपको सबसे ज्यादा प्रभावित करता है? 

जवाब: वह अपने थाने में ऐसे सिपाहियों को भी रखते थे, जिन्हें दूसरे अधिकारी शायद बोझ मानते थे। वह कहते थे कि  ‘मैं अपने थाने में सारे लंगड़े-लूले रखता था।’ मतलब ऐसे पुलिसकर्मी जो विभाग में लगातार डांट खाते-खाते नकारात्मक हो चुके थे या जिन्हें लगता था कि उनसे कोई काम नहीं हो सकता। सलीम खान ऐसे लोगों को सुधारने की कोशिश करते थे। एक सिपाही तो थाने के सामने अपनी पत्नी को पीट रहा था। उसका कहना था कि थाने में भले मेरे पास पावर नहीं है, लेकिन घर में तो है। सलीम खान ने ऐसे व्यवहार को भी बर्दाश्त नहीं किया। मानसिक और व्यवहारिक समस्याओं से जूझ रहे पुलिसकर्मियों को उन्होंने जिस तरीके से संभाला, वह उनकी पुलिसिंग का अलग पहलू था।

सवाल: इस पूरी कहानी को किताब में दर्ज करने का विचार कैसे आया? 

जवाब:  मैं मुंबई में स्थापित लेखक हूं। डिस्कवरी चैनल के लिए डॉक्यूमेंट्री लिखता हूं, दास्तान लिखता हूं और किताबें भी लिखता हूं। मुंबई में मेरी मुलाकात सलीम खान साहब की बेटी शानिल खान से हुई। उन्होंने बताया कि उनके पिता ने 70, 80 और 90 के दशक में पुलिस में काम किया है और उनका नजरिया व जीवन अपने आप में एक लंबी कहानी है। इसके बाद मैं उनकी बड़ी बहन स्वरूप और परिवार के लोगों से मिला। उन्होंने भी कहा कि 'सलीम जैसे सिपाही पर किताब जरूर लिखी जानी चाहिए'।

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सवाल: आपने सलीम खान को ही अपनी किताब का विषय क्यों चुना? 

जवाब: आम तौर पर जब कोई आईपीएस अधिकारी कुछ बड़ा करता है तो उसका नाम बहुत सामने आता है और उस पर खूब लिखा जाता है। मेरे मन में विचार आया कि 'अंडरडॉग की कहानी क्यों न लिखी जाए'। सलीम खान उस लिहाज से एक बेहद दिलचस्प किरदार थे। वह नीचे से आए, संघर्ष किया और अपनी मेहनत से अपनी पहचान बनाई। यही इस किताब की बुनियाद बनी।

सवाल: किताब लिखने के लिए आपने किस तरह रिसर्च की?

जवाब: मैंने उनके गांव जाकर वहां के रिश्तेदारों से मुलाकात की। सागर में उनके पुराने छप्पर वाले मकान को देखा। परिवार और उनके जीवन से जुड़े तमाम लोगों से बातचीत की। धीरे-धीरे उनके जीवन की वे सारी बातें सामने आती गईं, जो लंबे समय से उनके भीतर दबे हुए बोझ की तरह थीं। उन्हें शब्दों में बाहर निकालना अपने आप में एक अनुभव था।

सवाल: क्या अपनी जिंदगी की इतनी बातें सामने रखना उनके लिए आसान था?

जवाब: नहीं, बिल्कुल आसान नहीं था। समाज से लड़कर बड़ा होने वाला व्यक्ति अपने आपको कमजोर दिखाना नहीं चाहता। जब मैंने उनके जीवन के अलग-अलग पहलुओं को लिखा तो उन्हें भी एक तरह की झिझक हुई कि 'क्या मैंने अपनी सारी चीजें बता दीं?' लेकिन यही इस कहानी की खूबसूरती है कि इसमें सिर्फ एक पुलिस अधिकारी की उपलब्धियां नहीं हैं, बल्कि उसके संघर्ष और कमजोरियां भी हैं।

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सवाल: उनके व्यक्तित्व में पहलवानी का भी असर रहा? 

जवाब: हां। वह पहले पहलवान रहे हैं। कुश्ती के दौरान उन्होंने दांव-पेच सीखे। वही दांव-पेच आगे चलकर उनकी पुलिसिंग में भी दिखाई दिए। कुश्ती ने उनमें एक तरह की मानसिक फुर्ती पैदा की, जिसे संस्कृत में 'प्रत्यूत्पन्नमति' कह सकते हैं, यानी मौके के हिसाब से तुरंत निर्णय लेने की क्षमता। इसी वजह से वह समस्या छोटी हो या बड़ी, उसका रास्ता निकाल लेते थे। उनके थाने को लगातार अच्छे काम के लिए अवॉर्ड मिलते रहे।

सवाल:  भोपाल की पुलिसिंग में सलीम खान की पहचान किस तरह बनी?

जवाब:  रिसर्च में पता चला कि जब किसी बड़े अपराधी या किसी बड़े नामचीन व्यक्ति को पकड़ना होता था, तो सभी अधिकारियों की जुबान पर एक ही नाम आता था 'सलीम खान'।उनकी पहचान एक ऐसे पुलिस अधिकारी की थी, जिसे मुश्किल काम सौंपा जा सकता था और जो उससे पीछे नहीं हटता था।

सवाल: सलीम खान को ‘मध्यप्रदेश पुलिस का व्हाइट टाइगर’ नाम दिया गया है। क्या आपको पता है?

जवाब: मेरी रिसर्च में यह बात भी सामने आई कि  उनके चाहने वालों ने उन्हें ‘मध्यप्रदेश पुलिस का व्हाइट टाइगर’ नाम दिया था। इसकी वजह उनका काम करने का तरीका था। वह मुश्किल परिस्थितियों में भी पीछे नहीं हटते थे। उनसे हमें बहुत कुछ सीखने को मिला, खासकर यह कि पुलिसिंग सिर्फ ताकत दिखाने का काम नहीं है, बल्कि  स्थिति को समझकर सही समय पर सही फैसला लेने की कला भी है।

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सवाल: आज के पुलिसकर्मियों के लिए सलीम खान की कहानी का सबसे बड़ा संदेश क्या है? 

जवाब: मेरे हिसाब से यही कि पुलिस की असली ताकत उसकी वर्दी या पद में नहीं, बल्कि जनता के भरोसे में है। अगर पुलिस जनता के साथ खड़ी होती है, कमजोर की आवाज सुनती है और गलत करने वाले के सामने बिना दबाव के खड़ी होती है, तो वह समाज में अपना सम्मान खुद बना लेती है।

सवाल: और आम जनता के लिए?

जवाब: जनता को भी पुलिस को सिर्फ डर और कार्रवाई के नजरिए से नहीं देखना चाहिए। पुलिस और समाज एक-दूसरे से जुड़े हैं। थाना और जनता के बीच जितना भरोसा मजबूत होगा, अपराध से लड़ना उतना ही आसान होगा। 'यही सलीम खान की कहानी का सबसे बड़ा संदेश है'।

‘अखाड़ा’ का लोकार्पण समारोह

रविवार, 9 अगस्त को शाम 6 बजे बैरागढ़-भैंसाखेड़ी स्थित चिरायु मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल के सभागार में 'अखाड़ा' पुस्तक का विमोचन होगा। कार्यक्रम में प्रसिद्ध पटकथा लेखक और फिल्म निर्देशक रूमी जाफरी मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होंगे।

Naresh Bhagoria
By Naresh Bhagoria

नरेश भगोरिया। 27 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हूं। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्ववि...Read More

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