नई जिंदगी की आस में गैस पीड़ित :लेकिन किडनी ट्रांसप्लांट के लिए नहीं मिल रही पूरी राशि, सुप्रीम कोर्ट की कमेटी ने सरकार को लिखा पत्र

प्रवीण श्रीवास्तव, भोपाल। 42 वर्षीय गैस पीड़िता नीलोफर पिछले कई महीनों से नई जिंदगी का इंतजार कर रही हैं। डॉक्टरों ने किडनी प्रत्यारोपण की सलाह दी है, डोनर भी तैयार है, लेकिन ऑपरेशन की तारीख तय नहीं हो पा रही। इसकी वजह है, इलाज का खर्च। किडनी प्रत्यारोपण पर करीब 6.5 से सात लाख रुपए खर्च होने हैं, जबकि गैस राहत विभाग से सिर्फ चार लाख रुपए ही मंजूर कर रहा है। नीलोफर की मदद के लिए सुप्रीम कोर्ट की मॉनीटरिंग कमेटी ने भी सरकार को पत्र लिखा, लेकिन विभाग से कोई जवाब नहीं मिल रहा है। इधर, ट्रांसप्लांट न होने से नीलोफर की परेशानी दिन ब दिन बढ़ती जा रही है।
यह कहानी सिर्फ नीलोफर की नहीं, बल्कि उन सैकड़ों गैस पीड़ितों की है, जो गंभीर बीमारियों से जूझ रहे हैं। विडंबना यह है कि साल 2016 में किडनी प्रत्यारोपण के लिए तय की गई चार लाख रुपए की सहायता सीमा आज भी नहीं बढ़ाई गई, जबकि पिछले 10 वर्षों में इलाज का खर्च, दवाइयों की कीमतें और सरकारी खर्च लगातार बढ़े हैं। गैस पीड़ित संगठनों की मानें तो शहर में करीब 120 गैस पीड़ित ऐसे हैं जो डायलिसिस पर हैं, और उन्हें ट्रांसप्लांट की जरूरत है।
मरीजों का दर्द : उधार में करा लिया, आज भी चुका रहे
- गैस पीड़ित संगठनों का कहना है कि नीलोफर अकेली मरीज नहीं हैं। कई गैस पीड़ित गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए आर्थिक सहायता का इंतजार कर रहे हैं।
- गैस पीड़ित कौसर सुल्तान को ट्रांसप्लांट में के लिए निजी अस्पताल ने सात लाख रुपए का एस्टीमेट दिया। विभाग सिर्फ चार लाख रुपए ही दे रहा है। ऐसे में कौसर को सप्ताह में दो बार डायलिसिस की जरूरत होती है, जो उसके लिए किसी सजा से कम नहीं है।
- गैस पीड़ित मुन्ने खां ने तीन साल पहले किडनी ट्रांसप्लांट कराया था। विभाग ने चार लाख रुपए ही दिए, जबकि उसका खर्च करीब आठ लाख के करीब हो गया। उसने कर्ज लेकर अस्पताल का बिल तो चुका दिया, लेकिन अब सारी कमाई कर्ज उतारने में ही जा रही है।
समय पर किडनी प्रत्यारोपण न हो तो बढ़ सकता है जान का खतरा
वरिष्ठ किडनी रोग विशेषज्ञ डॉ. संजय गुप्ता के अनुसार अंतिम चरण की किडनी बीमारी (एंड स्टेज रीनल डिजीज) में मरीज को नियमित डायलिसिस पर निर्भर रहना पड़ता है, लेकिन यह प्रत्यारोपण का स्थायी विकल्प नहीं है। डॉक्टरों का कहना है कि सप्ताह में दो से तीन बार डायलिसिस कराने से मरीज की शारीरिक और मानसिक स्थिति पर असर पड़ता है। बार-बार डायलिसिस के कारण संक्रमण, एनीमिया, हड्डियों की कमजोरी, रक्तचाप में उतार-चढ़ाव और हृदय संबंधी जटिलताओं का खतरा बढ़ जाता है। लंबे समय तक डायलिसिस पर रहने से रक्त वाहिकाओं को भी नुकसान पहुंच सकता है। विशेषज्ञों के मुताबिक यदि उपयुक्त डोनर उपलब्ध होने के बावजूद समय पर किडनी प्रत्यारोपण नहीं हो पाता तो मरीज की जीवन गुणवत्ता लगातार गिरती है और कई मामलों में मृत्यु का जोखिम भी बढ़ जाता है।
गैस पीड़ितों को यह परेशानी भी
- सरकारी अस्पतालों जैसे एम्स और हमीदिया अस्पताल में गैस पीड़ितों के लिए अलग से व्यवस्था नहीं।
- कमला नेहरू सहित अन्य गैस राहत अस्पतालों में डायलिसिस यूनिट बदहाल, जिससे डायलिसिस के लिए परेशान होना पड़ता है।
- दोनों ही परिस्थितियों में गैस पीड़ितों के पास निजी अस्पताल का विकल्प ही बचता है, लेकिन यहां भी विभागीय नियम आड़े आते हैं।
इनका कहना
सुप्रीम कोर्ट की मॉनिटरिंग कमेटी के सदस्य पुर्णेंदु शुक्ल ने गैस राहत विभाग को भेजे पत्र में कहा है कि गैस पीड़ितों को सामान्य स्वास्थ्य योजनाओं के लाभार्थियों की तरह नहीं देखा जा सकता। गैस पीड़ित एक विशेष प्रभावित वर्ग हैं और उन्हें सर्वोत्तम चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराना राज्य सरकार की जिम्मेदारी है। पत्र में हमने कहा है कि गंभीर बीमारियों के इलाज में सहायता राशि की तय सीमा कई मामलों में पर्याप्त नहीं रह गई है। कमेटी ने अपनी पूर्व रिपोर्टों का हवाला देते हुए कहा कि मरीजों को उपचार के लिए अतिरिक्त धन जुटाने की स्थिति में नहीं छोड़ा जाना चाहिए और आवश्यकता के अनुसार पूरा खर्च उपलब्ध कराया जाना चाहिए।
वहीं सीएमएचओ, गैस राहत विभाग डॉ. एसएस राजपूत का कहना है कि नीलोफर का केस विभागीय उच्चाधिकारियों के पास भेजा गया है। आयुष्मान योजना के तहत जो भी नियम हैं उस आधार पर ही फंड जारी होता है। इसके बाद भी मरीजों को जरूरत होती है तो, प्रस्ताव को हम राज्य सरकार के पास भेज देते हैं, वहां से जो भी निर्णय होता है, वह मान्य होता है।
डॉ. एसएस राजपूत, सीएमएचओ, गैस राहत विभाग











