ममता बनर्जी को हटाकर नया अध्यक्ष घोषित:आखिर कौन हैं अरूप रॉय जिन पर बागियों ने खेला बड़ा दांव?

टीएमसी इस समय कई गुटों में बंटी नजर आ रही है। बागी विधायक और सांसद पार्टी नेतृत्व के खिलाफ खुलकर मोर्चा खोल चुके हैं। ऐसे में अरूप रॉय का अध्यक्ष बनना बंगाल की राजनीति में नए समीकरणों का संकेत माना जा रहा है।
चुनावी हार के बाद गहराया नेतृत्व संकट
पश्चिम बंगाल में सत्ता से बाहर होने के बाद तृणमूल कांग्रेस के भीतर असंतोष लगातार बढ़ता गया। कई विधायक और सांसद पार्टी नेतृत्व के फैसलों पर सवाल उठाने लगे। धीरे-धीरे यह असहमति एक संगठित बागी गुट में बदल गई। अब पार्टी के भीतर नियंत्रण को लेकर खुली लड़ाई देखने को मिल रही है। राजनीतिक विश्लेषक इसे टीएमसी के इतिहास के सबसे बड़ी अंदरुनी कलह एक मान रहे हैं।
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बागी विधायकों ने किया नई कार्यसमिति का गठन
कोलकाता में बागी विधायकों की बैठक के दौरान नई कार्यसमिति के गठन का ऐलान किया गया। इस बैठक की अगुवाई ऋतब्रत बनर्जी ने की और संगठन में बड़े बदलावों की घोषणा की गई। इसी दौरान ममता बनर्जी को अध्यक्ष पद से हटाने का प्रस्ताव पारित किया गया। बागी गुट ने दावा किया कि पार्टी को नए नेतृत्व और नई दिशा की जरूरत है।
अरूप रॉय को बनाया गया नया अध्यक्ष
बागी गुट ने वरिष्ठ विधायक अरूप रॉय को तृणमूल कांग्रेस का नया अध्यक्ष घोषित किया है। घोषणा के दौरान यह भी कहा गया कि ममता बनर्जी चाहें तो संगठन की मुख्य सलाहकार की भूमिका निभा सकती हैं। अरूप रॉय को संगठनात्मक अनुभव और प्रशासनिक क्षमता के कारण इस पद के लिए चुना गया। उनके नाम पर बागी गुट के ज्यादातर नेताओं ने सहमति जताई। इससे स्पष्ट है कि पार्टी के भीतर उनका प्रभाव अब भी मजबूत माना जाता है।
कौन हैं अरूप रॉय ?
अरूप रॉय का राजनीतिक जीवन छात्र राजनीति से शुरू हुआ था। शुरुआती दौर में वे कांग्रेस के छात्र संगठन से जुड़े रहे और बाद में ममता बनर्जी के साथ नए राजनीतिक सफर पर निकल पड़े। वर्ष 1998 में तृणमूल कांग्रेस के गठन के समय वे शुरुआती नेताओं में शामिल थे। उन्होंने हावड़ा जिले में पार्टी के विस्तार और संगठन को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसी वजह से वे लंबे समय तक ममता बनर्जी के भरोसेमंद नेताओं में गिने जाते रहे।
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हावड़ा जिले में टीएमसी को किया मजबूत
अरूप रॉय लगातार चार बार हावड़ा मध्य विधानसभा क्षेत्र से विधायक चुने जा चुके हैं। वर्ष 2011 से लेकर 2026 तक हुए चुनावों में उन्होंने लगातार जीत दर्ज की है। वे राज्य सरकार में कृषि विपणन और सहकारिता जैसे महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी भी संभाल चुके हैं। हावड़ा जिले में उनकी संगठनात्मक पकड़ बेहद मजबूत मानी जाती है। स्थानीय राजनीति में उन्हें जमीनी नेता और प्रभावशाली प्रशासक के रूप में पहचान मिली है।
कई अहम मंत्रालयों का संभाला जिम्मा
लंबे समय तक ममता बनर्जी के करीबी रहे अरूप रॉय का बागी गुट के साथ खड़ा होना राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उनकी सादगी, कार्यकर्ताओं से संवाद और संगठन क्षमता ने उन्हें अलग पहचान दिलाई है। पार्टी के भीतर कई बार उन्हें संकटमोचक की भूमिका में भी देखा गया। अब अध्यक्ष पद संभालने के बाद उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती संगठन को एकजुट रखना और राजनीतिक विश्वसनीयता बनाए रखना होगी।












