ब्रसेल्स। ASML (नीदरलैंड की कंपनी) की मशीनें दुनिया की लगभग हर एडवांस्ड चिप फैक्ट्री में इस्तेमाल होती हैं, फिलहाल यूरोप में एक भी मशीन नहीं बेच रही है। कंपनी के ग्लोबल पब्लिक अफेयर्स हेड फ्रैंक हीम्सकर्क ने बताया कि यूरोप में उनकी कोई बिक्री नहीं हो रही है, क्योंकि यहां ऐसी कोई नई फैक्ट्री ही नहीं बन रही है जहां उनकी मशीनें लगाई जा सकें। हीम्सकर्क ने कहा, हम यूरोप में कुछ नहीं बेच रहे हैं। वजह साफ है, यूरोप इन्वेस्ट नहीं कर रहा है और यहां कोई चिप फैक्ट्री नहीं बन रही। उन्होंने यह भी बताया कि अमेरिका, चीन और भारत जैसे देश ASML को अपने यहां ऑपरेशन बढ़ाने के लिए लगातार मनाने में लगे हैं। उनका यह बयान ऐसे समय में आया है जब यूरोपीय यूनियन अपने सेमीकंडक्टर कानून में बदलाव पर विचार कर रहा है। यह ब्रसेल्स के लिए एक कड़वा आंकड़ा भी सामने लाता है - शून्य।
यूरोप के चिप्स एक्ट से उम्मीद के मुताबिक फैक्ट्रियां नहीं बनीं
EU चिप्स एक्ट 2023 में लागू किया गया था, जब कोविड महामारी के दौरान दुनियाभर में चिप की भारी कमी देखी गई थी। इसका मुख्य टारगेट 2030 तक ग्लोबल चिप मार्केट में यूरोप की हिस्सेदारी को दोगुना करना था। लेकिन अब यह लक्ष्य काफी दूर नजर आ रहा है। पिछले साल यूरोपियन कोर्ट ऑफ ऑडिटर्स ने भी कहा था कि EU के लिए इसे हासिल करना बहुत मुश्किल है और इस कानून से यूरोप में नई सेमीकंडक्टर फैक्ट्रियां लगाने में ज्यादा मदद नहीं मिली। ASML के लिए यह मामला सिर्फ बिजनेस का नहीं, बल्कि पॉलिटिकल भी है। कंपनी दुनिया की इकलौती ऐसी निर्माता है जो एडवांस्ड लिथोग्राफी मशीनें बनाती है, जिनके बिना नई जेनरेशन की चिप्स बनाना मुमकिन ही नहीं है।
बड़ी कंपनियां करती हैं ASML की मशीनों का उपयोग
TSMC और Samsung जैसी बड़ी कंपनियां ASML की मशीनों का इस्तेमाल सिलिकॉन वेफर पर ट्रांजिस्टर के पैटर्न प्रिंट करने के लिए करती हैं। इसी वजह से ASML आज के AI चिप्स की पूरी सप्लाई चेन में सबसे अहम कड़ी बन गई है।
अमेरिका, चीन और भारत ASML की मशीनों के लिए दौड़ में हैं, यूरोप पीछे
जहां यूरोप इस रेस से बाहर है, वहीं दूसरे देश अपने सेमीकंडक्टर सेक्टर पर जमकर पैसा लगा रहे हैं। ASML चीन के प्रेसिडेंट शेन बो ने पिछले नवंबर में बताया था कि 2025 में अकेले चीन का हिस्सा ASML की कुल बिक्री में 25% से ज्यादा रहने की उम्मीद है। भारत भी इस दौड़ में तेजी से आगे बढ़ रहा है, उसके पहले बड़े चिप प्लांट गुजरात और असम में लग रहे हैं। उधर अमेरिका कई सालों से नीदरलैंड पर दबाव बना रहा है कि वह अपनी सबसे एडवांस्ड मशीनें चीन को न बेचे।
जियोपॉलिटिक्स का भी असर
अमेरिका के दबाव से साफ होता है कि ASML की ऑर्डर बुक पर सिर्फ डिमांड का नहीं, जियोपॉलिटिक्स का भी बड़ा असर पड़ता है। ASML के टॉप अधिकारी महीनों से ब्रुसेल्स को चेतावनी दे रहे हैं। देखा जाए तो हीम्सकर्क का बयान ASML लीडरशिप की तरफ से आई कड़ी टिप्पणियों में लेटेस्ट है। जनवरी में CEO क्रिस्टोफ फॉकेट ने यूरोप से कहा था कि टेक सॉवरेनिटी को लेकर प्रैक्टिकल सोच रखनी चाहिए, क्योंकि चिप इकोसिस्टम पूरी दुनिया में फैला है और कुछ इंपोर्ट हमेशा जरूरी रहेंगे। हालात को लेकर अक्टूबर 2025 में CFO रोजर डैसन ने और सख्त बात कही। उन्होंने कहा कि EU के नियमों की वजह से AI टैलेंट बाहर जा रहा है और एक स्किल्ड इंजीनियर का पहला कदम अक्सर सिलिकॉन वैली का टिकट खरीदना होता है। ASML ने हाल ही में फ्रेंच AI कंपनी मिस्ट्रल में 1.3 बिलियन यूरो लगाकर सबसे बड़ी हिस्सेदारी खरीदी थी।
ईयू को लेकर तंज भी कसा
हीम्सकर्क ने तो कंपनी के एक पूर्व अधिकारी का हवाला देते हुए यहां तक कह दिया कि EU कमिश्नर से मीटिंग लेने से ज्यादा आसान व्हाइट हाउस के सीनियर अधिकारी से मिलना है। फिलहाल ASML और ब्रुसेल्स सेमीकंडक्टर की डिमांड बढ़ाने और सप्लाई चेन को मजबूत करने के तरीकों पर चर्चा कर रहे हैं। लेकिन हीम्सकर्क जिस समाधान की बात कर रहे हैं, उसका सीधा कनेक्शन ASML से नहीं है। यूरोप की सबसे बड़ी चिप कंपनी को अपने ही महाद्वीप में ग्राहक तभी मिलेंगे, जब यूरोप में सच में कोई फैब, यानी चिप बनाने वाली फैक्ट्री बननी शुरू होगी।